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हास्य व्यंग्य

हंगामा देवलोक में 
— योगेश अग्रवाल


इंद्रासन ले लो या शेषन का सिंहासन ले लो। अमेरिकी प्रशासन ले लो या फिर 'सुदर्शन' ले लो। कहीं का पीएम पद ले लो या ठाकरे श्री का उत्तराधिकार ले लो। कहो तो 'ए.बी.सी.' तुम्हारे नाम करा दें। हे युग पुरुष! माता लक्ष्मी को इस धर्म संकट से मुक्त करो और अपने इस 'एक वरदान' को छोड़कर कोई भी दूसरा वरदान माँग लो-कृपया।

घंटों से चल रहा था यही सीन। मुझे मनाने का। पर मैं तटस्थ था अपनी ज़िद्द पर। मेरे एक ही वरदान ने चकरा दिया था धनदेवी को। अन्य देव भी दौड़ पड़े मुझे मनाने। 'संयुक्त मोर्चा' बन गया मुझे मोहपाश में जकड़ने के लिए। अंततः नारद की सलाह से ज्ञानदायिनी को पुकारा गया। पर, कुंभकर्ण और मंथरा की मति को फेर देने वाली देवी भी सोच में पड़ गई मेरी ज़िद देखकर।

कितना चालाक है ये बालक? माँगा भी तो क्या? उल्लू? तीन-तीन वरदान के बदले केवल एक वरदान, 'लक्ष्मी' के दिशा निर्देशक 'उल्लू' का वरदान! इस एक वरदान के मिलते ही सारे आसन इसे यों ही मिल जाएँगे। प्रशासनों की दिशा-दशा यही तय करेगा भविष्य में। कितना गंभीर रहस्य है इसकी माँग के पीछे? बवंडर की गति से उठ रहे थे ये विचार, देव मस्तिष्कों में। सभी जड़वत थे। पर मैं... अडिग था।

समय अधिक होते देखकर कुछ पल के लिए सोचा मैंने- -कि किसी प्रजातांत्रिक देश का 'महान तांत्रिक' हो जाने का वरदान माँगू। कि निरीह गायों का टनों चारा हजम करने वाले 'सांड' हो जाने का वरदान माँगू। -वरदान माँगू कि 'खजुराहो' हो जाऊँ मैं भी। -भोरमदेव या फिर 'अजंता-एलोरा' हो जाऊँ मैं, ताकि हर एंगल से लोग झाँके मुझे। -ताकि सभ्यता-संस्कृति की ज़िंदा मिसाल कहलाऊँ मैं, ताकि शोध का विषय बन जाऊँ मैं... -और जब लोग बिसरने लगे मुझे तो किसी 'अंतर्राष्ट्रीय पेंटर' की 'प्रगतिशील कृति' बन जाऊँ मैं। -या 'उस' परदेशी की तरह समुद्री किनारे नंगे दौड़कर, या फिर अजगर लपेटकर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार हो जाऊ मैं। -क्या मोनालिसा की मुस्कान बन जाऊँ मैं?
-या मायावती-सा पहलवान हो जाऊँ मैं?

एकाएक बिजली-सी तड़की मेरे दिमाग में और लगा कहीं मैं टँगिया अपनी ही डाली पर तो नहीं चला रहा हूँ? 'देव उल्लू' को हैंडल करना क्या इतना आसान है? 'उल्लू' माँगने से अच्छा क्यों न अपने ही भीतर के 'उल्लू' को जगाऊँ मैं। वैसे भी विराने गुलिस्ताँ की ख़ातिर बस एक ही उल्लू काफी है। अपने अस्तित्व की सुरक्षा के डर से हड़बड़ाकर मैंने देरी का बहाना बताकर तत्काल एक दूसरा वरदान माँग लिया- 'हे माते! मैं भीड़ से अलग हो जाऊँ' और इसके पहले कि मैं दो वरदान और माँगता, पिछले कई घंटों से पस्त माता सहित समस्त देवलोक तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए, शायद ये सोचकर कि मैं पलट न जाऊँ अपनी जुबान से।

और तथास्तु का हश्र ये हुआ... कि हम लेखक हो गए। हम हो गए एक प्रगतिशील विचारक। इसलिए सर्वाधिक अच्छी मुझे अब 'नंगी तस्वीरें' लगती हैं। कला-संस्कृति की जीवतंता 'निहारने' आए दिन बस्तर का दौरा किया करता हूँ। वरदान पा लेने के बाद लगता है, सर्वाधिक प्रगतिशील मैं ही हूँ।

सीधी सपाट सामाजिक आवश्यकताओं को नकारकर, ग़ैरज़रूरी तथ्यों को ज़बरदस्त ज़रूरी सिद्ध करने में बड़ा मज़ा आता है। 'हादसों' पर बंद कमरे में कलम चलाने और कुछों की छींक पर गंभीर नाटक खेलने में मज़ा आता है। गोष्ठियों में, बुद्धिजीवियों-गणमान्यों के बीच अपना माल्यार्पण करवाने में मज़ा आता है। प्रगतिशीलता ही ओढ़ता हूँ, प्रगतिशीलता को बिछाता हूँ। उसी का खाता हूँ, उसी का पीता हूँ। कुल्ला भी... प्रगतिशीलता का ही करता हूँ। बहुत खुश हूँ मैं, वरदान पा लेने के बाद। आए दिन सुर्खियों में रहता हूँ। भीड़ चलती है मेरे पीछे।

बावजूद इनके... जब-जब भीतर के खोखलेपन का एहसास गहराता है अकेले में। एक बात ज़रूर कचोटती है मेरे मन को कि आखिर एक 'आदमी' हो जाने का वरदान क्यों नहीं माँगा मैंने माँ से??  कदाचित ज्ञानदायिनी को भी नकारने का दुष्परिणाम भुगत रहा हूँ, मैं 'प्रगतिशील' होकर।

१२ अक्तूबर २००९

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