हास्य व्यंग्य

आप स्वर्ण पदक क्यों लाए
--मनोहर पुरी


भैया! अभिनव बिन्द्रा जी यह आपने क्या गजब कर दिया, साफ चमकता हुआ आईना भारतीयों के सामने धर दिया। जाने अनजाने कितने ही लोगों को शर्मसार कर दिया। एक एक के मन को ग्लानि से भर दिया। मैं सोचता हूँ कि आप बीजिंग गए ही क्यों? गए थे तो वहाँ ओलम्पिक खेलों में गंभीरता से भाग लेने क्यों बैठ गए? लगता है अपनी हवाई राइफ़ल पर ही ऐंठ गए। अन्य अनेक अधिकारियों और खिलाड़ियों की तरह से घूम फिर कर वापिस भी तो आ सकते थे। नहीं तो कहीं आस पास के देशों में जा कर मसाज करवा सकते थे। भले ही हमारी सरकारें खिलाड़ियों को खेलों का अभ्यास करने के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं करवाती परन्तु इतना तो निश्चित है कि वह सैर-सपाटे और खरीदारी करने के लायक पैसा तो दे ही देती हैं, बदले में किसी पदक का प्रमाणपत्र तक नहीं लेती हैं। इसी के लिए तो हर प्रतिनिधि मंडल में नाम घुसवाने के लिए न जाने कितने ही लोग दिन रात जोड़ तोड़ करते हैं, जहाँ जहाँ चयनकर्ता जाएँ वहाँ वहाँ अपना चेहरा उनके सामने धरते हैं।

भले आदमी! बीजिंग ओलम्पिक में विश्व भर से आये लोगों से मिल मिला लेते और लौट आते अपने देश, आपकी रिपोर्ट माँगने तक का किसी को होता नहीं होश। रोज ही तो देश से कोई न कोई प्रतिनिधि मंडल विदेश जाता है, वह लौट कर अपनी रिपोर्ट कहाँ जमा करवाता है। देश विदेश की सुंदरियों का भी वहाँ पर जमावड़ा लगा था। आप भी तो कुँआरे थे। न जाने कितनी लड़कियों के मां बाप आपके सहारे थे। यहाँ पर तो किसी ने कुछ पूछना ही नहीं था। आपका खेल कोई क्रिकेट जैसा तो था नहीं कि हारने पर लोग जूते मारने पर उतारू हो जाते । या फिर पत्थर मारने का काम करके बाजारू हो जाते। आप किस फ्लाइट से गए थे कोई नहीं जानता । किससे लौटते इसकी भनक तक की ओर कोई नहीं झाँकता। अब जब पदक सहित वापिस आओगे तो हवाई अड्डे पर ही भीड़ तुम्हारा स्वागत करेगी। अभी तो सब लोग आपको सिर माथे पर बिठाएँगे और अगली बार पदक न मिला तो अपनी नज़रों से भी गिराएँगे। यही भीड़ का मनोविज्ञान है,  उसकी आस्था जीत के साथ है उसका उगते सूरज को ही सलाम है। अब जहाँ जहाँ जाओगे बेकार ही वहाँ वहाँ लोग जमा हो जाएँगे। पहले ही यहाँ लोग कम काम करने का ढूंढ़ते रहते हैं बहाना, अब उनको मिल गया एक सुनने सुनाने का नया अफसाना। अब उन्हें काम न करने का क्रिकेट सरीखा एक बहाना और मिल जायेगा, हमारा काम न करने का ग्राफ़ और ऊपर चढ़ जायेगा। बेचारी पुलिस को आपकी सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ अतिरिक्त करने होंगे प्रबंध, सुरक्षा का भी काम से थोड़ा बहुत तो रहता है संबंध। उनके दिन भी मजे में कट रहे थे, थाने में ही हफ्तावार आए नोट आराम से बँट रहे थे। अगर आप जैसे आठ दस हो गए तो उनकी नाक में दम हो जायेगा, कहीं न कहीं कोई पदक विजेता प्रशंसकों की भीड़ में खो जायेगा।

अच्छा बताओ आपकी राइफ़ल को जानता ही कौन है। 'राइफ़ल शूटिंग' को सम्मानजनक खेल मानता ही कौन है। यह कोई क्रिकेट का बल्ला तो है नहीं कि इसे हाथ में लिए हुए गली गली चक्कर लगाएँ, आस पास के लोगों पर तेंदुलकर होने का रौब दिखाएँ। फिर आपकी तो राइफ़ल भी हवाई है, इसमें कहाँ कोई कमाई है। ए. के. 47  होती तो लोग कुछ भाव भी देते, संजय दत्त का ही संगी साथी मान लेते। अब आपने नाहक ही देश का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है। थोड़ा सा और बोझ उसके कंधों पर धर दिया है। आप जानते नहीं कि सिर के निरन्तर झुके रहने के कारण हमारी गर्दन की हड्डियाँ नीचे लटके रहने की आदी हो चुकी हैं, उन्हें सीधा करना बहुत कठिन कार्य होता है। आपको देखने के लिए सिर तो ऊपर उठाना ही पड़ेगा, आपके स्वागत का गले में पड़ा ढोल भी बजाना ही पड़ेगा।

भैया! नाक कटवा दी आपने सब की और खुद नक्कू बन बैठे। बिरादरी को क्या कोई इस तरह से छोड़ता है जैसे आपने छोड़ा है, पूरी सदी का रिकार्ड कोई ऐसे तोड़ता है जैसे आपने तोड़ा है। आज तक हमारे खिलाड़ी और अफसर एक ही बात की रट लगाए रहते थे कि चाहे जो भी कर लिया जाए पदक तो मिलने से रहा, पदक न लाने के लिए हमने क्या क्या नहीं किया और क्या क्या नहीं सहा। सोने का हमें कोई मोह नहीं है यह हमने बार बार स्वीकारा है, न जाने कितने स्वर्ण पदकों सरीखे अवसरों को बार बार नकारा है। आप हैं कि सीधे स्वर्ण पदक पर हाथ साफ कर बैठे। पूरी सदी का एक क्षण में हिसाब कर बैठे। अरे रजत अथवा कांस्य ही ले आते तो भी देश भर में घूम सकते थे ऐंठे ऐंठे। अब उन सबके लिए सफाई देना कितना कठिन कार्य होगा इसके बारे में आपने सोचा है कभी जनाब। किस किस को अब नहीं देना पड़ेगा जवाब। नहीं सोचा तो सोचना चाहिए था। कहीं तो अपने आपको टोकना चाहिए था। अब हमारे अधिकारी आप जैसे नक्कू के चुनाव से परेशान हैं। आखिर गलती कहाँ हुई सोच सोच कर हैरान हैं। अगली बार आपका चुनाव बहुत सोच समझ कर ही होगा यह मान लो, अभी से मैं आपको चेतावनी दे रहा हूँ जान लो।

आपको इस बात की भी खोज करनी चाहिए थी कि आखिर क्या कारण है कि ओलम्पिक के इतिहास में आज तक किसी ने व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण-पदक क्यों नहीं जीता। आखिर व्यक्तिगत स्पर्धाएँ तो हम पहले भी करते रहे हैं भाई। सौ साल से ऊपर हो गए किसी ने आपकी तरह से स्वर्ण जीतने की जहमत नहीं उठाई। बेकार ही देश में एक नई लहर पैदा करने की आवश्यकता ही क्या थी। अब की है तो भुगतो। पहनो गले में मोटे मोटे फूलों के हार और एलर्जी के हो जाओ शिकार। छोटे बड़े समारोहों में जितना चाहो करो समय बेकार, अभ्यास के लिए समय न मिलने पर हो जाओगे लाचार। किसी जमाने में जब हम अंग्रेजों के आदेशों का करते थे सम्मान, उनके लिए तब हॉकी में स्वर्ण पदक लाने को समझते थे अपनी शान। उससे अपने आकाओं का मन बहलाते थे और जी जान से स्वर्ण पदक लाते थे। आजादी के बाद भी उसी परम्परा को चाहे अनचाहे हम १९८० तक ढोते रहे हैं, गुलामी के दिनों में मिले सम्मान को भी धीरे धीरे खोते रहे हैं। कितनी कठिनाई के बाद तो उस पदक से पीछा छूटा था। एक लंबी अवधि के बाद हॉकी में हार देखने का रिकार्ड टूटा था। अब तो हमने जड़ से ही काट दिया है हॉकी का संबंध उस स्पर्धा में भाग लेने के लिए क्वालीफाई करना ही कर दिया है बंद। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। न ही हॉकी की टीम खेलने जाएगी और न ही देश की जनता स्वर्ण जीतने का दबाव बनाएगी।

लगता है निशाना लगाते समय आपके हाथ तनिक भी नहीं काँपे। आप किसी दबाव में आ कर नहीं हाँफे। राइफ़ल भी शायद ठीक ठाक ही मिल गई होगी जिसका निशाना उलटा न लग कर सीधा ही लगता है। इस राइफ़ल का बोफ़र्स से नहीं रहा होगा कोई रिश्ता। नहीं तो पदक कहाँ ले पाता आप जैसा कोई फरिश्ता। इस बात की तो पूरी पूरी संभावना है कि किसी ने आपके इस इवेंट को फिक्स करने का नहीं किया होगा प्रयास, इस खेल पर किसी सटोरियों को भी रहा नहीं होगा कोई विश्वास। या फिर आपके अंदर अभी भी कुछ कुलबुलाते कीड़े राष्ट्र भक्ति के गीत गा रहे हैं। जिन्हें हमारे राजनेता कब से बेच बेच कर खा रहे हैं। आपने अपने देश के राजनेताओं से कुछ सीख भी नहीं ली ऐसा लगता है। ले लेते तो रातों रात करोड़पति हो जाते और बिना पदक लाए भी कहीं न कहीं अधिकारी बना दिए जाते। अब यह निश्चित मान लो कि आपको कोई अधिकारी तो बनाने वाला नहीं मिलेगा। कोशिश करना कि आपको राष्ट्र भक्ति की जो बीमारी लगी है वह आपके दल के दूसरे सदस्यों को न लगे बिल्कुल, नहीं तो सच कहता हूँ होगी बहुत मुश्किल।

१८ अगस्त २००८