हास्य व्यंग्य

गरीबों की संसद
-- मनोहर पुरी --


बहुत जोर शोर से कनछेदी ने उठाई है यह आवाज, अब हमें ही तो देश पर करना है राज। जल्दी ही हमारे दूसरे भाई भी संसद में जाएँगे और फिर हम सब गरीब मिल कर सरकार बनाएँ। गरीबी की रेखा के नीचे रहने से सुखों का स्वाद उठाते थे, नंगे धडंगे ही सही अपनी मस्ती पर इतराते थे। सारी जिन्दगी कोई कर नहीं दिया, विधाता या सरकार ने भी तो हमें कोई घर नहीं दिया। न कोई रिकार्ड रखने की जरूरत पड़ी, न फार्म भरने की आई कोई घड़ी। राशन कार्ड तक नहीं बनवाया, क्रेडिट कार्ड तो रहता ही है हमसे शर्माया। चार पैसे पल्ले नहीं होते राशन कार्ड क्या बनवाते, क्रेडिट को कभी डेबिट कैसे करवाते। अब एकाएक हमें संसद में भिजवाने की चर्चा है, इस चर्चा में हमारा कहाँ कोई खर्चा है। सुना है चुनाव लड़ने तक का पैसा सरकार देगी, कुछ कमी पड़ी तो पार्टी उबार लेगी। लगता है राम जी का कोई करम होगा, कुछ खाने-पीने का हमारा भी धरम होगा।

यह सब सुन कर मुझे अपना पेट भरा भरा सा लगता है, जैसे सावन के अन्धे को पतझड़ भी हरा हरा सा लगता है। अब तक संसद में अनुसूचित जातियों और जन जातियों का आरक्षण था, अब पिछड़े और महिलाओं का संरक्षण होगा, कोटे परमिट का विरोध करने वाली संसद में कोटे से चुने सांसदों के व्यवहार का नज़ारा विलक्षण होगा। इस तर्ज पर गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की ओर भी गया है कुछ लोगों का ध्यान, अब तक गरीबी हटाओ के नारे पर ही चलती थी उनकी दुकान। गरीबी हटी नहीं यह मान लिया गया है, गरीबों को सांसद बनाना भी ठान लिया गया है। आखिर देश की अधिसंख्यक आबादी गरीबी की रेखा से नीचे रहती है और एक बड़ा वोट बैंक कहलाती है। इन्हीं वोटों के कारण अल्पसंख्यक अलग थलग रह गए, जातिवादी भी अपनी अपनी जाति की खाल में समा गये। आज हर दल के पास छोटे छोटे नेताओं का जमाव है, देश के पास एक अदद राष्ट्रीय नेता का नितान्त अभाव है। इसीलिए गरीबों को सामने लाने की बात आई है, लगता है अमीरों को भी आज कल की राजनीति रास नहीं आई है। जरा जरा सा स्टिंग आपरेशन कमाल करता है, एक साथ कई कई मंत्री और सांसद हलाल करता है। जहाँ नजर डालो वहीं पर घोटाला है, हजारों लाखों का नहीं करोड़ों का हवाला है। करोड़ों का करते क्या होंगे सोच कर हैरान हूँ, यहाँ तो संसद में जाने की चर्चा से ही परेशान हूँ। जब हम सांसद बनेंगे तो कहाँ जायेगा स्टिंग आपरेषन और हवाला, न कोई स्कैण्डल होगा और न ही होगा घोटाला।

सोचता हूँ क्या हसीन नजारा होगा, जब चुनाव लड़ने वाला कोई गरीब बेचारा होगा। आज तक जो कूड़े के ढेरों पर रोटी के लिए कुत्तों से लड़ते थे, अब कुर्सी के लिए आपस में लडेंगे। पेट भरने से लाचार थे अब दूसरों की तोंद पर चढ़ेंगे। यह तो बाद की बात है चुनाव के समय ही किस्सा साफ हो जायेगा, गरीबों का गरीबों से ही हिसाब हो जायेगा। तन पर कपड़ों के अभाव में बैनर कैसे तनेंगे, जिनका बच्चा कापी-किताबों के लिए तरसा है उनके पोस्टर कैसे बनेंगे। बैनरों के कपड़े के लिए दंगे हो जाएँगे, चुनावी फंड के लिए भूखमरे और बीमार तक चंगे हो जाएँगे। सरकार बहुत चालाक है नकद पैसा तो देगी नहीं चुनाव प्रचार का सामान दिलवायेगी, लेई बनाने को मैदा न दे कर स्वयं लेई बनवायेगी और उसमें भी नीला थोथा तक मिलवायेगी। जानती है लोग लेई खा कर, कर लेंगे गुजारा, फिर चुनाव का बदल ही जायेगा नजारा। झंडों, पोस्टरों और बैनरों का पूरी तरह से अभाव होगा, फिर वह चुनाव भी कोई चुनाव होगा।

जब चुनाव व्यय का जिम्मा सरकार ले लेगी तो क्या कोई देगा चन्दा, चन्दे के बिना कैसे पनपेगा काला धन्धा। एक सुनहरे भविष्य की बात होगी, पर वास्तव में तो भूखे नंगों की ही सरकार होगी। कल्पना करें कि सारी उमर भूखे रहने के बाद जब मुझे चुनाव लड़ने का मौका मिले तो मैं क्या करूँगा, किसी प्रकार निरन्तर अपने पेट भरने का जुगाड़ करूँगा। कैसे लगेगा जब मेरी तरह से दूसरे भूखे भी चुनाव घोषणा पत्र छपवाएँ और देश की खाद्य समस्या को दूर करने के वायदे दोहराएँ। कोई नंगा बनेगा कपड़ा मंत्री और कोई मुजरिम ही होगा मंत्रियों का संतरी। सब किसी पार्क में बैठ कर सभा करेंगे जहाँ आल्हा का गान होगा, पर यहाँ भी कैसे जलपान होगा। सांसद बन कर भी हाशिए पर उतारे जाएँगे, गरीब हैं तो हर जगह दुत्कारे ही जाएँगे। कुछ धन्ना सेठ भी गरीबी कोटे का लाभ उठाएँ, गरीबी के नकली प्रमाण पत्र असली अदालतों से बनवाएँ। जैसे आज ऊँची जाति वाले नीची जाति का प्रमाण पत्र बनवाते हैं, और ऊँचे ओहदे पर पहुंच कर नीची जाति वाले भी अपनी जात छिपाते हैं। महिलाएँ ही कहाँ कुछ कर पाएँगी, शो पीस मात्र बन कर रह जाएँगी। यह विचार मेरा नहीं बुद्धिजीवी महिलाओं का कहना है, महिलाओं को तो सांसद बन कर भी घर गृहस्थी ही चलाना है। पति को रिझाएँगी बच्चों को बहलाएँगी और आटा होगा तो रोटी पका कर ही संसद जाएँगी।

जरूरी है कि हम सब मिल कर एक मोर्चा बनाएँ, और राजनीति का पैसे के साथ कोई गठजोड़ बिठवाएँ। जैसे कुछ तांत्रिकों ने करवाया है, तिहाड़ तक को अपनी सुख सुविधा के अनुरूप रहने लायक बनवाया है। सेल्युलर फोन तक की सुविधा है, उन्हें जेल के भीतर भी कहाँ कोई दुविधा है। हमें रोटी की सुविधा का अभाव भारी है, उसके बिना चुनाव से दूर रहना हमारी लाचारी है। हम चाहते हैं कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन का हो जाए सहारा, ताकि घर का आराम से चल जाए गुजारा। जो गरीब राजनीति में लाया जाये, उसे फार्म भरते ही लखपति बनाया जाये। राशन कार्ड और पासपोर्ट ही नहीं क्रेडिट कार्ड भी मिले, उनका चमड़े का सिक्का भी खूब चले। हर चुनाव लड़ने वाले का अपना मकान होना जरूरी हो, तो भरे पेट के बिना चुनाव लड़ना किसी की क्यों मजबूरी हो। इसलिए चुनाव चिन्ह मिलते ही रोटी कपड़े का प्रबन्ध हो जाये, चुनाव के बाद तो सहज ही पैसे से सम्बन्ध हो जाये। गरीब सांसदों के लिए तो लोग थैलियां लेकर आएँ, परन्तु जनता की गरीबी पर क्यों तरस खाएँ।

संसद के मुख्य द्वारा पर हमें रोका ना जाए और पैदल चलने वालों के माथे पर भी पार्किंग प्रवेश का लेबल जगमगाये। अभी तक केवल कारों को प्रवेश मिलता है,पैदल वालों को लम्बा चक्कर काटने के बाद ही प्रवेश का द्वार मिलता है। संसद में बजट की बजाय रोटी की बात होगी, अच्छा है पहली बार मूल मुद्दे से मुलाकात होगी। अब तक तो लोग बिना बात के वाद विवाद में देश को उलझाते रहे, घाटा ही पड़ना है तो नाहक क्यों बजट बनवाते रहे। नई संसद का एक सूत्री काम होगा, रोटी और सिर्फ रोटी का देश के नाम पैगाम होगा। नई नई योजनाएं तो बेकार है बनवाना, सीधी बात है हर एक को रोटी उपलब्ध करवाना। जगह जगह ढाबे खुलवा दिए जाएँगे, जिन दामों पर सांसदों को संसद में भोजन मिलता है, उन्हीं दामों पर सब को मिले ऐसे प्रबन्ध करवा दिए जाएँगे। महंगाई का प्रश्न ही नहीं रहेगा, जब खरीदना ही नहीं तो कौन इसे महंगा कहेगा। पेड़ों पर जब लगेगी रोटियां, फिर क्यों नोचेंगे लोग एक दूसरे की बोटियां।

चारों ओर शान्ति का राज होगा, चोरों के लिए कहाँ कोई काम काज होगा। शायद यही सोच कर संसद के बाहर गांधी की प्रतिमा को लगाया है और उनके तन पर कम से कम कपड़ा पहनाया है। इण्डिया गेट पर उनकी मूर्ति नहीं लगाई, ताकि उन्हें छतरी के नीचे न रहना पड़े भाई। भावी सांसदों को भी यही समझाना है, मित्र यह गांधी का जमाना है। देखो तुम्हारे सामने बिना कपड़ों के बैठा है, अपनी ताकत पर कब ऐंठा है।

हम घर घर में गांधी की तस्वीर दिखाएँ और पूरे भारत को भूखे नंगों का देश बनाएँ। संसद में अन्य सवाल उठाये ही नहीं जाएँगे, क्योंकि लोग संसद में पहुंचते ही रोटी खाएँ और रात को रोटी खा कर ही लौट पाएँ। सांसद बनने को मैं इसीलिए तैयार हूँ क्योंकि मात्र रोटी और रोटी के लिए लाचार हूँ।

२१ नवंबर २०११