हास्य व्यंग्य

तकिया
श्यामसुंदर घोष


डॉक्टरों ने जिस दिन कहा- मुझे तकिये का व्यवहार नहीं करना चाहिए, उस दिन मैं आधा टूट गया। डॉक्टर बेरहम होते हैं, यह तो जानता था। वे कड़वी-कसैली दवाएँ देते हैं, सुइयाँ चुभोते हैं, खून निकालते हैं, नश्तर-छुरी चलाते हैं, यह सब तो जानता था, लेकिन किसी को उसके तकिये से अलगाते-विलगाते हैं, यह नहीं सुना था।

तकिया आदमी का कितना पुराना संगी है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक यही तो साथ देता है। और तो और, मरने पर भी लोग मृतक से उसका तकिया नहीं छीनते। अरथी पर भी उसका सिर तकिये पर टिका होता है। बुढ़ापे में जब पत्नी और प्रेयसी भी साथ नहीं देती है, तो तकिया ही साथ देता है। सही में वही चिरजीवन-सखा या संगिनी है। नींद और तकिये का घनिष्ठ संबंध है। दोनों ही एक दूसरे को मजेदार बनाते हैं। यदि तकिया नहीं भी है, तो हम बाँहों का तकिया बना लेते हैं। बाँहें हमारी मोबाइल तकिया हैं। ऐसे तकिये से जब कोई आपको विलग होने को कहें, तो आप समझ सकते हैं कि वह आप पर कितने जुल्म ढा रहा है। लेकिन डॉक्टर, वैद्य, चिकित्सक, जुल्म ढाने के लिए ही होते हैं, वे राहत उतना नहीं पहुँचाते हैं, जितना जुल्म ढाते हैं।

तकिये कई तरह के होते हैं- गोल और चिपटे तो होते ही हैं, तिकोने और चौकोने तकिये भी होते हैं। कुछ काम के होते हैं और कुछ बिल्कुल बेकाम के, दिखावे के भी होते हैं। ये सोफे पर पड़े रहते हैं और सोफे की शोभा बढ़ाते हैं। इसमें सलमे-सितारे टँके होते हैं। भले लोग कभी-कभी इस पर केहुनी टिकाकर तिरछे होकर बैठते हैं। मसनद तकिये का बड़ा भाईबंद होता है। जैसे आदमियों में कुछ बहुत मोटे-ताजे तोंदियल होते हैं, वैसे ही मसनद खासतौर पर मोटापा लिए विशेष रंग का तकिया होता है। उसका सभा-सम्मेलनों और मंच से विशेष संबंध होता है। ये मंच पर विशेष ढंग से लगाए गए होते हैं। एक बीच में रहता है जो खासतौर पर सभापति या अध्यक्ष के लिए होता है।

सभा मंच पर सजे मसनद से उठँगकर खर्राटे लेने का अपना मजा है। कभी-कभी जब कोई धुलंधर वक्ता मंच पर माइक का सदुपयोग करते हुए धुआँधार भाषण दे रहा होता है, तो उससे बचने के लिए अध्यक्ष आँख मूँद कर मसनद से उठँगकर जानमारू भाषण से राहत पाने की कोशिश करते हैं। यह कोशिश कभी-कभी इतनी कारगर होती है कि वे खर्राटें भरने लगते हैं। उनकी यह परम ब्रह्मानंदी मुद्रा ऐसी होती है कि कोई मनचला फोटोग्राफर, वैसे उनका कोई फोटो नहीं भी खींचता, पर खर्राटे भरते हुए विलक्षण रूप का फोटो लेने से नहीं चूकता। यह डबल मसनद एक साथ छपे दिखते हैं- एक मोटे ताजे उजले धपधप करते धोती कुर्ता, टोपी में अध्यक्ष और दूसरे उनका चिरसंगी उजला गोल-मटोल-गबरू मसनद। दोनों की शोभा देखते बनती है।

तकिया और मसनद के बीच एक छोटा गोल तकिया भी होता है। इसे कुछ लोग गाव-तकिया कहते हैं। दो गाव-तकिया मिलकर करीब-करीब मानव शरीर के बराबर होते हैं। जिन्हें नारी देह का सुख और संपर्क नसीब नहीं होता, वे गाव-तकिया को जाँघों के नीचे लेकर सोते हैं और काल्पनिक सुख और राहत का अनुभव करते हैं। कुछ के लिए एक गाव तकिया ही काफी होता है। लेकिन कुछ को इससे संतोष नहीं होतता, उन्हें दो गाँव तकिया चाहिए, एक जाँघ से दाबने के लिए और एक बाहों में भरने के लिए।

कुँवारों और विधुरों के लिए गाव-तकिया बहुत काम की चीज़ है। मैंने अपने एक विधुर मित्र को अक्सर इसका उपयोग करते देखा है। वे अपने गाव-तकिया को ही अपनी अर्द्धांगिनी कहते हैं। वैसे जब उनकी अर्द्धांगिनी हुआ करती थी, तो वे उन्हें हाय! मेरी गाव-तकिया! कहकर ही रिझाते और खिझाते थे। अब अफसोस करते हैं कि क्यों उन्हें गाव-तकिया कहा करता था। वह तो चली गई और गाव-तकिया छोड़ गई। कभी-कभी वे गाव-तकिया पर सिल्क और मखमल के खोल डालते रहते हैं। सुंदर कीमती छींट के खोल तो वे अक्सर ही काम में लाते हैं। तकिये की बनावट पर गौर कीजिए तो आपको मालूम होगा कि उसमें डबल खोल होते हैं। एक तो अंदर का होता है। यह साफ नहीं किया जाता, केवल ऊपर का खाली खोल ही साफ किया जाता है। इस मामले में तकिये और मनुष्य की समानता समझी जा सकती है। हमारे भी तो डबल खोल होते हैं, एक बाहर का और एक भीतर का। बाहर के खोल की साफ-सफैयत की हमें बड़ी चिंता रहती है, पर भीतर के खोल के बारे में हम कुछ सोचते भी नहीं हैं। वह अक्सर गंदा मैला रहकर ही सड़, गल और पच जाता है।

तकिये आमतौर पर रूई के बने होते हैं। मोटे कपड़े के खोलल में मनमाफिक रूई भरवा कर हम तकिये बनवाते हैं। पर आजकल फोम के तकिये भी चल निकले हैं। रूई कितनी भी हल्की हो, आखिर दब ही जाती है। जो दबने वाली रूई नहीं होती, वह भी सिर और बदन के दबाव से पुरानी पड़ने पर चूर-चूर हो जाती है। इसकी तुलना में फोम ज्यादा टिकता है। सही में बनावटी चीजें ज्यादा टिकती हैं। प्लास्टिक के फूल अधिक टिकते हैं। उनके झरने और गिरने की बात किसी ने नहीं सुनी जबकि असली फूल जल्द ही झर और गिर जाते हैं। यही बात आदमी के लिए भी सही है। रंगे स्यार यहाँ बहुत दिन चलते हैं जबकि सीधा-सादा ईमानदार इंसान यहाँ बहुत दिन चलते हैं जबकि सीधा-सादा ईमानदार इंसान यहाँ असमय मारा जाता है।

तकिये का रोने से भी बहित घनिष्ठ संबंध है। जो लोग खुले तौर पर रो नहीं सकते वे तकिये में मुँह छिपाकर रोते हैं। इस मामले में तकिया कमसिन किशोर लड़कियों, सतायी हुई बहुओं और मारी पिटी पुत्रवधुओं के बहुत काम आता है। वे अक्सर खट-पट कर तकिये में ही मुँह छिपा कर अपना दुख हल्का करती हैं। जो सुकून उसे पिता माता या पति का कंधा नहीं दे सकते वह सुकून नाचीज तकिया देता है। अब ऐसे तकिये से किसी को मरहूम करना कितनी बड़ी ज्यादती है, यह आप खुद सोचिए। इसलिए मैंने डॉक्टर के कहे को कभी नहीं माना और तकिये से अपनी यारी जारी रखी।

२२ मार्च २०१०