हास्य व्यंग्य

किस्सा कहावतों का
दिनेश थपलियाल


होता दर असल ये था कि जब भी हम कहावतों के बारे में सोचते तो वही दो चार घिसी पिटी कहावतें जेहन में उभरा करतीं - जैसे कि धोबी का कुत्ता घर का न घाट का, दिल्ली दूर है, आँख के अंधे, नाम नयनसुख, नौ दो ग्यारह होना या फिर न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी वगैरा वगैरा।

इन मुहावरों का तड़का जब भी हम किसी रचना में लगाते तो नतीजा होता ढाक के वही तीन पात। जिस ज़ायके की हम उम्मीद किया करते, वह न आ पाता। लगता था कि जैसे कहावतें लुट-पिट चुकी हैं, उनमें जो धार, जो तासीर हुआ करती थी, वह रफूचक्कर हो चुकी है। हमें यह भी लगता कि जैसे वह घड़ी आ पहुँची है- जब जीर्ण-शीर्ण कहावतें त्याग कर नई कहावतें धारण की जाती हैं। मगर नई कहावतें आएँ कहाँ से? वे कोई खालाजान के घर में तो रखी न थीं कि गए और निकाल लाए। दिमाग के मरियल गधे-घोड़े चारों तरफ़ दौड़ाए। आखिर ध्यान आया अपने बचपन के दोस्त वेदपाठी का।

हमें तो फ्रेश कहावतों की ज़रूरत थी ही। सोचा -वेदपाठी जी के कहावत भंडार से कुछ नायाब मोती चुग लिए जाएँ। इसी बहाने ज़रा देख भी लें कि कौन-कौन से गुल खिलाएँ हैं उन्होने कहावतों के खेत में। वेदपाठी जी के भवन पर उनसे मिलते ही हमने पूछ लिया,  ''महाराज, रचनाओं में थोक के भाव कहावतें डालता हूँ, पर स्वाद नहीं आता। लगता है मसालों की तरह कहावतों का स्वाद भी जाता रहा। सुना है, आप आजकल नई कहावतें रच रहे हैं।''
वेदपाठी जी के चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट दौड़ गई। बोले, ''ठीक सुना आपने। वैसे मैं कहावतों की रचना स्वांत: सुखाय कर रहा था, मगर आप गुन के गाहक हैं। खाली कैसे जाने दूँ? कुछ न कुछ देकर ही विदा करूँगा। एक बिल्कुल मौलिक, अप्रकाशित व अप्रसारित कहावत है- अकल के कुत्ते फेल होना। ये आपकी रचनाओं से मेल भी खाती है। आपकी रचनाओं में यों फिट होगी जैसे खुद आपने ही बनाई हो।''

फिर वे मुस्करा कर बोले,  इस कहावत का ताल्लुक सीधा दिमाग़ से है। जब दिमाग़ का दही होने लगे, तो समझ जाइये कि अकल के कुत्ते फेल हो गए।''
''चलिये, एक मिनट को आपकी बात मान भी लें, मगर जनाब इस कहावत में नया क्या है। अकल पहले भी हुआ करती थी, अकल आज भी है। कुत्ते पहले भी थे, कुत्ते आज भी हैं। क्या यही लुटा-पिटा, थका-थकाया माल धरा था हमारे लिये?'' वेदपाठी जी बोले, ''ऐसा नहीं है। चलो दूसरी कहावत देता हूँ। क्या याद रखोगे दोस्त। कहावत है- उपभोक्ता का मोबाइल व्यस्त होना।'' मुस्करा कर हमने कहा, ''ये हुई न बात!'' मोबाइल तो वाकई पहले नहीं थे। पर जनाब, मतलब इसका भी शून्य बटा सन्नाटा है। वेदपाठी जी बोले, ''मतलब साफ़ है। स्वार्थ न होने पर उपेक्षा करना। आप लाख चाहते रहें बतियाना, मगर जनाब, हमारी इच्छा न होगी तो हर बार व्यस्त रहेगा हमारा मोबाइल।

वेदपाठी जी बोले, ''एक और कहावत है- रूट की सभी लाइनें अस्त होना। मतलब कि कहीं से भी उधारी मिलने की उम्मीद न होना।''
ठीक तभी भीतर से गृहयुद्ध की कर्णभेदी ध्वनियाँ सुनाई पड़ीं। एक बच्चा गरज रहा था, ''साले, बत्तीसी उखाड़ कर हाथ में दे दूँगा। दूसरा गुर्रा रहा था, ''चुप कर बेमौसम की भविष्यवाणी। गरजता तो ऐसे है कि जाने कितना बरसेगा। मगर कभी छींटा तक नहीं पड़ा। ज़्यादा मत रेंकियो मेघदूत की औलाद। बता दिया। हाँ।''
हमने पूछा, ''वेदपाठी जी, ये सब क्या है? समझाते क्यों नहीं?'' ''क्या बताऊँ वर्मा।'' वेदपाठी कराहे, ''चावलों का मांड़ बन चुका है। नहीं मानते उल्लू के पट्ठे। कहता हूँ- सुबह उठ कर मुँह-हाथ धो लो। कहते हैं, ''शेर मुँह नहीं धोते। कहता हूँ, किताब निकाल कर पाठ याद करो। कहते हैं- बूढ़े तोते रटा नहीं करते। लो कल्लो बात।''
तभी चाय लिये आती काकली रुककर बोली, ''अरे पापा, क्यों समझाते हैं? हैं तो ये कल के जोगी, पर पेट में जटा पूरी है। फिर भुनभुनाने लगी, ''गधों के पीछे जाना, अपने कब्जे खुलवाना।''

बच्चों के मुखारविंद से ऐसी नायाब कहावतें सुन, हमारे सब संदेह मिट गए। लायक पिताओं की नालायक संतानें ही अब तक हमने देखी थीं। ये पहला मौका था जब हमें जीनियस पिता की सुपर जीनियस औलादों का पुण्य दर्शन हो रहा था। हमने काकली का सिर सहलाते हुए कहा, ''चाय रहने दे बेटी, ये तो घर में भी पी लूँगा। बस मेरे पास बैठ कर कुछ और कहावतें सुना दे।''

काकली चहकी, ''अरे वर्मा अंकल, जहाँ बाँस डूब चुके, वहाँ पोरियों की क्या गिनती! मैं तो कहती हूँ, ''न छीले कोई सौ तोरियाँ, बस एक कद्दू छील ले। पता नहीं कैसे थे वो लोग, जो मरा हाथी भी सवा लाख में भेड़ देते थे। एक हमारे पापा हैं। सारे डंगर मुफ़्त में लेने को तैयार हैं पर कोई दे तो। मीठा मीठा गड़प गड़प, कड़वा कड़वा थू थू। पीने को लपर लपर, उठाने को ना नुकर। है कोई हमारे पापा जैसा सच्चा गोभक्त? आखिरी साँस तक उन्होनें गोबर उठाने की कसम खाई है। उनका एक ही नारा है- 'तुम मुझे गोदान करो, मैं तुम्हें दूध बेचूँगा। जब तक सूरज चाँद रहेगा, गइया तेरा नाम रहेगा। देश भक्त तो आपने बतेरे देखे होंगे, पर हमारे पापा जैसा गुसाईं आपको न टकरा होगा। काकली बगैर अर्धविराम, पूर्णविराम, कौमा के दौड़ी जा रही थी। वेदपाठी जी का मुँह खुला था। सरपट दौड़ती बिटिया की कैंची-सी चलती जुबान को पलक झपकाए बगैर, निहारे जा रहे थे। खुशी की बिजलियाँ बीच-बीच में उनके चेहरे पर दमक उठतीं। उन्हें गर्व हो रहा था कि ऐसी होनहार कन्या के वह पिताश्री हैं।

हम कहावतों के इस अथाह सागर में डूबकर अपनी पसंद के मोती चुनने लगे। इससे पहले कि ये मोती हाथ से छूट जाएँ, याद से गिन गिन कर उनकी माला यहाँ पिरो दी है। ये हमारे लेखन में तो चार चाँद लगाएँगे ही पाठको का मनोरंजन भी करेंगे इसी शुभकामना के साथ इस साल का पहला लेख यहीं पूरा करता हूँ।

४ जनवरी २०१०