हास्य व्यंग्य

अंकल माने चाचा, ताऊ या बाबा
महेशचंद्र द्विवेदी


मैंने मिडिल स्कूल के कक्षा छ: में अंग्रेज़ी की पढ़ाई प्रारम्भ की थी। मेरे स्कूल में हाई स्कूल पास अंग्रेज़ी मास्टर का बड़ा रुतबा था क्योंकि अन्य अध्यापक केवल मिडिल पास थे और अंग्रेज़ी में काला अक्षर भैंस बराबर थे। मास्टर साहब ने हमें 'ब्रोदर' का मतलब भाई, 'सिस्टर' का मतलब बहिन, 'फादर' का मतलब पिता जी, 'अंकिल' का मतलब चाचा जी आदि कई रिश्तों की अंग्रेज़ी सिखाई थी जिसे हमने अक्षरश: घोंट लिया था। यह बात न तो हमारे मास्टर साहब जानते थे और न हम कि 'अंकिल' का मतलब चाचा ही नहीं होता है वरन् ताऊ, फूफा, मामा भी होता है और मौका पड़ने पर बाबा भी हो सकता है। परंतु इस अज्ञानता से कोई अंतर नहीं पड़ा था क्योंकि अंग्रेज़ीदां हो जाने पर भी हममें से किसी छात्र ने किसी व्यक्ति को ब्रोदर, अंकिल, मदर या फादर कहकर पुकारने का साहस नहीं किया था- एक तो इन शब्दों को समझने वाला गाँव में कोई नहीं था और दूसरे हमें भय था कि हमारी बात नापसंद आने पर हमसे बड़ा कोई भी व्यक्ति हमारे कान ऐसे उमेठ सकता था जैसे स्प्रिट को उड़ने से रोकने के लिए उसकी बोतल का ढक्कन कसा जाता है।

फिर पढ़-लिखकर और ब्याहा-ठ्याहा होकर जब मैं चालीस पार कर गया था तब भी मेरे मन ने मेरी बढ़ती आयु को स्वीकार नहीं किया था, और मैं अपने पाँचवीं मंज़िल के कार्यालय पर दो-दो सीढ़ियाँ एकसाथ चढ़ कर जाता था। मैं सामाजिक सम्बंधों में आए परिवर्तनों के विषय में भी भलीभाँति 'ग्रो' नहीं किया था। अत: यह नहीं जान पाया था कि इक्कीसवीं सदी के आने की खबर से छोटे इतने मनबढ़ हो गए हैं कि किसी बड़े को कुछ भी सम्बोधित करें, बड़ों में छोटों के कान उमेठने का साहस अब नहीं बचा है। अब रिश्तों का भी वैश्वीकरण हो रहा है और नगर-नगर, गाँव-गाँव 'अंकल' शब्द का प्रयोग ऐसे फैल गया है जैसे ऋतु परिवर्तन पर ज़ुकाम का वाइरस फैल जाता है। ऐसी अज्ञानता का बोझ ओढ़े एक दिन मैं एक दूकान में कुछ कपड़े देखने के लिए घुसा था कि एक नवयुवती, जो वहाँ एक स्टूल पर बैठी हुई थी, खड़े होकर बड़े आदर से बोली थी, ''अंकल, आप इस स्टूल पर बैठ जाइए।'' बात यह थी कि उस छोटी-सी दूकान में दो ही स्टूल थे जिनमें एक पर वह नवयौवना बैठी हुई थी तथा दूसरे पर एक अन्य महिला, और मैं अपने हरजाई बालों द्वारा वेत-श्याम वर्ण धारण कर लेने के कारण उस युवती को उम्रदराज़ दिखा था। मेरे लिए किसी अजनबी युवती द्वारा अंकल पुकारे जाने का यह पहला अवसर था। चूंकि अपनी उम्र को झुठलाने हेतु बेचैन मेरा मन तब तक अपने को किसी नवयुवक से अधिक मानने को तैयार नहीं हो पाया था, अत: उस युवती द्वारा आदर भाव से आफ़र किया गया स्टूल भी मुझे कंटकाकीर्ण लगने लगा था। 'अंकल' का सम्बोधन मेरी नस नस में सीसे-सा पिघलता चला गया था और अगर वह एक युवती न होती, तो मैं अपने को यह कहने से कठिनाई से रोक पाता, ''कौन अंकल? अंकल होंगे तेरे बाप, अंकल होंगे तेरे बाबा, अंकल होगा तेरा सारा खाऩदान।'' पर भाई शराफ़त भी कोई चीज़ होती है और कम से कम अजनबी स्थान पर युवतियों के सम्बंध में तो निभानी ही पड़ती है, सो मैं थोड़ी आनाकानी के बाद 'थैंक यू' कहकर कांटों समान चुभते उस आसन पर उटंगा-सा बैठ गया था। फिर जल्दी से खरीदारी समाप्त कर दूकान से बाहर निकल आया था।

बाहरी चोट लग जाए तो मलहम लगाकर और पीड़ाहारक गोली खाकर उसका दर्द कम कर दिया जाता है, परंतु मन की चोट में जितना मलहम लगाओ, उतनी ही दुखती है। मेरा 'अभी तो मैं जवाँ हूँ' होने का विश्वास ऐसा डांवाडोल हो गया था कि दूकान के बाहर आकर मेरे सामने जैसे ही कोई युवती पड़ जाती, मुझे लगने लगता कि अभी 'नमस्ते अंकल' बोलकर मुझे चिढ़ाने लगेगी। इसलिए मैं किसी युवती के दूर से दिख जाने पर ही तुरंत मुँह फिराकर इधर उधर देखने लगता था। और उसके निकट आते आते मेरे पैरों में ऐसी तेज़ी आ जाती थी जैसे हाजत का मारा हुआ बाथरूम को भाग रहा हूँ। हाजत के मारे हुए की स्पीड कितनी हो जाती है, यह बात मुझे आप को बताने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि संसार में ऐसा बिरला हीर मनुष्य होगा जिसने वे अदम्य उत्तेजना के क्षण कभी न झेले हों। मेरे एक रिश्तेदार का तो दावा था कि 'बंदूक की गोली का मारा हुआ तो चाहे आप के रोकने पर ठहर जाए, पर हाजत का मारा हुआ कभी नहीं रुक सकता है।'

आइंस्टाइन रिलेटिविटी का सिद्धांत प्रतिपादित करते समय एक बात बताना भूल गए थे कि समय किसी व्यक्ति की आयु के समानुपात में उस पर धीमी अथवा तेज़ गति से गुज़रता है। मैं जब छोटा था तो एक जन्मदिन के बाद दूसरे जन्मदिन के आने तक ऐसा लगता था कि एक युग बीत गया है और फिर जैसे-जैसे मैं बड़ा होता जा रहा हूँ, वैसे वैसे जन्मदिन इतनी जल्दी-जल्दी आ रहे हैं जैसे मंदिर में क्यों में लगे दर्शनार्थियों को पुलिसवाला पीछे से डंडा लेकर खदेड़ रहा हो। अत: मेरी आयु के अगले बीस साल ऐसे कट गए, जैसे चलचित्र की रील को फ़ास्ट-फ़ारवर्ड कर दिया गया हो। इस बीच मैं पोते-पोतियों वाला होकर बाबा बन गया। अब इस आशंका से मेरी नींद हराम रहने लगी कि कहीं अजनबी नवयुवतियाँ अब बाबा न पुकारने लगें। परंतु भला हो सभ्यता के ग्लोबलाइजेशन का कि अब कोई नवयुवती किसी अजनबी को बाबा सम्बोधित कर अपने को 'बहिनजी' समझे जाने का दंश नहीं झेल सकती है। आजकल हर आयु का अजनबी मुझे सिर्फ़ 'अंकल' पुकारता है जिससे मैं अपने को अपनी आयु से बीस वर्ष छोटा होने का भ्रम पालकर मगन रहता हूँ।

हे कवि केशव! यदि तुम आज के युग में जिये होते, तो चंद्रबदन, मृगलोचनी तुम्हें भी बाबा कहने के बजाय अंकल ही कहतीं और तुम जैसे जवाँदिल कवि को चचा-भतीजी में और अधिक न सही तो गुड-फ्रेंडशिप स्थापित कर लेने का सुअवसर अवश्य प्राप्त हो जाता।

११ मई २००९