हास्य व्यंग्य

दाल गल रही है
अविनाश वाचस्पति


दाल गलना एक मुहावरा है। दाल न गलना यानि काम न होना। लेकिन जिस तरह आजकल महँगाई बढ़ रही है उसे देखकर कहना पढ़ता है कि महँगाई की दाल खूब गल रही है। अरहर की दाल के दाम आसमान छू रहे हैं। यही दाल है जो भारतीय परिवारों में रोज़ खाई जाती है। दाल अरहर की है पर इसे बाँटने में दिल्‍ली सरकार की जो खिचड़ी बन रही है, वो बीरबल की खिचड़ी की याद दिला रही है। दाल ऐसा शेयर बन चुकी है जिसकी कीमत गिरती नहीं है और काबू में नहीं आ रही है। हाल ये है कि कीमतें बढ़ने की बजाय तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ रही हैं और वो भी आम आदमी की जेब दर जेब, आँख दर आँख और कंधा दर कंधा मिलाकर बिल्‍कुल अंधा करती हुई।

अगर तकनीक का उपयोग अथवा दुरुपयोग कहें, करके दाल की फोटोप्रतियाँ करवा कर प्रयोग में लाई जा सकतीं तो वैसी फोटोकापियर मशीनों का भविष्‍य दाल से अधिक अरहरा (सुनहरा की तर्ज़ पर)   हो गया होता। दालों पर बने मुहावरे ये मुँह और मसूर की दाल की जगह अब यह मुँह और अरहर की दाल लेने ही वाले हैं। दाल की इस ऐतिहासिक तेज़ छलांग ने मुर्गियों की कीमतों को इस तरह धराशायी कर दिया है कि घर की मुर्गी दाल बराबर मुहावरा भी अपना अर्थ खो चुका है। दाल के दाम मुर्गी के दाम को छू रहे हैं। लगता है जल्दी ही ये उससे भी आगे निकल जाएँगे।

सब्ज़ियों की कीमतें उछलती कूदती रहती हैं। पर उनका फुदकना बचपन के फुदकने जैसा है। दाल का फुदकना वयस्क बात है। यह तो राहत बाँटने के साथ ही आहत करती चलती हैं। सब्जियों का उछलने कूदने का जज़्बा उन्‍हें सदा सुर्खियों में बनाए रखता है, पर दाल की तो यह तानाशाही है। उसके दाम जो एक बार बढ़ते हैं तो फिर बढ़ते ही हैं, उनमें गिरावट का कोई अंश नज़र नहीं आता जबकि बढ़ते दाम का दंश देश के आम-ख़ास हर वंश को आतंकित कर रहा है। सब बिलबिला रहे हैं पर कर इतना भी नहीं पा रहे हैं कि इससे मुक्ति का कोई शाश्‍वत उपाय हासिल कर सकें।

पहले दे दाल में पानी वाला मुहावरा काफी प्रचलन में रहा है पर आज यह मुहावरा कम ज़रूरत ज्यादा बन गया है। जूतियों में दाल बँटना ने दाल को दलित श्रेणी में शुमार कर दिया था परन्‍तु अब बाज़ी पलट गई है। दालों का दाना-दाना दमदार हो गया है। किसी की क्‍या मजाल कि जो इनकी शान में, इनके टूटे दाने के बारे में भी हल्‍की सी भी बयानबाजी कर सके। दालों के दाम अपने आप बढ़ना स्‍वंयभूत ऐसी प्रक्रिया है जो दाल खाने के आदी लोगों को जीते जी भूत बना रही है। जबकि ये सब जानते हैं कि भूत न दाल खाते हैं न भात पर जो अपने जीवन में दाल भात न खा पाएँ वे अवश्‍य भूत बनते हैं। ऐसी कई प्रमाण मिले हैं।

दालों का धुली होना एक अलग श्रेणी है पर धुली अरहर का ध बदस्‍तूर कीमतों को जिस प्रकार धक्‍का दिए जा रहा है, वो अनुभूत है पर दुखद है। न जाने यह सत्‍ता से और घर से किस-किस को धकेल कर मानेगा।

वैसे एक सच्‍चाई जान लें कि एक व्‍यक्ति जो पहले एक मुट्ठी दाल खाता था, दाम बढ़ने के बाद उसका पूरा परिवार अब एक मुट्ठी दाल मुश्किल से खा पाता है। आजकल पानी भी खुलकर नहीं मिल रहा है नहीं तो दाल में पानी दे देकर काफी अतिथियों को निबटाया जाता रहा है। आपने सुना ही होगा तीन बुलाए तेरह आए- दे दाल में पानी। पर लगता है पानी भी हड़ताल पर है। जहाँ होना चाहिए वहाँ नहीं होता और जहाँ नहीं होना चाहिए वहाँ भरपूर होता है। दाल और पानी में यही भेद है। आप चाहें तो दाल को अधिक दाम देकर अपना बना सकते हैं, गोदामों में बसा सकते हैं पर अगर आपने पानी के साथ ऐसा किया तो वो ज़रूर आपको डुबा ही देगा, या कह सकते हैं कि डुबाकर भी मान जाए तो खैर मनाइएगा।

खैर सलाह सिर्फ यह है कि दाल को दिल पर न लें। इससे दिल ख़तरे में पड़ सकता है। मँहगी हो जाने के बाद जल्‍द ही डॉक्‍टरों द्वारा दाल खाने की सलाह दी जाने लगेगी। दालें डॉक्‍टरों के लिए भी कमाई का एक नया ज़रिया बन जाएँगी। वे दाल बेचने वालों से कमीशन लेकर पर्चे पर लिखेंगे- पाँच दाने मूँग की दाल का दिन में एक बार सेवन करें अथवा दिन में तीन बार अरहर की १०० ग्राम कच्‍ची दाल का दर्शन करें। इत्यादि।

अभी तो अरहर में ही अरहरापन आया है। जल्‍दी ही और दालें इस रोग से संक्रमित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो चने की दाल में चनापन (कड़ापन) आएगा और, मसूर की दाल (कसूरवार) बन जाएँगी। अवाम को इनसे न उलझने की चेतावनी दी जाती है। कोई आश्‍चर्य नहीं दाल की मौजूदगी किराना दुकानों से हटकर दवाई की दुकानों में कब्‍ज़ा जमा ले। ऐसा भी हो सकता है ब्यूटी पार्लरों में इसके शेल्फ़ लग जाएँ जहाँ रूप गर्विताओं को सलाह दी जाएगी कि उबले चावलों के ऊपर दस दाने अरहर के सजाने से जो अरहरापन आ जाता है, वो सोने के हार में रत्‍नों के पचास नग सजाने में भी नहीं आता। इसलिए दाल अब दलित नहीं रही। गरीबों की दाल अब अमीरता के अमरत्‍व को प्राप्‍त कर चुकी है। सोने की कीमतों से मुकाबला करती दाल अब सोने को मात दे रही है। जल्‍द ही बाज़ारों में दालजडि़त आभूषण और परिधान अपनी पैठ जमाएँगे।

आढ़तियों के कब्‍जे से निकल फैशन के मंचों पर लहराती दाल इतराने लगे तो दाल का दोष नहीं। दोष दाल को दाल न रहने देने वालों का है, इससे राजनीति करने वालों का है। रुप रंग देखें तो स्‍वर्णता ही दाल की अमरता है और भूखे को तृप्त करने में ही इसकी सार्थकता है। ऐसा न हो कि एक ओर लोग भूखे मरें और दूसरी ओर लोग इसे गहनों में जड़वाएँ। इसका निवास तो भोजन के महल में तृप्ति के सिंहासन पर ही है। इसे इसके इस अनमोल सिंहासन से उतारना किसी के बूते की बात नहीं और यही अरहरापन लुभा गया है मुझको।

१७ अगस्त २००९