हास्य व्यंग्य

गंगा जब उल्टी बहे
डॉ. संसारचंद्र


बात सुदूर अतीत की है, जब महाराज भगीरथ अपने साठ हजार पूर्वजों को स्वर्ग पहुँचाने के लिये अनंत काल तक कठोर तप करने के बाद, गंगा को भारत भूमि पर खींच लाए थे। गंगा माता ने जहाँ देश में हरित क्रांति लाकर यहाँ अन्न संकट दूर किया था वहाँ तैंतीस करोड़ (तत्कालीन जनसंख्या) स्वर्ग पहुँचाने की सुविधा भी प्रदान की थी।

भगीरथ तथा उनकी ‘गंगा उद्धार कौंसिल’ ने यह भी फैलसा किया था कि गंगा मैया सदा सीधी बहेगी और जब भी कोई प्रतिक्रियावादी इसे पलटने की नापाक कोशिश करेगा, उसे स्वर्ग जाने की बजाय नरक के लिये बोरिया बिस्तर बाँधना पड़ेगा। इस आर्डर के खिलाफ कोई अपील, वकील, और दलील कारगर नहीं होगी। महाराज को स्वप्न में भी यह विश्वास न था, कि उनके स्वर्ग सिधारते ही, उनकी बरखुरदार संतान उनकी योजना को विफल बनाने में जी-जान से जुट जाएगी। उस पर तथाकथित जनतंत्र का ऐसा खौफनाक भूत सवार हो जाएगा कि वह स्वर्ग और नरक में किसी प्रकार का पक्षपात सहन नहीं करेगी। वह नरक की आबादी घटाने के अभियान के विरुद्ध जेहाद का नारा बुलंद कर देगी। नरक को भी स्वर्ग की तरह फलता फूलता देखने के लिये वह आंदोलन शुरू कर देगी। अच्छा हुआ गंगा का बहाव उलटने अथवा अपने अरमानों का मातम देखने से पहले ही भगीरथ कूच कर गए।

महाराज भगीरथ चले गए। उनके पीछे-पीछे सतयुग त्रेता और द्वापर भी अपनी अपनी डफली बजाकर निकल गए। अंत में कलियुग की सवारी आई। चारों ओर इसी की तूती बोलने लगी। शंकर की जटाओं से अठखेलियाँ करने वाली गंगा, जो किसी समय अपनी तरंग भ्रू भंग से भगवती उमा का भी उपहास करती थी, कलियुग के दुष्प्रभाव से अपनी ऋजुता, भूलकर उल्टी बहने लगी। गंगा क्या उल्टी संपूर्ण देश और समाज का शीराजा बिखर गया। इसीलिये गंगा का उलटना एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी दुर्घटना है। गंगा के उलटने से हमारा क्या नहीं उल्टा। जरा अपने चारों ओर देखिये, क्या नहीं हो रहा, कहाँ वह जमाना था जब गुरु का दर्जा सबसे ऊँचा माना जाता था। चारों ओर गुरु की जयजयकार होती थी। कहाँ यह जमाना कि गुरु बेचारे तो गुड़ बनकर ही रह गए और चेले गरीबों को तरसाने वाली महँगी चीनी का रुतबा हासिल कर रहे हैं। वे केवल गुरुओं के उल्टे नाम रखकर ही अपने शिष्यधर्म का पालन नहीं करते बल्कि गुरुदक्षिणा के रूप में उनके चरणकमलों में कुछ हूटिंग का प्रसाद भी चढ़ाते हैं।

नौजवान लड़के लड़कियों के दिमाग का तो काँटा ही बिगड़ गया है। लड़के लड़कियों के तथा लड़कियाँ लड़कों के स्वांग उतारने की फिक्र में मसरूफ हैं। दोनो वर्ग स्वभाव, मनोवृत्ति चरित्र लिबास कारोबार आदि सभी तरीकों से एक दूसरे का अंधानुकरण कर रहे हैं। लड़कियाँ मार्डन हेयर कटिंग सैलूनों में जाकर अपने बाल कटवाने लगी हैं तो लड़कों ने अपने कद्दूनुमा सिरों पर इतनी लटें लटकानी शुरू कर दी हैं कि गोआ के समुद्र तट पर लहराते नारियलों की याद ताजा हो जाती है। लड़के जहाँ ढीले ढाले बढ़ौआ टाइप कपड़ों से अपने हुस्न को दोबाला कर रहे हैं वहाँ लड़कियाँ उलके बिलकुल विपरीत कसे हुए चुस्त और अधनंगे लिबासों में सजकर सड़कों और बाजारों की रौनक बढ़ा रही हैं। गर्ज कि ‘ऊँट रे ऊँट तेरी कौन सी कल सीधी’ के अनुसार हमारी कोई कल सीधी नहीं रही। हमारा एक भी प्रोग्राम सीधे ढंग से नहीं चलता। पासा यहाँ तक पलट चुकe है कि हमारे जीवन की गाड़ी घोड़े को खींचती और घोड़ा बेचारा पीछे पीछे ढिचकूँ ढिचकूँ करते हुए दम तोड़ता है।

जबसे गंगा का बहाव बदला है, हमारे कायदे कानून कोड आफ कंडक्ट आदि में तब्दीलियाँ नहीं हुई हैं बल्कि हमारा विधान भी एक नया रूप लेकर सामने आया है। विधान की सभी धाराएँ उलट चुकी हैं जिनकी रूह से सदियों के पुराने बोसीदा निजाम के परखचे उड़ चुके हैं। इस नवीन क्रांति के फलस्वरूप जो नये कानून रायज हुए हैं उनका खुलासा इस प्रकार है---

भाषण देने का अधिकार केवल कौओ तक ही मकसूर कर दिया गया है। कोयलों द्वारा मूक श्रोताओं के रूप में उनकी धुआँधार तकरीरें सुनने पर, कोई पाबंदी नहीं लगाई गई। बाँसों के व्यापारियों की बरेली जाने की विवशता अब समाप्त कर दी गई है। अब तो बाँस उल्टे ही बरेली पहुँचने लगे हैं। हंसों के मानसरोवर का नागरिग बनने पर कठोर पाबंदियाँ नाफज कर दी गई हैं। वहाँ पर बगुलों के कैंप लगाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।

नगारखाने के नगारों को नीलाम करके उनके स्थान पर तूतियों का बोल बाला होगा। नौमन तेल का प्रबंध होने पर भी राधा नाचने की तकलीफ गवाना नहीं करेगी। घसियारों को पद्मश्री और पद्मभूषण की उपाधियाँ बँटेंगी और विद्वानों के लिये घास छीलने की ट्रेनिंग का पूरा प्रबंध होगा।

जब से ये कायदे कानून पास हुए हैं मेरे पड़ोसी की नेक खातून ने भी उल्टी गंगा बहाने की रिहर्सल तेज कर दी है। इस पतिव्रता ने अपने पति को डायबटीज की खौफनाक बीमारी से बचाने के लिये उसके मीठा काने पर ही पाबंदी नहीं लगाई बल्कि उसे मीठा बोलने पर भी पाबंदी नाफिज कर दी है।

अभी परसों की बात है कि हमारे जोरूभक्त पड़ोसी एक पुराने मित्र को स्वागत सत्कार के लिये अपने घर ले आए। उसे दीवान खाने में बिठाकर जब जनानखाने में गए तब अपनी महारानी को ताजे उबले हुए अंडे की तरह गर्म पाया। पतिदेव ने अपने मुँह में दुनियाभर की मिठास भरकर मेहमान को कुछ गर्म गर्म और नरम नरम पेश करने की फरमायश की। बीवीजी पहले ही फूलकर कुप्पा बनी बैठी थीं। बिन बादल बिजली बनकर कड़क उठीं—“और पकड़ लाओ ऐरे गैरे नत्थू खैरे दोस्तों को। मैं धर की मालकिन न हुई एक बाँदी हुई जो तुम्हारे मेहमानों के इशारों पर नाचती फिरूँ। जानते हो घर में न दूध है, न पत्ती, चीनी तो कब से गायब है। मैहमान की सेवा हो तो कैसे हो?

पतिदेव ने गिड़गिड़ाकर, घर की लाज बचाने की प्रार्थना की और पाँच मिनट में सब चीजें बाजार से लाकर हाजिर करने का वचन दिया। मेहमान ने जब अपनी भौजाई के बदले तेवर देखे, तब बेचारा सिर पर पाँव रख कर ऐसा भागा मानो रेस का घोड़ा हो। इतने में, सामान से लदे पतिदेव भी आ पहुँचे और मेहमान को गायब देख इधर-उधर झाँकने लगे। पत्नी जिसने सारा प्लाट पहले ही तैयार कर रखा था बच्चों की सी मासूम सूरत बनाकर बोली, “तुम भी अजब जानवरों को पकड़ लाते हो तुम्हारे दहलीज से पाँव निकालते ही चिल्लाने लगा कि उसे एक जरूरी काम याद आ गया है। मैं बहुतेरा पीछे भागती फिरी मगर दरवाजे से छलांग लगाकर जंगली हिरन की तरह कुलाँचे भरता हुआ भाग निकला। आज जो हुआ सो हुआ। अब कान खोलकर सुन लो, आखिरी बार कहे देती हूँ अगर दोस्ती का मजा चखना हो तो शहर में होटल बहुत हैं।“

उल्टी गंगा बहाने की वारदातें केवल सामान्य संसारी जीवों तक ही सीमित नहीं है। बड़े बड़े ऋषि मुनि भी इनकी लपेट में आ जाते हैं। इस संबंध में दीर्घतपा नामक एक मुनि का किस्सा बहुत प्रसिद्ध है। कहते हैं कि इस महर्षि ने अनंतकाल तक घोर तपस्या कर के अनेक दैवी शक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली थी। चुनांचे एक दिन अपनी तपस्या का चमत्कार देखने के लिये वह सोचने लगा कि क्यों ने मैं किसी कमजोर एवं क्षुद्र जीव को अपने तपोबल से इतना शक्तिशाली बना दूँ को लोग हैरान हो जाएँ। मुनि ने अपने इस विचित्र प्रयोग के लिये एक चूहे को चुना और उसे अपनी योगमाया से शेर के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस क्षुद्र चूहे के लिये इस प्रकार उल्टी गंगा देखने का यह पहला अवसर था। चूहा बल्लियों उछल रहा था कि वह कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। परंतु ज्यों ज्यों समय बीतने लगा उसका मन रह रहकर एक गुप्त चिंता से दहल उठा कि उसका यह नया रूप कहीं धोखे की टट्टी तो नहीं। वह लोगों को खुले आम यह कहते सुनता था, कि उस मुनि ने इस चूहे को शेर बना दिया है। इसीलिये वह मुनि के बारे में सोचता था कि इसने मुनि होकर उल्जी गंगा बहाने का कठोर अपराध किया था। अतः इस पापी मुनि को दंड मिलना चाहिये। दंड भी मृत्युदंड।

मुनि को बहुत जल्दी जल्दी उल्टी गंगा बहाने का फल मिल रहा था। हवन करते करते उसके हाथ जल उठे थे। चुनांचे इस अकाल मृत्यु से बचने के लिये अब उनके पास एक ही पाय था कि वे इस नमक हराम शेर को पुनः मूषक बना दें। जिसके लिये उन्होंने सरधड़ की बाजी लगा दी और उल्टी गंगा बहाने का प्रायश्चित करके सुख की नींद सोने लगे।

३० जनवरी २०१२