हास्य व्यंग्य

चिंता करो, सुख से जियो
अनूप कुमार शुक्ला


हमने दोस्त के यहाँ फोन किया। उसके बच्चे ने उठाया।
मैंने पूछा -पापा कहाँ हैं।
वो बोला- पापा चिंता कर रहे हैं।
क्यों, क्या हुआ? कोई समस्या है क्या? -मैं चिंतित हो गया।
नहीं, नहीं अंकल कोई परेशानी नहीं। पापा तो आजकल रोज चिंता करते हैं। कहते हैं इससे तबियत ठीक रहती है। बच्चा शांत आवाज में बता कम समझा ज्यादा रहा था।

हमारा मित्र रोज चिंता कर रहा है, माने कि दुखी है। उसके दुख में दुखी न हुए तो वो दुख हमारे पास पातक बनकर आएग। भारी वाला। विलोकेगा। लफ़ड़ा होगा। आफ़त है। हमने सोचा मित्र के दुख में दुखी हो आते हैं। अपना पातक बचा लेते हैं। सावधानी सटा के , दुर्घटना घटा लें।

पाँच मिनट में हम दुख जाहिर करने के लिए दौड़े। पहुँचे दोस्त-द्वारे। सोचा पूछेंगे-क्या हाल हैं प्यारे। क्या हुआ अब हम इतने गैर हो गए कि बताते भी नहीं और अकेले-अकेले दुखी हो लेते हो। कम से कम हमारा तो सोचते क्या होगा! ये तो कहो हमने फोन कर लिया वर्ना हम तुम्हारे दुख में दुखी न हो पाते और हमें तो बड़ा दुख पकड़ लेता। तुम इतने खुदगर्ज निकलोगे, सोचा भी न था। तुमसे ऐसी आशा तो न थी।

लेकिन हम कुछ पूछें इससे पहले ही दोस्त ढीले नाड़े वाला पायजामा संभालते हुए बोला- आओ, आओ। बैठो। इतनी सुबह। सब खैरियत तो है। बेटा मून्नू देखो अंकल आए हैं। चाय-पानी लाओ। मम्मी को बुलाओ। देखते आओ सूरज किधर निकला है। कौन कहता है दुनिया में साधुवाद युग का श्राद्ध हो गया। ये तो हमींअस्तो, हमीअस्तो वाला सीन है। हमने पूछना शुरू किया-
सुना है आजकल तुम रोज चिंता करते हो!
हाँ यार तुमको बताना भूल गया। आजकल रोज नियम से चिंतित हो लेता हूँ। जब से चिंतित होना शुरू किया है बहुत फ़ायदा है। वजन कंट्रोल में हैं। टाइम बचता है। घर बैठे सेहत चकाचक। दोस्त के चेहरे पर हमको मूढ़मति मानने वाली दिव्य मुस्कान विराज रही थी।

चिंतित होने से फ़ायदा! ये क्या पहेलियां बुझा रहे हो? सबेरे से कोई मिला नहीं क्या? -हम पानी पीते हुए बोले। हाँ भाई, सच कहता हूँ। चिंतित होने से बहुत फ़ायदा होता है। दिखता नहीं तुमको कि मेरा वजन कितना कम हो गया। -दोस्त उवाचा।
हाँ सो तो देख रहा हूँ पहले से आधे हो गए। ऐसा कैसे हुआ? हम जिज्ञासु बन गए।
ये इसी ‘चिंता थेरेपी’ से हुआ। हम रोज नियमित एक घंटा चिंतित हो लेते हैं। जब से चिंतित होना शुरू किया शान से खाते हैं, शान से सोते हैं। मार्निंग वाक, एवनिंग वाक को अपने रूटीन से डिलीट कर दिया। हम तो कहते हैं कि जिसको अपने स्वास्थ्य की रत्ती भर भी चिंता है उसे चिंता करना शुरू कर देना चाहिए। -दोस्त सूचना मोड से प्रवचन मोड में आ रहा था।

आदमी नियमित चिंता करता रहे तो उसका वजन घटता रहता है। चाहे जो खाए नियंत्रण में रहता है। हमारे यहाँ पहले बहुत से लोग बता गए हैं चिंता से आदमी दुबला होता है। इसीलिए ये देखो हमने अपने घर की दीवारों पर चिंता थेरेपी वाले पोस्टर लगा रखे हैं- चिंता करो, सुख से जियो। चिंता सरोवर में डुबकी लगायें, अपना वजन मनचाहा घटायें। बढ़ते वजन से परेशान, नियमित चिंता से तुरंत आराम। चिंतित होते ही वजन की चर्बी गायब।
लेकिन हमने तो देखा है लोग खूब चिंतित रहते हैं फिर भी दुबले नहीं होते। कैसे तुम्हारी बात सच मान लें। -हमने प्रतिवाद किया।

अब ये तो श्रद्धा-विश्वास की बात है। जिसको श्रद्धा होगी उसकी फ़ायदा मिलेगा। जिसको नहीं होगी नहीं मिलेगा। और फिर चिंता में भी ईमानदारी होनी चाहिए। श्रद्धा में खोट होगी तो चिंता का फ़ायदा नहीं मिलेगा। चिंता शुद्ध होनी चाहिए, २४ कैरेट सोने की तरह तभी आपको लाभ मिलेगा।- दोस्त साँस लेने के लिए रुका।
यार पता नहीं तुम कैसी बातें करते हो। मुझे कुछ समझ में नहीं आता। -हम भ्रमित थे।
हमको भी पहले ऐसा ही लगता था। अच्छा ये बताओ कि ये अमेरिका के राष्ट्रपति इतना स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट छैला बाबू टाइप कैसे बने रहते हैं? -दोस्त अब सवाल करने लगा।

अच्छा तुम ही बताओ भला अमेरिकन राष्ट्रपति की स्लिमनेस का राज- हमने सवाल किया।
वह एक देश में लोकतंत्र बहाल करने के लिए इतना चिंतित होता है कि उस देश को तहस-नहस कर देता है। एक अपराधी को पकड़ने की चिंता में पूरी दुनिया को जहाँ शक होता है रौंद देता है। दुनिया भर में शांति बहाल करने के लिए इतना चिंतित रहता है कि हर जगह अपने हथियार तैनात कर देता है। अपने पास हजारों बम होते हुए भी दूसरे देश के परमाणु परीक्षण को दुनिया भर के लिए खतरा मानकर चिंतित होता रहता है। इसी तरह के तमाम चिंताऒं के कारण ही वह दुबला-पतला, स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट-छैला बाबू टाइप बना रहता है। कुल मिलाकर यह कि वह चिंतित रहता है।
चिंता करना आजकल स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। अगर हम ठीक से चिंतित होना सीख गए तो समझिए स्वस्थ हो गए। पुराने समय में भी जितने महान लोग हुए, जितने दीर्घायु हुए वे सब चिंता करने के ही कारण हुए। भगवान रामचंद्र पहले राज्य जाने के कारण दुखी हुए, फिर पत्नी के अपहरण से, फिर धोबी द्वारा अपनी बदनामी से फिर अपने पुत्रों द्वारा अपनी सेना की पराजय से और बाद में सीतागमन से। इन्हीं तमाम बातों के चलते वे चिंतित होते रहे और कालांतर में मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। यही बात कृष्णजी के बारे में सही है।पहले अनगिनत गोपियों की चिंता फ़िर सोलह हजार पटरानियों के चलते उनकी चिंता की कल्पना ही की जा सकती है। इसी चिंता के चलते वे सोलह कलाऒं युक्त सम्पूर्ण अवतार् माने गए। कबीरदास ने तो डंके की चोट पर कहा- सुखिया सब संसार है खावै अरु सोवै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै। इसी दुखीपने के कारण कबीर दुबले पतले बने रहकर सौ से ज्यादा साल जीए और इतने प्रसिद्ध कवि कहलाए।

आजकल भी देखिए ये जो जीवन अवधि बढ़ गयी है, लोग ज्यादा दिन तक जीने लगे हैं तो इसीलिए कि लोग तमाम तरह की चिंताएँ करने लगे हैं। दुनिया जटिल हो रही है। लोगों की चिंताएँ भी जटिल हो रही हैं। हर समय अंग्रेजीपूर्ण माहौल में रहने वाला हिंदी की स्थिति के लिए दुखी है। बात-बात पर गाली निकालने वाले को समाज में घटते भाईचारे की भावना चिंतित करती है। कुछ लोग अपनी चिंता का स्तर उठाकर देश तक ले जाते हैं। देश की चिंता के बाद भी जिनकी चिंता का स्टाक खतम नहीं होता वो अपनी चिंता का तंबू पूरे विश्व में तान देते हैं। दुनिया में आज जहाँ भी परिवर्तन हुए हैं वे सब के सब चिंतित लोगों के कारण हुए। अपने देश की आजादी की लड़ाई में जो भी महान नेता हुए वे देश की चिंता में दुबले रहते थे तब जाकर हमें आजादी मिल पायी। गांधीजी देश की चिंता के ही कारण वे इतने दुबले-पतले थे कि सरपट चलकर हर क्षेत्र में पहुँचकर चिंतित हो जाते थे। इसीलिए देश को आजाद कराने में उनका नाम आदर से लिया जाता है। अगर अभी तक आप चिंतित रहना नहीं सीख पाए तो समझ लीजिए आपकी जीवन शिक्षा अधूरी है। आप तुरंत उठिए और चिंता करना शुरू कर दीजिए।

उद्बोधन इसके बाद समाप्त हो गया। हम उठकर चल दिए। रास्ते में हमने अपने साथ के युवा दोस्त, जो दोस्त के घर मेरे साथ गया था और जिसने अपने स्वभाव के विपरीत अब तक चुप रहकर अपनी समझदारी का परिचय से दिया था, से पूछा- क्यों यार इस चिंता थेरेपी के बारे में तुम्हारा क्या कहना विचार है?

भाई अगर आप बुरा न मानें तो मुझे तो आपका यह दोस्त सिरफ़िरा लगता है।-युवा साथी ने राय दी!
नहीं यार, इसमें बुरा मानने की क्या बात। जो सच है सो है। सच को कोई थोड़ी झुठला सकता है। लेकिन तुमको मेरा दोस्त क्यों सिरफिरा लगता है?-मैंने कारण जानना चाहा।

अरे उसको ये तक नहीं पता कि आजादी के समय यहाँ कोई गांधी नहीं थे। प्रियंका, राहुल, वरुण गांधी उस समय पैदा नहीं हुए थे। सोनिया गांधी, मेनका गांधी दोनों की उस समय शादियाँ हुईं नहीं थी लिहाजा उनके आजादी दिलाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। फिर कहाँ से गांधीजी आजादी के समय आ गए। जबकि आपका दोस्त बताता है कि गांधीजी ने देश को आजाद कराने में योगदान दिया। आपके जिस दोस्त की इतिहास की समझ इस हद दर्जे की माशाअल्लाह है उसकी किसी भी बात पर गौर करने के पहले से मैं हजार बार विचार करूंगा। मुझे तो चिंता होने लगी है कि कैसी-कैसी समझ वाले लोग आपके दोस्त हैं।
अपने नौजवान दोस्त की बात सुनकर मैं भी चिंतित होने लगा।
आपके क्या हाल हैं? आपने चिंतित होना शुरू किया कि नहीं!

९ मार्च २००९