हास्य व्यंग्य

प्याज और ब्याज
मनोहर पुरी


जब चाहे राजनीति का मुद्दा बन जाता है प्याज, लगता है मूल के साथ खतरे में पड़ जाता है ब्याज। नेता कहते रह जाते हैं इस देश में गरीबी दोबारा राजनीति का मुद्दा नहीं बन पाई, प्याज क्या लहसुन खाकर बनेगा भाई। बहुत ऊंचा उड़ेगा तो क्षेत्रीय छत्रपों सरीखा औंधे मुँह नीचे गिरेगा। वह तो हमारे देश की अधम प्याज को ऊंचा उठाने की तैयारी है, नहीं तो दुनिया भर में प्याज यूं ही फिरती मारी-मारी है। कुर्सी से हटाए नेता की तरह कोई टके के भाव नहीं पूछता कि कहूँ घूम रही हो, जैसे वे राजनीति का चाटते हैं, तुम सब्जी मंडी का कीचड़ चूम रही हो। जैसे भूतपूर्व मंत्रियों को लोग मुँह नहीं लगाते, वैसे ही बदबू की मारी प्याज को लोग गोदामों तक में नहीं छिपाते। सत्ता में आने के लिए जैसे नेता चुनावों में धन बहाते हैं, वैसे ही राजनीति के खेल खेलने को भी लोग प्याज पर अपनी पूँजी लगाते हैं।

यही कारण है कि प्याज स्त्रीलिंग से पुलिंग का दर्जा पा रहा है, और सत्ता पर काबिज नेता जैसे इतरा रहा है, रसोई घर में झाँकने तक के लिए भाव खा रहा है। साहूकार को पूँजी लगाने के बाद जैसे वसूलना ही पड़ता है ब्याज, वैसे ही रईस दिखने के लिए उसे खरीदना ही पड़ता है प्याज। प्याज और ब्याज का हमेशा से चोली दामन का साथ है, राजनीति में फेरबदल करने में इन दोनों का बड़ा रहता हाथ है। हमारी जनता किसी भी वस्तु के बढ़ते भावों से जैसे होती है मोहग्रस्त, वैसे ही प्याज के भावों से राजनेता हैं बहुत त्रस्त। सब जानते हैं कि जो महँगाई के गम में प्याज खाता है, निश्चित ही बहुत मोटा ब्याज पचाता है। प्याज के आम व्यापारियों की मदद के लिए सरकार को चाहिए कि उन्हें बिना ब्याज ऋण दिलाए, ताकि व्यापारी देश का भी कुछ भला कर पाए। प्याज के लिए आयात लायसेंस हर रेहड़ी वाले को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, हर गली और नुक्कड़ पर सरकारी प्याज पार्लर बनवाना चाहिए। पाँच सितारा होटल में प्याज के व्यंजनों के विशेष मीनू किए जाएँ तैयार, और सोने के गहनों की जगह प्याजी व्यंजनों का किया जाए अब विदेशों में व्यापार। दुबई से सोने के गहनों की भारी माँग है तुरन्त ही वहूँ भारी स्टाक भिजवाना चाहिए और बदले में साग सब्जी भूषण प्याज मँगवाना चाहिए। फूलों के व्यापार से भी अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा कमानी चाहिए, और लक्ष्मी तथा सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उन पर प्याजों की माला चढ़ानी चाहिए। जिन को सरस्वती वंदना से सांप्रदायिकता की बू आती है प्याज से वह महक जाएगी, और साम्प्रदायिकता धर्म निरपेक्षिता के रूप में चहक जाएगी।

सरस्वती का पूजन करने वाले प्याज का चढ़ावा चढ़ाएँगे और वसंत पंचमी को प्याजी श्रम दिवस के रूप् में मनाएंगे। मन्दिरों में प्याज का भोग लगाया जाएगा, और उसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया जाएगा। काँग्रेसियों और वामपंथियों दोनों को उनके मन मुताबिक सरस्वती वन्दना सुनाई जाएगी, दीप प्रज्ज्वलन को प्याज के रस में डूबी बाती लगाई जाएगी। प्याज भी तो भारतीय संस्कृति में तामसिक वृत्तियों का प्रतीक है, हमारी कृषि के इतिहास में प्याज का अपना अतीत है। वे चाहेंगे तो इसे वर्तमान युग में अपना लेंगे और किसी चुनाव में चुनाव चिन्ह बना लेंगे। चारा चरने वालों का वैसे भी प्याज से है क्या काम, प्याज तो चारे के रूप में भी है हराम।

प्याज भारतीय कृषि के अच्छे उत्पादन का प्रतीक है, जब अच्छी प्याज उगती है तभी अच्छी फसल उगी मानी जाती है, बेमौसम की बरसात प्याज की फसल खराब होने पर ही जानी जाती है। मौसम की मापदंड वैसे ही है प्याज, जैसे पूँजी बाजार का मापक है ब्याज। इन दिनों प्याज मोती सरीखा मूल्यवान है, सब्जियों में इसकी अपनी अलग शान है। अब प्याज फेंका नहीं जाता भले ही हो जाए खराब, कहते हैं कि सड़े प्याज से बहुत बढ़िया बनने लगी है शराब। शराब बनाने वाले इस फार्मूले का पेटेन्ट करवाया जाना चाहिए और अमेरिका में आगे शोध के लिए भिजवाना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि दुनिया के आधे लोग खाते ही नहीं प्याज, हम जानते हैं कि इस देश के तीन चौथाई लोग उधार पर चुकाते नहीं ब्याज। जैसा कि स्पष्ट है कि प्याज मानव की तामसिक वृतियों का प्रतीक है, इसी कारण ब्याज उसका हमसाया है, रफीक है।

ब्याज लेना भले लोगों का काम नहीं है, प्याज और जूते खाने में भी तो कोई नाम नहीं है। न जाने कौन से विचारक ने प्याज को जूते का जोड़ीदार बनाया था, प्याज और जूते को एक दूसरे का विकल्प बताया था। यह न खाना चाहो तो वह खा लो जैसे दोनों ही खाने की चीज हैं, राम जानता है कि ये दुनिया वाले कुछ मामलों में बड़े ही अजीब हैं। दोनों का साथ बहुत पुराना है, उतना ही पुराना उनका आदमी से याराना है। जब कभी खेतों में प्याज सड़ जाता है, कहते हैं कि जूतों का भाव भी बढ़ जाता है। क्या कहा आजकल प्याज बहुत महंगे हैं तो जूते भी कहूँ सस्ते हैं, प्याज को काटने पर आप रोते हैं तो जूतों के काटने पर कहूँ हंसते हैं। दोनों ही खाए जाते हैं और दोनों ही काटते हैं, दोनों का एक सा ही है हाल, एक दाल को छौंक लगाता है, तो दूसरे में खुद बंटती है दाल। आयुर्वेद के अनुसार प्याज कई व्याधियों का उपचार है, जैसे ब्याज आर्थिक समस्या में जरूरतमंदों का मददगार है। प्याज और ब्याज का रिश्ता बहुत निराला है, एक के खाने से मुँह में दुर्गन्ध आती है तो दूसरा लेने से दिल दिखता काला है। प्याज जेब में रखने से लू नहीं लगती। गर्मी भाग जाती है, ब्याज जेब में आए तो तिजोरी में बंद लक्ष्मी जाग जाती है। ब्याज दूसरों की लक्ष्मी को अपने घर में लाता है, और उसकी खनक से ही तो प्याज खाने का मन ललचाता है। लोग ठीक ही कहते हैं कि प्याज और रोटी गरीब का भोजन है, ठीक इसी तरह से ब्याज का भी निर्धन के लिए प्रयोजन है। अब सरकार और व्यापारियों के प्यार ने अथवा मौसम की मार ने प्याज के दाम बढ़ा कर गरीबों को अमीरों की कतार में बिठाया है, साम्यवाद की भाषा में अमीर गरीब को एक समान बनाया है। दो-तीन सब्जी खाने वाले भी प्याज को तरस गए हैं, बेमौसमी संकट के बादल प्याज की कृपा से कुछ राजनीतिक दलों पर बरस गए हैं।

एक सौ रुपए किलो जो बिका प्याज तो यह हमारे ही शौक की बलिहारी है, नहीं तो प्याज खाना कहूँ आम आदमी की लाचारी है। जिसने भी खरीदा होगा सौ रुपए किलो का प्याज, उसके पास अवश्य ही होगा काली कमाई से कमाया हुआ काला ब्याज। उस सब्जी विक्रेता को भी अवश्य ही रही होगी पूरी आस कि सौ रुपए किलो में भी कोई न कोई खरीदने आएगा, इसका रहा होगा पूरा विश्वास। भारतीय उपभोक्ता की इस क्षमता पर देश गर्व से इतराया है। इसी कारण ही तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मन भारत में आने को ललचाया है। पहले दस रुपए के पचास ग्राम आलू चिप्स ने उनका हौसला बढ़ाया था, अब सौ रुपए किलो प्याज ने तो उनका मन ललचाया है। लगता है ब्याज को मंडी में आता देख प्याज का शरीर गर्व से ऐंठ जाता है, और वह आराम से मूलधन वाले थैले में ब्याज बन के बैठ जाता है।
बचपन से सुनते आए थे कि 'जद रूस पंजाबे आएगा तां आटा टके सेर बिकवाएगा` अभी तक रूस वहीं पर टिका अपने कटे टुकड़े संभाल रहा है और डालरों से ऊंचे रूबलों को हमारे टकों के बदले बांट रहा है। वहूँ पर भी प्याज का बड़ा टोटा है और मूलधन पर ब्याज भी बहुत मोटा है। अब रूस कैसे भारत में आएगा जब स्वयं प्याज तक नहीं खरीद पाएगा। प्याज के बिना आने का नहीं कोई अर्थ, रोटी प्याज बिना वैसे ही है व्यर्थ। रूस स्वयं ही रोटी-प्याज को तरस रहा है, उसका साम्यवाद पूँजीवाद की बगल में सरक रहा है।

महंगी प्याज ने भले ही गरीबों का ग्राफ दिया हो गिरा, पर अमीरों का रूतबा तो दिया ही है बढ़ा। अब वह अमीरों के ड्राइंग रूम में शो पीस की तरह से सजने लगा है, उसका डंका किट्टी पार्टियों में भी बजने लगा है। जो पहले प्याज को मुँह भी नहीं लगाते थे, प्याज को गरीब की जोरू बताते थे। अब वही लोग प्याज के पीछे हुए दीवाने हैं, उसे घर पर लाने के उनके पास सौ-सौ अफसाने हैं। योजना बनाई जा रही है कि कैसे प्याज विदेशों से मँगवाई जायेगी, हर हवाई अड्डे पर उसकी ड्यूटी फ्री दुकान कैसे सजाई जायेगी। कैसे प्याज की खातिर हमारा प्यारा विदेशी मुद्रा भंड़ार कुर्बान होगा,कैसे प्याज रातों रात सब्जियों का सुल्तान होगा। जिन लोगों को स्वदेशी से नफरत है वे अब विदेशी प्याज बेझिझक शान से खायेगें,और पंाच सितारा किसी होटल के 'बार` में 'व्हिस्की` की पूरी बोतल के साथ दस बीस ग्राम प्याज अवश्य मँगवायेगें।

कपड़े लत्तों के साथ प्याज की स्कीम रहेगी जारी,अब स्कूटर और कारों के साथ जोड़ी जायेगी बेचारी। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा यह प्याज कितना बढ़ायेगी,ब्याज क्या खा कर इसका मुकाबला कर पायेगी। दुल्हन के दहेज में सेब और अंजीर की जगह अब प्याज की टोकरी आयेगी, जिसे घूँघट की ओट से देख देख कर पड़ोसन ललचायेगी। कोई कहेगी कि फलां नेता के लड़के का शगुन आया है, उसी के उपलक्ष्य में समधी जी ने प्याज का टोकरा भिजवाया है, जिसे नेता जी ने मुहल्ले में दर्शनार्थ रखवाया है। देसी बहू के साथ अब विदेशी प्याज आयेगा, भारत का जनमानस जिसे देख देख कर हर्षायेगा। हमारी उभरती अर्थव्यवस्था की कैसी बढ़ी शान है, विदेशी प्याज हमारे देसी रसोई घर में मेहमान है। प्याज के आयात निर्यात से कई बोफोर्स शरमा रहे हैं,इसके बढ़ते दामों से व्यापारी इतरा रहे हैं और राजनेता घबरा रहे हैं। ऐसी प्याज की बलिहारी है जो राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर भारी है।

१४ फरवरी २०११