हास्य व्यंग्य

पिया तू अब तो आ जा
शरद तैलंग


अगर आप फिल्मी गाने सुनते हैं तो यह तो जानते ही होंगे  कि पिया नामक जो प्राणी होता है बडा बेदर्दी होता है। अक्सर सावन का मौसम आने के कुछ दिनों या महीनों पूर्व ही यह अपने घर से किसी दूसरे शहर या परदेस चला जाता है और बाद में नायिकाएँ कहती रहती हैं कि ‘अजहुँ न आए बालमवा सावन बीतो जाए।

वे कई गवैयों के पास भी जाती हैँ और उनसे आग्रह करती हैं कि तुम भी अपने गाने के माध्यम से पिया को सावन के महीने में घर वापस आने के लिये प्रेरित करो। गवैये भी अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं तथा याद पिया की आये, आये न बालम, मोहे भूल गये साँवरियाँ, या पिया बिन पिया बिना बसियाँ बाजे ना बाजे ना आदि गाकर पिया को बरगलाने की कोशिश करते रहते हैँ।

कुछ नायिकाएँ स्वयं गाती हैं और सावन के महीने को दोष देने लग जाती हैं कि ‘गरजत बरसत सावन आयो है पर लायो न संग में हमरे बिछुड़े बलमवा।’ जैसे सावन का काम पानी बरसाने के साथ ही साथ यह भी हो कि वह अपने संग में परदेस में बसे या बिछुड़े पियाओं को भी घर वापस लाए। सावन है या पुलिस विभाग ?

अक्सर मेरे मन में एक शंका जन्म लेती है कि नायिकाओं को सावन के महीने में या बरसात का मौसम आते ही पिया की याद क्यों सताती है जाड़े या गर्मी में क्यों नहीं। शायद इसका कारण यह हो सकता है कि पिया एक सरकारी नौकरी में होगा और तबादला होकर किसी दूसरे शहर में सेवारत हो गया होगा। उसके परिवार वाले उसी शहर में रह गए होंगे। परिवार जिस मकान में रहता होगा वह मकान सरकारी होगा और तबादले के बाद भी परिवार उसे खाली नहीं करना चाहता होगा। तबादला हुआ है तो मकान भी खाली करना चाहिये, लेकिन नहीं कर रहे हैं, जब बड़े बड़े अफसर नहीं कर रहे है, नेता नहीं कर रहे, मंत्री नहीं कर रहे तो वो क्यों करे? हो सकता है वह सोच रहा हो कि ऊपर कुछ ले दे कर उसका तबादला वापस उसी शहर में हो जाए तब क्या जो मकान मिला हुआ है वह फिर से आसानी से मिल पायेगा? नहीं ! इसलिये खाली मत करो।

अब सरकारी मकान है तो लाजमी है कि बरसात में पूरा टपकता भी होगा शिकायत करने पर यह जवाब भी मिल सकता है कि परेशानी है तो खाली कर दो बस यही बात तो है, जिसे कहते हैं कि कहा भी न जाये और रहा भी न जाये। शायद इसीलिये पिया की याद आ रही है कि कम से कम बरसात में सावन के महीने में जब घरोँ में पानी टपक रहा हो तब तो पिया तू आजा और सीमेंट में शक्कर का घोल बना कर छ्त पर चढ़ जा और टपकने का इलाज कर या घर में कमरों में पानी टपकने की जगहों पर बाल्टियाँ, भगोने, परात आदि रख जिससे सामान खराब न हो। अब गृहणी बच्चों को स्कूल भेजे, खाना बनाए, घर का सारा काम करे या छत पर चढ कर सीमेंट लगाए। क्या ऐसे कार्य गृहणियों को शोभा देते हैँ। माना कि महिलाओं ने आज सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व कायम किया है लेकिन उन के द्वारा छत पर चढ कर सीमेंट लगाने के कार्य के उदाहरण अभी भी कम ही मिलते हैँ। यह अधिकार तो पुरुषों ने अपने पास ही सुरक्षित रखा हुआ है।

यह मन भी बडा चँचल होता है। पिया सावन के महीने में घर क्यों नहीं आना चाहते इसका कारण जानने के लिये पता नहीं कहाँ कहाँ भटकता रहता है। यह भी हो सकता है कि पिया जी बाढ़ राहत कार्य विभाग में ही कार्यरत होँ तथा वे घर इसलिए भी नहीं आ रहे हो कि बाढ़ की सँभावनाएँ सामने हैँ और राहत कार्य शुरू होने वाला है। अब जब राहत कार्य शुरू हो जायेगा तो ऐसा न हो कि वो तो अपने घर में भगोने और बाल्टियाँ ही रखते रह जाएँ और राहत किसी और को मिल जाए। जब बाढ़ आयेगी तो राहत की आवश्यकता तो सभी को होती है चाहे राहत पाने वाला हो या देने वाला। मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा होता है। इसलिये राहत भी बड़े को बड़ी ही मिलती है।

ऐसा भी हो सकता है कि वह किसी विद्यालय में अध्यापक हो तथा जो अध्यापक होगा उसे अध्यापन के अतिरिक्त और भी बहुत सारे काम है कभी जन-गणना तो कभी मत गणना, कभी पोलिओ ड्रोप्स तो कभी मतदाता परिचय पत्र, कभी यूनिक आई डी तो कभी नगर निगम, एम.एल.ए. या सांसद के चुनाव। उसके पास तो इतना समय कहाँ कि सावन में वह अपने घर जाए।

यह भी संभव है कि इस मौसम में भारी बरसात होने के कारण जगह जगह बाढ़ आ गई हो और बाढ़ का दृश्य देखने के
लिये मंत्री जी बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में हेलीकोप्टर से हवाई सर्वे करने के लिये आ रहे हो। यह तो निश्चित है कि सरकार को बाढ़ का आँकलन जगह-जगह नष्ट हुई फसल, बेघर हुए लोग तथा उजड़े हुए मकानों भूखे प्यासे बच्चों को देखकर नहीं होता है वह तो हैलीकौप्टर में बैठकर ही होता है। हो सकता है पिया इसी मुफ्त में हैलीकौप्टर यात्रा का आनंद उठाने के चक्कर में मंत्री जी चमचागिरी में व्यस्त हो गए हों और घर की सुध लेना भूल गए हों।

सावन के महीने में बालमों के लिये घर से दूर रहने का एक लाभ यह भी है कि पिया जी के जब ‘सावन के महीने में इक आग सी सीने में लगती है तो वे पी लेते है और दो चार घड़ी जी लेते है।’ यदि घर में होते तो सीने की आग को बुझाने के लिये पत्नी ज्यादा से ज्यादा डाइजीन की गोली, या अजबाइन और मैथी के दाने पानी के साथ दे देती, भला उससे कोई आग बुझती है? इसलिये साव के महीने में तो कम से कम परदेस ही अच्छा है।

कभी कभी लगता है कि पिया इस मौसम में जान बूझ कर घर आना नहीं चाहता। वह जानता है कि इस महिने में बरसात और बाढ़ के साथ साथ कई त्योहार और बहुत सी मौसमी बीमारियाँ भी आने वाली होती हैं अर्थात घर का बजट गड़बड़ाने वाला होता है और इस मँहगाई के दौर में इन सब का खर्चा उठाना एक सरकारी कर्मचारी के बस की बात नहीं है। खर्च से बचने के लिये परदेस से बेहतर क्या जगह हो सकती है। घर न पहुँचने पर क्या होगा? ज्यादा से ज्यादा उसकी पत्नी उसे बेदर्दी, बैरी, हरजाई, जुल्मी आदि उपाधियोँ से विभूसित कर देगी एक और गीत गाना शुरू कर देगी जिसका भावार्थ भी पचासों गीतोँ की तरह वही होगा कि ‘पिया तू अब तो आजा..।'

३० जुलाई २०१२