हास्य व्यंग्य

अफ़सर करे न चाकरी 
रामेश्वर दयाल कांबोज हिमांशु


'अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम। दास मलूका कह गए सबके दाता राम।'
राम सबके दाता हैं - अजगर के भी, पंछी के भी और आज के हालात में अफ़सर के भी। हम यह मानते कि अफ़सर भी नौकरी करता है, पापी पेट के लिए या यों कहें कि जो कुछ भी अफ़सर करता है केवल पापी पेट के लिए करता है, अपने पेट के लिए। दूसरों के भी पेट में कौर पहुँचे, इस बात का उसको अहसास नहीं होना चाहिए। वैसे यह अहसास उसे तब ज़रूर हो जाता है, जब उससे भी बड़े पेटवाला उसका पेट काटने के लिए आ धमकता है। ऐसी विषम परिस्थिति आने पर छोटे पेट में दर्द होना ज़रूरी है। जब तक खाने को मिले तब तक ही पेट-दर्द से मुक्ति मिल सकती है। जहाँ खाने के अवसर नगण्य होते हैं, वहाँ असली अफ़सर रहना नहीं चाहता। वह पराए माल पर ही मस्त रह सकता है। पराया माल खाए बिना उसके पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है। वह जब चाहे जहाँ चाहे जिस समय खड़े–खड़े देश को बेच सकता है। भला यदि अफ़सर नहीं खाएगा तो क्या किसी मन्दिर में बैठकर शंख बजाएगा? अपना खाकर कोई कितने दिन ज़िन्दा रह सकता है!

अफ़सर बनना एक खुशी का अवसर है। जैसे हर कोई डाकू नहीं बन सकता वैसे ही हर कोई अफ़सर नहीं बन सकता। अफ़सर बनने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, उनमें ये तीन चीज़े सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं - समझदारी, संवेदना और दूरदृष्टि। समझदारी से काम करनेवाला व्यक्ति अफ़सर नहीं बन सकता। यदि दुर्भाग्य से बन भी गया तो बहुत दिनों तक चल नहीं सकता। वह अफ़सर भी किस काम का, जिसके किए गए कार्यों पर लोगों को माथा न पीटना पड़े, छाती न कूटनी पड़े, हाय-हाय! न करनी पड़े। वह बेसिर -पैर की बात करता है, बेसिर-पैर के काम करता है। लोग जब उसकी करतूतों से दुखी होकर कपड़े फाड़ने, बाल नोंचने को मजबूर होने लगते हैं, उस समय वह वातानुकूलित कक्ष में बैठकर मेज़ पर पैर रखकर आराम करता है या कैण्टीन वाले की मुफ़्त की चाय पीकर काजू-बादाम खाकर खुद को हल्का महसूस करता है।

संवेदना से उसका कोई लेना-देना नहीं होता है। संवेदनशील व्यक्ति तुरन्त द्रवित हो जाता है। अफ़सर अगर द्रवित हो जाएगा तो ग्लेशियर की तरह पिघलकर विलीन हो जाएगा। उसे तो 'बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा, खायहिं महा अहि हृदय कठोरा' जैसा होना चाहिए। कोई मर भी जाए तो उसे द्रवित नहीं होना चाहिए। उसके द्वारा ख़रीदी बुलेट्फूफ़ जैकेट से अगर गोली भी पार हो जाए तो उसकी सेहत पर असर नहीं पड़ता क्यों कि जिसको मरना है, वह तो तो मरेगा ही, चाहे दुश्मन की गोली से मरे चाहे डॉक्टर द्वारा दी गई दवाई की नकली गोली से। जनता पर उसका उसी तरह का अधिकार होता है, जिस तरह गरीब की जोरू पर सभी पड़ोसियों का अधिकार होता है। दान-पुण्य की बीमारी से उसे दूर रहना चाहिए। पूजा-पाठ दो-तीन घण्टे ज़रूर करना चाहिए। चाहे ऑफ़िस छूटे,चाहे ऑफ़िस का काम छूटे, इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अधीनस्थ कर्मचारी के साथ उसे 'यूज़ एण्ड थ्रो' का सिद्धान्त अपनाना चाहिए। प्रेम से रहने वाले लोग अफ़सरों के लिए सिरदर्द बनते हैं। भला वह अफ़सर किस काम का जो दूसरों के सिर-दर्द का ताज़ खुद पहनकर घूमता फिरे। सच्चा अफ़सर तो वह है जो सिर-दर्द को मन्दिर के प्रसाद की तरह सब मातहतों में बाँटता रहता है।

परफ़ैक्ट अफ़सर वही है,जिसमें दृष्टि का अभाव हो। अफ़सर अगर हर बात को तुरन्त समझने की मशक्कत करेगा, तो सक्रिय होना पड़ेगा। सक्रियता से अफ़सरशाही पर बट्टा लगता है। हर काम को पेचीदा बनाकर इतना उलझा दो कि कोई माई का लाल उसे सुलझाने की हिमाक़त न करे, जो कोशिश करे वह भी उसी में फँसा रह जाए। फँसे हुए लोग ही अफ़सर के पास आते हैं। जो फँसते नहीं वे अफ़सर के दिल में बसते नहीं।

निकम्मापन किसी भी अफ़सर की शक्ति है। यदि लोगों का काम समय पर होता रहे तो कोई किसी को घास डालनेवाला नहीं। जहाँ कर्मठ अफ़सर होगा, वहाँ के सभी काम समय पर होते रहेंगे। सभी को काम करना पड़ेगा। किसी का काम फ़ाइलों में दबा नहीं रहेगा। इस कर्मठता के चलते पूरा दफ़्तर अपना महत्त्व खो देगा। बड़े बाबू को कोई सलाम क्यों करेगा? छोटे बाबू तो बेचारे वैसे ही कम पाते हैं। इनके पेट पर लाठी मारना भला कहाँ का न्याय है? भूखे लोगों के चेहरे की आभा महीने भर में खत्म हो जाती है। अपना पैसा खाने से चेहरे की सारी रौनक चली जाती है। लोग काम के लिए सिर पर सवार रहने लगते हैं। कर्मठ अफ़सर की छूट मिलने पर तो वे सिर पर चौकी बिछाकर जगराता करने के लिए बैठ जाएँगे।

हर धार्मिक कार्यक्रम के समापन पर तथा पार्टी के जलसों के बाद कुछ जैकारे गूँजा करते हैं, जैसे -जो बोले सो अभय। इसका अर्थ बहुत गम्भीर है। चालीस साल बाद इसका अर्थ समझ में आ पाया है कि जो भी बोला जाए एकदम निर्भीक होकर बोला जाए, बेखटके होकर। मैं समझता हूँ कि केवल बेसिर-पैर की बातें ही बेखटके बोली जा सकती हैं। बाते ऐसी हों कि उनका जब चाहे जो अर्थ निकाल लिया जाए। अपने नेताओं को ही देखिए -बड़ी से बड़ी बेहूदी बात को भी कितने आत्मविश्वास से बोल लेते हैं। यह महारत बड़ी तपस्या के बाद हासिल होती है।

ई-मेल खोलने के लिए जब एक तपस्वी अफ़सर से उनका पासवर्ड पूछा गया तो बड़ी ही मासूमियत से बोले, 'भई वो तो सब पुराने ऑफ़िस में ही छूट गया। वहाँ जाऊँगा, तब लेकर आऊँगा। देखो बड़े बाबू! इस दफ़्तर का भी इण्टरनेट नहीं चल रहा है। लगता है पहलेवाले अधिकारी चाबी ले उड़े। आप मँगवा लो, नहीं तो कैसे काम चलेगा?
''ठीक है साहब,'' बड़े बाबू ने समर्थन में गर्दन हिलाई। मन ही मन मुस्कराए भी-अब मौका हाथ लगा है माल छीलने का। तीन चार-बरस दफ़्तर हम लोगों के लिए कालाहाँडी बना रहा।
''हाँ साहब, कुछ भी हो सकता है।'' छोटे बाबू ने हामी भरी, ''जो करते थे, वे ही करते थे, ई-मेल-फ़ीमेल पता नहीं क्या-क्या! हम लोग तो यहाँ 'ड्राई डे' मनाते रह गए। साहब आपने आकर हमको बचा लिया।
''देखो भाई! कुछ काम तो करना चाहिए। काम भले ही कम करो, काम करने का प्रचार ज़्यादा करो। बेईमानी करो, लेकिन बातें ईमानदारी की करो। पचास प्रतिशत से ज़्यादा खाने वाले को बेईमान कहा जा सकता। दुनिया में फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी का ही महत्त्व है।''
''पचास प्रतिशत!'' बगल में खड़े एक मातहत ने अफ़सर के पैर छू लिए, ''धन्य है साहब, इस कलयुग में भी आप जैसे लोग हैं, तभी तो यह धरती टिकी हुई है, वर्ना न जाने कबकी डूब गई होती।
इस भागवत-कथा का यही सारांश निकलता है कि...
अफ़सर-अजगर दोऊ खड़े, काके लागों पाँय।
बलिहारी अफ़सर करौं, अजगर दियो बताय।

२ फरवरी २००९