हास्य व्यंग्य


बापू के बंदर राष्ट्र की मुख्यधारा में
राजेंद्र त्यागी


असत्य वचन न बोलने की नसीहत देने वाले बंदर ने मुँह पर से हाथ हटाया। हवा लगते ही मुँह का आकार वृद्धि को प्राप्त हुआ। उसने चारों ओर देखा और फिर हाथ से मुँह का आकार नापते हुए, साथियों से बोला, ''यह क्या हो रहा है, दोस्तों! ..चारों दिशाओं से असत्य वाणी सुन रहा हूँ, असत्य कर्म देख रहा हूँ! चारों ओर असत्य ही असत्य!'' साथी के सत्य वचन सुन कर दूसरे बंदर पर भी नहीं रहा गया। उसने आँखों पर जमे हाथों के बंधन से आँखें मुक्त की। बाहरी हवा के संपर्क में आते ही उसकी आँखों ने भी विस्तार लिया। साथी के कथन का समर्थन करते हुए वह बोला, ''सत्य वचन दोस्त! मैं देख तो नहीं सकता था, क्योंकि बापू ने मेरी आँखें बंद कर दी थी, लेकिन मेरे कानों में केवल असत्य ही असत्य गूंज रहा है।'' तीसरा बंदर जो कानों में अंगुली डाल कर असत्य न सुनने की नसीहत प्रचारित करने में व्यस्त था, अपने दोनों साथियों के कृत्य पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला, ''अरे! यह क्या किया? मुँह और आँखों पर से हाथ उठा लिए! बापू के आदेश की अवहेलना! क्या सोचेंगे बापू? उनकी आत्मा को ठेस लगेगी।''

साथी की दकियानूसी बात सुन कर एक बोला, ''आँख, मुँह, कान मुक्त करने भर से बापू की आत्मा क्षतिग्रस्त हो जाएगी और बापू का नाम ले लेकर उनकी आत्मा का जूस निकाल कर पीने वाले शिष्यों के कृत्य से क्या आत्मा पुष्ट हो रही है? मूर्ख न बन! तू भी कानों के अंदर ताजी हवा जाने दे, कानों को विस्तार प्राप्त होने दे।'' दूसरा बोला, ''हमारे ढोल पीटते रहने से न तो असत्य के अस्तित्व आँच आई है और न ही सत्य के जर्जर शरीर में जान आई है। बापू के आदर्शो का बखान तो सभी कर रहें हैं, किंतु परनाला वहीं गिर रहा है, जहाँ पहले गिरता था। हम ज्ञानेंद्रियों पर हाथ रखे बैठें रहें और बिल्लियां दूध-मलाई मारती रहें। यह कहाँ की बुद्धिमानी है? मूर्खता का त्याग कर, अब हमें भी राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाना ही चाहिए।''

साथियों की नसीहत तीसरे बंदर की अक्ल में धँस गई और उसने भी अपने कान खोल लिए। बाहरी हवा लगते ही उसके कान सूप की आकृति को प्राप्त हो गए। उसने कानों के विस्तार का अनुमान लगाया और प्रसन्न -भाव से बोला, ''अब क्या करना होगा?'' दूसरा बोला, ''करना क्या है, चल कर मुख्यधारा में प्रवेश करते हैं और दूध-मलाई के जुगाड़ में लग जाते हैं।'' तीसरा बोला, ''ऐसे नहीं, बापू को जगाते हैं। इतने दिन सेवा की है, मेहनताने की बात चलाते हैं। अरे! कुछ और नहीं आशीर्वाद तो मिल ही जाएगा। बापू के ब्राण्ड में अभी जान है, राजनीति में राम-बाण है।''

तीनों की सहमति हुई और बापू को जा जगाया। बंदरों की हालत देख बापू आश्चर्य-भाव से बोले, ''पुत्रों! यह क्या? तुम तो सत्य के प्रवक्ता हो और तुमने ही..?'' एक बंदर बीच ही में बोला, ''बापू! अब हम भी राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं।'' बापू बोले, ''यह तो ठीक हैं, किंतु असत्य न बोलने, न सुनने और न देखने के आदर्श का प्रचार-प्रसार कौन करेगा?'' उनमें से एक ने उत्तर दिया, ''बापू! अब इसकी आवश्यकता कहाँ हैं, सत्य पराजित और असत्य विजयी हो गया है। सत्य असत्य और असत्य ही अब सत्य हो गया है। बापू, हम भी अब आजादी चाहते हैं। स्वराज का स्वाद चखना चाहते हैं, राष्ट्र की मुख्यधारा में हाथ धोना चाहते हैं।''

अनमने मन से बापू बोले, ''जैसी तुम्हारी इच्छा, पुत्रों। जाओ, तुम्हें मुक्त करता हूँ!'' विस्तृत मुँह वाला बंदर बोला, ''खाली हाथ चले जाएँ, इतने दिन सेवा की है, तुम्हारे आदर्शो को ढोया है। फिर भी बैरंग लौट जाएँ?'' मुँह फट बंदर की बात सुन बापू ने मन ही मन कहा, ''आशीर्वाद के अतिरिक्त मेरे पास है ही क्या?'' फिर बापू ने चारों ओर निहारा और मुँह फट बंदर के हाथ में बकरी थमा दी। बड़े कान वाले के हाथ में लाठी और विस्तृत आँख वाले बंदर को चरखा थमा दिया।
आशीर्वाद प्राप्त कर तीनों ने बापू को प्रणाम किया और भविष्य की रणनीति तैयार करने के लिए पेड़ की छाँव तले बैठ गए। बापू के आशीर्वाद और आदर्शो का ख्याल रखते हुए तीनों ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार की। कार्यक्रम के तहत तय हुआ कि बड़े मुँह वाला शासन संभालेगा वह न सुनेगा, न देखेगा केवल बोलेगा। लाठी वाला प्रशासन सँभालेगा, वह केवल सुनेगा, न बोलेगा न देखेगा। चरखे वाला केवल देखेगा और दोनों हाथों से अर्थ बटोरेगा। इस प्रकार राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक आजादी की जिम्मेदारी का दायित्व तीनों के बीच विभक्त हो गया और साझा कार्यक्रम के तहत तीनों सत्ता की बकरी दुहने में जुट गए। राष्ट्र की मुख्यधारा मे शामिल हो गए।

२७ सितंबर २०१०