हास्य व्यंग्य

मैं आदमी हूँ और आदमी ही रहूँगा
-दुर्गेश गुप्त ''राज``


उन्हें अपने आदमी होने पर बहुत गर्व था। वे अपने आपको इस सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ जीव मानते थे।
कहते थे, आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो सब तरफ से आपने आप में पूर्ण होता है और जब से उन्होंने ''आदमी भी गर्भ धारण कर सकेगा`` वाला समाचार, समाचार-पत्रों में पढ़ा था, उनका सिर भी गर्व से तन गया था।

वे हमें अचानक मिल गए। वैसे भी ऐसे लोग हमें अचानक ही मिला करते हैं। हमने उनसे कहा, ''भई, बुरा न मानो तो एक बात कहें।``
''कहो, बुरा हम किसी की बात का नहीं मानते। यदि बुरा ही मानने लगे तो हमारे आदमी होने का भला क्या मतलब।`` वे बोले।
''फिर भी सोच लो, कहीं आपको बुरा न लग जाए।`` हमने कहा।
वे उत्तेजित हो गए, बोले ''अजीब सिरफिरे हो, कह तो दिया... हम आदमी हैं, बुरा नहीं मानते।``

उनको हमारे पूछने से बुरा लगा हो या न लगा हो, ये तो बात बाद की थी, लेकिन उनके द्वारा बारम्बार यही कहे जाने से कि हम आदमी हैं.... हम आदमी हैं..... हमें अवश्य बुरा लगने लगा था।
हमने कहा ''क्षमा करें, आप हमें आदमी तो कहीं से भी नजर नहीं आते।``
''क्या मतलब ?`` वे एकदम चौंके।
''मेरा आशय यह था कि आप आदमी किसी भी कोण से नहीं दिखते। आदमी गुफाओं में रहता था। जंगलों में घूमता था। पत्तों से अपना तन ढँकता था। पत्थर से आग पैदा करता था। हिंसक था। जानवरों का शिकार कर उनका गोश्त खाता था। आपमें इन सब गुणों का मुझे सर्वथा अभाव दिखाई देता है।`` हमने आदमी के बारे में एक फिल्म में जो कुछ देखा और पढ़ा था, अपनी स्मरण-शक्ति के आधार पर सब कुछ उनसे कह दिया।

वे कुछ क्षण के लिये सोच में पढ़ गए। हम भी यही चाहते थे। फिर वे बोले- ''आप कहते तो कुछ-कुछ ठीक है, लेकिन आपने जो वर्णन किया वह तो आदिमानव का प्रतीत होता है।``
हम समझे गए उन्हें भी थोड़ा-बहुत सामान्य-ज्ञान है। हमने कहा- ''वह आदिमानव था, क्योंकि उसमें सभ्यता का अभाव था, उसका बौद्धिक विकास नहीं हुआ था। इसीलिये उस आदिमानव को ही आदमी कहा जाने लगा। हाँ आप चाहें तो अपने आपको मानव कह सकते हैं क्योंकि आप बुद्धिमान हैं, सभ्य हैं, शाकाहारी है, संवेदनशील हैं, यानि कि हर तरफ से एक पूर्ण मानव।``
शायद अब उनको मेरा तर्क कुछ समझ में आने लगा था, लेकिन फिर भी बोले- ''लेकिन भई, वो थे तो हमारे वंशज ही। फिर आप हममें और उनमें ये भेद क्यों पैदा करना चाहते हैं।
हम समझ गए, वे धीरे-धीरे पूरी तरह लाईन पर आ जाएँगे। हमने उन्हें समझाते हुए कहा-''ऐसी बात नहीं है कि आज आदमियों का अभाव हो, लेकिन मेरे मापदण्ड आदमी के बारे में कुछ भिन्न हैं, और उनमें आप कहीं से भी फिट नहीं बैठते, इसीलिये मुझे आपसे ये कहना पड़ा।``
वे कुछ समझ नहीं सके, बोले- ''आपके कहने का आशय क्या है, जरा स्पष्ट करें। आप वर्तमान में आदमी किसे मानते हैं?``
''बड़ी सीधी-सी बात है, आज भी जो व्यक्ति उस आदिमानव उर्फ आदमी के गुणों से परिपूर्ण है, आदमी है।`` हमने कहा।
''जैसे......`` वे बोले।
''नेता.....`` हमने तपाक से कहा।
''कैसे ?``
''देखिये, आदमी जंगल में घूमता था, गुफाओं में रहता था। नेता के लिये आज सारा देश जंगल और सरकारी आवास गुफाएँ हैं। वह नंगा रहता था, ये भी नंगा रहता है और सही मायने में तो आज जो नंगा है, वहीं नेता है, क्योंकि राजनीति को मैं जरा स्पष्ट कहूँ तो निर्लज्जता का पर्याय मानता हूँ। कुछ भी कह लो इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता, कुछ भी हो जाए इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता। आदिमानव हिंसक था, ये भी हिंसक हैं। अपने स्वार्थ के लिये हत्या, लूटपाट, बलात्कार कुछ भी कर या करवा सकते हैं। उसमें बुद्धि का अभाव था, सो इनमें भी है। वह जानवरों का शिकार कर उसका गोश्त खाता था। ये इंसान को जीते-जी ही खा रहा है।`` हमने कहा।
हमारे द्वारा की गई व्याख्या से वे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। बोले- ''बस...बस.... मैं समझ गया, सब कुछ समझ गया।``
''आप क्या समझ गए ?`` हमने पूछा।
''यहीं कि मैं आदमी नहीं हूँ।`` वे बोले।
हमें बड़ी खुशी हुई। हमने मन ही मन सोचा, कम से कम आज हमने एक व्यक्ति को आदमी से मानव बनाया। लेकिन एक दिन जैसे ही हमने समाचार-पत्र देखा, चौक गए। अखबार के मुखपृष्ठ पर उन महाशय का फोटो छपा था। वे मंत्री बन गए थे। हमें ऐसा लगा जैसे वह फोटो हमको धन्यवाद ज्ञापित कर रहा हो। कह रहा हो, दोस्त तुम्हें लाख-लाख शुक्रिया मुझे सही राह दिखाने के लिये। मैं आदमी हूँ और आदमी ही रहूँगा।

६ सितंबर २०१०