हास्य व्यंग्य


बाजार में निकला हूँ
शम्भूनाथ सिंह


इन दिनों बाजारों का मिजाज का नये ढँग और निराले अंदाज में है। अर्थशास्त्र के नियम से बँधा तो कत्तई नहीं। माँग और आपूर्ति के आधार पर भी नहीं। बस यों समझ लीजिए कि बिल्कुल एक नये आकर्षक रूप में। एकदम बदला-बदला रंग ढंग। अब आप को ढूँढे से भी वो बाजार नहीं मिलेगा, जहाँ सौदा-सुलुफ निबटाकर लोग पत्ते के दोने में कचौड़ी और जलेबी का आनंद लेते थे। ऐसा आनंद जैसे 'आठहु सिधी नवों निधि` को प्राप्त कर गये हो। अब वो शर्मा जी भी नहीं रहे, जो परले दर्जे के बाजारू किस्म के जीव हुआ करते थे। चाहे साँस लेना भूल जाएँ, बाजार जाना नहीं भूलते थे। वो भी खरीददारी करने कम, मोल भाव करने ज्यादा, मगर जाते जरूर थे।

अगर कभी नागा मारना ही पड़ा, तो निम्न रक्त-चाप के मरीज की तरह अकबकाने लगते थे। तब लोग उन्हें बजाए चीनी चटाने के, टाँग टूँग कर बाजार पहुँचा देते थे, और बाजार पहुँचते ही शर्मा जी गुल्ल-फुल्ल। बेचारे लौट कर रेडियो के समाचार वाचक की तर्ज पर, एक साँस में अरहर मूँग से लेकर धनिया मिर्ची तक का बाजार भाव बाँच देते। मगर अब वो बात कहाँ? चट्टी से लेकर पेठिया तक, मंडी से लेकर हाट तक सब एक-एक कर वीर गति को प्राप्त होते जा रहे हैं, और अब जो इनके स्थान पर नई पौध अवतरित हो रही है, उसका नाम है, वॉल स्ट्रीट, दलाल स्ट्रीट, स्टॉक एक्सचेंज और 'जबड़ा` बाजार, जिसे चलताऊ भाषा में शापिंग मॉल कहा जाता है। जहाँ अरबों-खरबों दाएँ से बाएँ, और बाएँ से दाएँ ऐसे खिसक जाते हैं, कि न खरीदने वाले के माथे पर शिकन न बेचने वाले के बदन में खरोंच। आप चाहे ताली पीटें या माथा।

सो हम भी निकल लिए एक दिन नये बाजार की तरफ। बाजार सचमुच नयनाभिराम, दर्शनीय, मन खैंचू। सलमा सितारों से चमचम होर्डिंग में लिखा था 'विश्व-बाजार में आपका स्वागत है।` मेरा माथा ठनका, यह विश्व बाजार क्या बला है? बाजार तो बाजार होता है, जहाँ लोग अपने जरूरत सामान खरीदते-बेचते हैं। इसी उधेड़ बुन में आगे बढ़ा। बाजार की तो सचमुच रंगत ही बदली हुई थी। एक से एक बढ़ कर चमचमाते हुए साइन बोर्ड, आँखें चुँधियाती, लाल, पीली, हरी, नीली बत्तियाँ। शो केस ऐसा, कि छूने को जी ललचाए, माल ऐसा कि बिन खरीदे रहा न जाए। गहमा-गहमी भाग-दौड़, आपा-धापी, शोरगुल, क्रेता से विक्रेता तक बदहवास। हाँ, मैले कुचैले, चिथड़े वाले, इस बाजार से बाहर धकियाए जा रहे थे। आखिर बाजार का बाजारूपन भी तो बरकरार रखना है। सो 'दूर ही रहो ऐ!

भुक्खड़ों! की तर्ज पर उन्हें गरदनिया दिया गया था। एक क्षण तो पछतावा होने लगा, नाहक इतने दिनों तक विमुख रहा बाजार से। फिर सिर झटक कर शामिल हो लिया रेले में। बाजार सचमुच विश्व बाजार का आभास दे रहा था। तमाम तरह के देसी-विदेशी मुखौटे उड़ते फिर रहे थे बाजार में। यहाँ सब कुछ बेचा और खरीदा जा रहा था। 'एक ही छत के नीचे सब कुछ` की तर्ज पर नहीं, बल्कि अलग-अलग स्टॉल लगा कर।

पहला स्टॉल हथियारों का था। एकसे बढ़कर एक घातक हथियार, बमवर्षक, युद्धक विमान एवं जानलेवा उपकरण, बमों की विशेष वेराइटी, अणु से लेकर परमाणु तक, हाइड्रोजन से लेकर नेपाम तक। खरीद लेने को जी मचल जाए। कोई भी आइटम लेने पर, एक जहाज विदेशी कचरा मुफ़्त। जी, हाँ, विदेशी कचरा भी तो मेरे लिए नेमत है। पैसे की चिंता आप न करें। बगल में विदेशी बैंक है न, चमड़ी उधेड़ लेने की शर्त पर, मनचाहा कर्ज देने को तैयार। रोटी के लिए भले कर्ज न मिले, बम के लिए अवश्य मिलेगा। दलाल कमीशनखोर, लोगों को पटा पटा कर दुकान के अंदर भेज रहे थे।

एक स्टाल पर नंगई, गुंडई, दादागिरीधौंस पट्टी बेची जा रही थी। बाहुबली टाइप के ग्राहकों का जमावड़ा था यहाँ पर। शरीफ ग्राहक तो पास फटकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे। अगर नमूने के तौर पर दो-चार धौल-धप्पा मुफ़्त में मिल गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे। अगले स्टॉक पर 'ग्रेट सेल` लगा हुआ है, क्रिकेटर बिक रहे हैं, फ़िल्मी हीरो-हिरोइनें बिक रही हैं। धन-पति थैले का मुँह खोले बैठे हैं। ऊँचे से ऊँचा दाम लगा लो, चल गया तो बेड़ा पार लगा देना। हीरोइनें कपड़े के हिसाब से बिक रही हैं। जितना कम कपड़ा, उतना ज्यादा दाम। नंगी तो 'हॉट-केक` की तरह बिक रही हैं।

आगे बढ़ो! टेंट में माल है तो, यहाँआदमी बिक रहा है। चाहे साबूत खरीद लो, या टुकड़े में, आँख, नाक, कान, गुर्दा, फेफड़ा, दिमाग, सब बिक रहा है। यह बात अलग है कि साबुत आदमी का दाम बहुत कम है। सिर्फ रोटी प्याज पर-फिर भी ग्राहक नहीं मिल पा रहा है। थक हार कर आदमी घर लौट जाता है। कल तक बिकने की आस लिए। एक समझदार व्यक्ति ने बीच बाजार में ही कोचिंग इंस्टीट्यूट खोल रखा है। बाकायदा अपहरण, फिरौती, जाल-साजी, तस्करी, लूट-पाट, राहजनी, हत्या, बलात्कार आदि में डिग्री, डिप्लोमा स्तर का प्रशिक्षण देकर पैसा बटोर रहा है। बेकार लोग यहाँ से पढ़ कर लाभान्वित हो रहे हैं।

अगली दुकान सांप्रदायिकता की है। साथ में दंगा फैलाने की किताब मुफ़्त। सभी धर्मों की लुटिया डुबोनेवाले ग्राहकों का यहाँ जमघट लगा है। पाखंड और अंधविश्वास चाहिए तो वो भी उपलब्ध है। उपहार के तौर पर गंडा, ताबीज रियायती दर पर। हाँ! यह स्टाल खूब जगमगा रहा है, जवान लड़के-लड़कियों से लेकर जईफ बुजुर्ग भी यहाँ मक्खियों की तरह भिनभिना रहे हैं। यहाँ पर निर्लज्जता बेची जा रही है। थोक खरीद-कीजिए, नंगापन की एक सी.डी. ईनाम पाइए।

बाजू वाले स्टाल पर जातिवाद, प्रदेशवाद, क्षेत्रीयता और अलगाववाद की सेल लगा रखी है। 'बेहया के लत्तर` की तरह किसी भी जमीन पर भरपूर फसल की गारंटी दी जा रही है। पहले कुछ खास प्रदेशों में ही इसकी उपज होती थी। अब सारा देश इसकी पैदावार में लग गया है। बल्कि देश की मुख्य उपज यही हो गयी है।

कुछ लोग पक्का स्टाल न मिलने की सूरत में फुटपाथ पर ही जम गये हैं। छोटे-छोटे पैकेटों में आँसू, हँसी, ममता, खुशी, प्रेम, करुणा, अपनत्व, भाईचारा, मेल-मिलाप, सौहार्द, दया, मानवता, स्नेह, इज्जत, अस्मत, लज्जा, बेच कर अच्छी कमाई कर रहे हैं। क्योंकि बगल वाले फुटपाथी से उनकी प्रतियोगिता है। वो लगभग मुफ़्त में घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, दुश्मनी, वैमनस्य, नफरत, दुख, क्रूरता, क्रोध, लालसा इत्यादि बेच रहा है। दाम इतना कम है कि लोग डब्बा भर-भर कर खरीद रहे हैं। या यों कहिए लूट रहे हैं। वाह रे बाजार! सॉरी, विश्व बाजार। खरीददारों की लिस्ट चुक जाए पर सामान की कमी नहीं। आप भले थक जाएँ, माल हमेशा तरोताजा। आखिर विश्व बाजार जो ठहरा। थक कर मैं भी लौटने को हुआ। पर एक कर्मकांड बाकी था। गेट के बगल में एक बड़ा सा शामियाना लगा है। बीचो-बीच सजा धजा कर देश का नक्शा रखा हुआ था।

उद्घोषक गलाफाड़-फाड़ कर चिल्ला रहा था, 'पुड़िया फरोश` की अंदाज में। अभी अभी, जल्दी ही, इसकी नीलामी होने वाली है। आईए, जल्दी आईए! ऊँची से ऊँची बोली लगा कर इसे खरीद ले जाइए। इतना सुंदर, सस्ता और टिकाऊ माल न अब तक मिला था, न मिलेगा। माल के स्वयंभू मालिक बन बैठे धोती, कुर्ता, टोपी, पाजामा में, मूछों पर ताव दे रहे थे। बीच बीच में गेट के तरफ भी आतुर निगाहें दौड़ा लेते। बोली लगाने वाले गेट के बाहर सूट, बूट, टाई, हैट में चहलकदमी कर रहे थे। बीच में बाधा बने कुछ लोग, दोनों के मंसूबों पर पानी फेर रहे थे।

नारे बाजी कर रहे थे। 'चाहे जितना दाम लगा लो, देश हमारा नहीं बिकेगा।` रस्साकशी जारी थी। पर कब तक! जब देश के तथाकथित मालिक ही नीलामी पर आमादा हैं, तो बकरे की अम्मा कब तक जान की खैर माँगेगी। बहरहाल, प्रतिरोधकों के बुलंद हौसले को देख कर आस की एक लौ तो जरूर टिमटिमा रही है रब्बा खैर! मामला तनातनी की हद तक पहुँचते देख वहाँ से खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी। मगर इतना आसान थोड़े है, आज के बाजार से सुरक्षित बच निकलना। ठोकर लगनी ही थी। सो गिरे धड़ाम से। आँख खुल गयी। देखा, चारपाई से मेरा संबंध विच्छेद हो चुका था। मैं धूल धूसरित हो छत की ओर एकटक देखे जा रहा था।

२ अगस्त २०१०