हास्य व्यंग्य

मालामाल करने की चिरौरियाँ
प्रमोद ताम्बट


वैसे तो हमारे खानदान में कभी किसी को कोई ईनाम-इकराम नहीं मिला, किसी की कोई लॉटरी नहीं लगी, किसी ने विरसे में हमारे लिए धनदौलत की कोई पोटली नहीं छोड़ी, मगर जबसे मैंने पत्राचार और ब्लॉगिंग के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल तेज़ किया है, दुनिया भर के सैकड़ों दयालु और उदार किस्म के बदमाश मुझे नाना तौर-तरीकों से जबरदस्ती मालामाल कर देने पर तुले हुए हैं। पता नहीं मेरे बारे में उन्हें यह गलतफहमी कैसे हो गई कि हिन्दी का लेखक है तो ज़रूर लॉटरीखोर और सट्टेबाज़ होगा। याकि उनका आकलन है कि भारतीय लेखक है तो मुफ्तखोर तो ज़रूर होगा, लालच का मारा पक्का जाल में आ फँसेगा। या फिर शायद वे सोच रहे हैं कि दुनिया में सबसे बेवकूफ कोई है तो वह है भारतीय लेखक, फिर व्यंग्यकार हो तो उससे मूर्ख तो कोई हो ही नहीं सकता, इसलिए इन दिनों सैकड़ों की तादात में इन्टरनेट के ठगों ने मेरे ऊपर कड़ी फील्डिंग लगा रखी है, जाल बिछा रखा है और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब में उसमें जा फसूँ।

सुदूर विदेशों से, या क्या पता यहीं किसी होटल में बैठकर, कई लॉटरी और सट्टे वाले रोज़ मेरे ईमेल बाक्स में ढेरों बधाइयाँ भेज रहे हैं-- बधाइयाँ!!  आप एक लाख यू.एस.डालर जीत गए हैं... बधाइयाँ! आप यू.एस. नेशनल लाटरी के विजेता है पचीस हज़ार पाउंड प्राप्त करें... बधाईयाँ आप जैकपॉट जीत गए हैं। और बधाइयों के साथ तुरन्त अपना नाम, पता, दूरभाष आदि जानकारी भेजने का निवेदन, व देरी होने की सूरत में दावा खारिज कर दिये जाने की सख्त धमकी भी होती है।

सच कह रहा हूँ, अव्वल तो मैंने कभी कोई लॉटरी का टिकट खरीदा ही नहीं, ना ही कहीं कोई सट्टे की पर्ची ही लगाई है, फिर पता नहीं क्यों ये दानी लोग जबरदस्ती मेरी आर्थिक स्थिति सुधारने पर उतारू है। जब देश की अर्थव्यवस्था सैद्धातिक रूप से मेरी आर्थिक दशा सुधारने के सरासर खिलाफ है तो फिर ये बेचारे क्यों खामोखां परेशान हो रहे हैं, क्या पता !

एक कोई पीटर साहब हैं। वे मेरे नाम लाखों डॉलर छोड़कर मरे हैं। अब उनके वकील जैफरसन चुपचाप यह पैसा खा जाने की बजाय मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं कि मैं अपनी अमानत हासिल करने के लिए उनसे सम्पर्क करूँ। मैंने अपने माँ-बाप से पूछ लिया है कि अपने खानदान में कभी कोई पीटर नाम का आदमी हुआ है क्या? उन्होंने भी अपनी याददाश्त पर काफी ज़ोर डालकर देख लिया, पुराने पारिवारिक पोथी-पत्रों को भी पलट लिया, मगर कहीं से कोई सूत्र इन पीटर साहब से जुड़ता नज़र नहीं आ रहा।

एक कोई मूसा महाशय हैं, जो नाम से ही गैंगस्टर प्रजाति के प्रतीत होते हैं। वे चाहते हैं कि उनका किसी बैंक में फँसा डेढ़ सौ करोड़ हंड्रेड बिलियन फाइव थाउजेंड यू.के. पाउंड मेरे खाते में ट्रांसफर कर दिया जाए। किसी की भी कसम खवा लो, यह जो रकम ऊपर लिखी है, भारतीय मुद्रा में दरअसल कितनी होती है मुझे नहीं मालूम। मुझे भय है कि इतनी बड़ी रकम मेरे खाते में आने से कहीं मुझे हार्ट अटैक ना हो जाए या मेरी बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स कहीं खुशी के मारे पागल ना हों जाएँ।

एक साहब मुझे अपना बिजनेस पार्टनर बनाना चाहते हैं। दुनिया भर के बड़े-बडे़ देशों को छोड़कर वे भारत जैसे भुक्कड़ देश के एक, ‘बिजनेस’ ही से नफरत करने वाले शख्स की पाटनरी आखिर क्यों चाहते हैं और दुनिया के बड़े-बडे़ घरानों को लात मारकर वे मुझ ही से पाटनरी में धोखा क्यों खाना चाहते हैं, यह एक बड़े रहस्य की बात हैं। लगता है उन्हें डूबने का शौक चर्रा रहा है और यह सच है कि दुनिया में अगर बिजनेस डुबाने में सचमुच कोई उनके काम आ सकता है तो वह मैं ही हूँ।

मुझे मालामाल करने के लिए की जा रही रोज़ की नई-नई विदेशी चिरौरियों से तंग आकर अब मैं इन्टरनेट पर रातों-रात अपना ठिकाना बदलने की तैयारी कर रहा हूँ, जैसे कोई किराएदार चुपचाप बिना किराया दिये मकान छोड़कर भाग जाता है। मगर मुश्किल यह है कि बिना किराया, फ्री-फंड की इस इन्टरनेट दुनिया में कोई पता-ठिकाना ऐसा नहीं है जहाँ ये बदमाश आपको ढूँढ़ते हुए न जा पहुँचें। आप चाहकर भी इनकी आपको मालामाल कर देने की चिरौरियों से बच नहीं सकते। एकबार आप इनके हत्थे लग भर जाओ, ये बिना थके यूँ आपके पीछे लग जाएँगे कि अरबी कहानियों का जिन्न भी शरमा जाए।

 १४ जून २०१०