हास्य व्यंग्य

सुस बैंक में खाता
प्रमोद ताम्बट


गुन्नुभैया अपनी सुअर के आकार की गुल्लक लेकर अपने दादाजी के पास पहुँचे और लगभग फुसफुसाते हुए उनके कान में बोले-‘‘दादाजी दादाजी! मालूम आपको! सुस बैंक में खाता खोलना बहुत ही आसान है!’’

दादाजी अपने पोते की गुल्लक को गौर से देखते हुए बोले-‘‘अच्छा! फिर अपन क्या करें ?’’

गुन्नुभैया फिर फुसफुसाए-‘‘आप सुस बैंक में मेरा भी खाता खुलवा दो।’’

दादाजी मुस्कुराते हुए बोले-‘‘क्यों! आपको स्विस बैंक में खाता खुलवाने की ज़रूरत क्यों पड़ गई ?’’

गुन्नुभैया ने इधर-उधर झाँककर सुनिश्चित करने के बाद कि कोई देख-सुन नहीं रहा है, अपने दादाजी का कान अपने मुँह के पास खींचते हुए कहा-‘‘आपको नहीं पता, इंकम टेक्स वाले कभी भी छापा मारकर मेरी यह गुल्लक ज़प्त करके ले जा सकते हैं। आजकल माहौल बड़ा खराब चल रहा है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि सुस बैंक में खाता खुलवा लूँ सब झँझट खत्म।’’

दादाजी, जो बैठकर दूरदर्शन पर फालतू कार्यक्रम देखकर बोर हो रहे थे, पोते द्वारा फुसफुसाए जा रहे इस मामले में मनोरंजन की अपार संभावनाएँ देख बड़े उत्साहित हो गए और गुन्नुभैया को गोद में बिठाकर बात आगे बढ़ाने लगे। बोले-‘‘यह समस्या तो बड़ी गम्भीर है भई। मगर बेटे! इन्कमटेक्स वाले तो ब्लैकमनी रखने वालों के ऊपर छापा मारते हैं, उनका पैसा ज़प्त करते हैं। आपको चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है।’’

गुन्नुभैया बोले-‘‘ आप किसी को बताना मत, मेरी गुल्लक में भी ब्लैकमनी है, इसीलिए तो मैं टेन्शन में हूँ।’’

दादाजी आँखें चौड़ी करते हुए बोले-‘‘अच्छा! यह आपको किसने बताया ?’’

गुन्नुभैया फिर दादाजी का कान खींचते हुए बोले-‘‘पापा-मम्मी रोज़ रात को नोटों की गड्डियाँ गिनते हुए बातें करते हैं कि ये ब्लैकमनी न हो तो अपन तो भूखों मर जाएँ। इस गुल्लक में उसी ब्लैकमनी का हिस्सा ही तो है।’’

दादाजी के माथे पर चिन्ता की लकीरें उभर आईं, लेकिन वे फिलहाल बेटा-बहु से न उलझकर पोते के साथ पूरे मनोरंजन के मूड़ में थे। वे गुन्नुभैया के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले-‘‘लेकिन बेटे, आपको तो यह व्हाइट में मिल रही है, इसलिए आपको चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। स्विस बैंक में भी खाता वही लोग खुलवाते हैं जो चोरी का पैसा रखते हैं, रिश्वतखोरी-कमीशनखोरी का पैसा रखते हैं, दलाली हेराफेरी का पैसा रखते हैं। आपका पैसा तो शुद्ध पाकेटमनी का पैसा है!’’

गुन्नुभैया के सबसे विश्वस्त घर-भर में दादाजी ही थे, इसलिए वे अपनी सारी राज़ की बातें उनके सामने खोलने से कोई परहेज़ नहीं कर रहे थे। वे फिर दादा के कान में अपना छोटा सा मुँह घुसेड़ते हुए बोले-‘‘अब क्या-क्या बताऊँ आपको! कोई शुद्ध-वुद्ध नहीं है। मैं भी कभी-कभी पापा-मम्मी के पर्स से नोट चुरा कर इसमें डाल देता हूँ। मम्मी की बात पापा से, पापा की बात मम्मी से और उन दोनों की बातें आपसे न बताने के लिए रिश्वत लेता हूँ। रामूभैया के साथ सामान लेने जब बाज़ार जाता हूँ तो वो जो पैसा बीच में हज़म करता है उसमें से कमीशन लेता हूँ। अपने दोस्तों के पापाओं का जो काम अपने पापा से करवाता हूँ उनसे दलाली बराबर ले लेता हूँ। हेराफेरी लायक मेरी उम्र अभी है नहीं, समय आने पर वह भी करूँगा। और दादाजी, यही सब ब्लैकमनी ही तो मैंने अपनी गुल्लक में डाल रखी है। अब बताइये मुझें सुस बैंक में आता खोलना कितना ज़रूरी है ?’’
दादाजी के होश फाख्ता हो लिए, काटो तो खून नहीं। उन्हें पालने में क-पूत के पाँव साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। उन्होंने हल्की सी नाराज़गी का भाव चेहरे पर लाते हुए पोते को डाँटा -‘‘गुन्नु !! अच्छे बच्चे गंदी बातें नहीं करते। किसने सिखाई ये सब उटपटाँग बातें आपको?’’

पोते महाराज भी दादाजी की बात से नाराज़ हो गए। विद्युत गति से उनकी गोद से कूदते हुए बोले-‘‘मुझे पता था, पता था मुझे, आप जैसे ईमानदार खड़ूस बुढ्ढों के बस की बात नहीं है यह। मैं तो पापा-मम्मी से ही बोलूँगा, वो झट से सुस बैंक में मेरा खाता खुलवा देंगे।’’ इतना कहकर गुन्नुभैया हाथ में अपनी सुअर के आकार की गुल्लक लेकर चलते बने। दादाजी अवाक देश की भावी पीढ़ी को ताकते रह गए।

 ७ नवबंर २०११