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कमरे के बाहर बरांडे में लाल–लाल आँखों से घूरता समीर अकड़ा बैठा था, खाने के मेज़ पर बेतरतीब पड़ी बोतलों में एक सुनहरा सा पेय भरा हुआ था जिसे वह अराम से पी रहा था। गुल के माथे पर लम्बी सी चोट का निशान कुछ कहना चाह रहा था पर जिसे मुन्नू जी सहला रहे थे। वह तब भी हँस रही थी और तब तक फुर्तीले हाथों से बिअर के साथ–साथ ब्रेड भी बना चुकी थी। बिल्कुल वैसी ही जैसे चित्रों के साथ पत्रकारिता के काम निबटाती थी। मैंने उससे कुछ नहीं पूछा था, न उसने ही कुछ कहा था – सवालों और जवाबों के दरमियान कभी कुछ नहीं होता।

बस के शीशे में एक छोटी सी पहाड़ी झील का प्रतिबिम्ब उभर रहा था। मैंने खिड़की से बाहर देखा झील के पानी में स्वच्छता का नामोनिशान नहीं था, वहाँ केवल काई जमीन हुई थी – गहरी हरी काई – वैसे ही मैलापन....जैसे मैले शाल में लिपटी गुल अपने उस पहाड़ी बगीचे के छोटे से मकान में घुटी रह गई थी। हमारी इस मुलाकात के ठहरे हुए जल से काई हटा कर अच्छा किया या बुरा पता नहीं...बस दो ही दिन तो गुजारे थे मैंने गुल के साथ। वह वहाँ थी, घर भी था, उसी परिचित खट्टी गंध से रच बसा।

था तो वह पहाड़ी इलाका पर मरूस्थल जैसा वीरान था। बगीचा भी सूख गया था – कहीं कुछ नहीं उगा था। शायद इसलिए कि वह वहाँ रह रही थी और पता नहीं जी रही थी या केवल चित्र पेन्ट कर रही थी। शायद इसलिए भी कि जिदंगी का बयान चल रहा था और फैसाला अभी बाकी था – वह थी। परन्तु दरवाजा खोले खड़ी औरत वह नहीं थी, बेतहाशा बोलती, गुल, वह यह तो नहीं थी। इतनी चुप? परन्तु गंदगी के बावजूद कमरे में कुछ था, सृजनात्मकता की चमक से भरपूर, दीवार पर लगे दो–तीन चित्र, उनकी कलात्मकता, वही था शायद जो इस घर में जीवन्त था – नहीं तो क्या था वह अदृश्य? उम्र? बीता हुआ जीवन, या समय? जो चेहरे पर इतने सारे पदचिन्ह छोड़ जाता है कि जादुई आँखें फीकी सी हो जाती हैं और चेहरा चेहरा न रह कर बीते हुए वर्षों का कटाफटा अंकगणित।

शायद इसीलिए मुझे देखकर उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा था, "तू आ गई" कहकर उसने मुझे भीतर आने का इशारा सा किया, जैसे मेरा आना तय था। मैं कभी उसे, कभी उसके नये चित्रों को देख रही थी – सिक्के के दो रूप। उसके चित्र सचमुच सुंदर थे। किसी में काले सलेटी रंगों में घुलता नरकंकाल सा बना था, किसी में पहाड़ी ढ़लान पर ढ़ेर से जामुनी रंग के फूल हाथ में पकड़े बैठी तिब्बती औरत...शांत और चैतन्य...फूलों का जामुनी रंग पास की बोतल में भरे फूलों से मिल रहा था – कुछ चित्रित था कुछ जीवन्त, अभी गीले थे उसके चित्र।

"आ चल बैठ..." वह तब तक पानी आई थी। मुझे पानी पीना ही था, गंदे गिलास का मटमैला पानी मुझे पीना ही था क्योंकि मेरी उसकी मित्रता का बिन्दु पता नहीं क्या था? न शरीर, न घर की स्वच्छता, न खाना न पीना, न ही उसका पेन्टर होना – पता नहीं क्या?

"कपड़े बदल आ... तब तक चाय बन जाएगी...." हाँ मुझे भी लगा, अपने साफ सुथरे कपड़ों को साथ मैं उसके वातावरण में, अजीब सी, या आउट ऑफ प्लेस लग रही थी। भीतर कमरे में चली गई तो कुर्सी पर एक शाल पड़ा देखा ...अपना कुछ वैसा ही शाल निकालते याद आया, मेरी ननद का ऐसा ही शाल किसी पार्टी में खो गया था। मुझे याद है उस पार्टी से गुल अचानक ही मुझे बिना बताए चली गई थी। अकसर पर्स से गुम हो जाते कुछ शंकातुर तो करते थे पर धीरे–धीरे मैं उसकी चोरी की आदत से वाकिफ़ हो गई थी। अभी तो मैं अपना पर्स बाहर कुर्सी पर छोड़ आई थी। चोरी या शक को बेवक्त की उदासी की तरह उतार कर मैं अपने काले कफ्तान पर शॉल लपेटती बाहर आ गई। साथ लाई किताबों और नमकीन के पैकट उसके सामने रखती मैं उसके वातावरण में घुलने लगी थी...वह चाय का मग पकड़ाती कह रह थी– "इतना सारा लिख डाला तूने...सच बड़ी ऊर्जा है तुझमें...मैं तो बहुत काम नहीं कर पाती...जब से यहाँ आई हूँ... या जब से मुन्नू जी गए हैं...कितने वर्ष हो गए...सच कुछ याद नहीं रहता विन्नी... आई हैव लॉस्ट ट्रैक ऑफ टाइम, या पहाड़ी इलाका ही ऐसा है...गुमसुम–चुपचाप...सब कुछ भूला जा सकता है यहाँ, जैसे समय यहाँ अर्थहीन है।"

"तू भूल गई है क्या? सब कुछ, सारे अर्थ, गुल...?" लम्बी सी चुप्पी के बीच खिड़की पर लटका लम्बा सा कागज़ जिसके दोनों ओर दो सुनहरी सी लम्बी घंटियाँ बँधी थीं, मीठी–मीठी आवाज़ में बज उठीं– जैसे कुछ कह रही हों...पता नहीं क्या?

"कैसे हैं मुन्नू जी ?" मुझे वह दिन याद आ गया, बहुत वर्षों पहले, जब हम दोस्ती के साथ घरों में आने–जाने लगे थे। मेरी बेहद सफाई पसंद आदत, मेरा भगवान पर तटस्थ विश्वास, पूजा–व्रत–नियम के बारे में हर समय हँसी–मज़ाक करने वाली गुल अचानक ही सुबह–सुबह गुरूद्वारे जाकर माथा टेकने लगी थी। पता चला 'चालिया' कर रही थी। पूछने पर बता रही थी चालीस दिन रोज़ 'सुखमनी साहिब' का पाठ और गुरूद्वारे में माथा टेकने से मन की मुरादें पूरी होती हैं...।" बड़ी श्रद्धा से वहाँ के जल से मुन्नू के सूखते जिस्म की मालिश भी करती थी। अठारह–उन्नीस साल का मुन्नू पता नहीं किस बिमारी से ग्रस्त लाचार दिखता था। उसी की चिन्ता में गुल अपनी कुलीग जुबैदा के साथ किसी फकीर की दरगाह पर फूलों का चादर भी चढ़ा आई थी। मुझसे भी वह ‘महा मृत्युंजय’ का मंत्र लिखवा कर ले गई थी, जो वह हर सुबह मुन्नू के माथे पर हाथ रख कर बड़ी श्रद्धा से पढ़ती थी।

उस दिन जब गुल और मुन्नू दोनों अस्पताल में थे, इतने बड़े ऑपरेशन के समय कोई उसके पास नहीं था – न उसकी एकमात्र बहन और न ही बड़ा बेटा – बस समीर और काँपती टाँगों से कभी उठती कभी बैठती मैं। 'किड़नी–ट्रांस्प्लाट' कोई मामूली बात नहीं थी – वह दे रही थी, और मुन्नू ग्रहण कर रहा था। माँ थी ना, माँ तो कुछ भी दे सकती है अपने बेटे को। और शायद उसी की किड़नी थी जो मुन्नू के प्राण बन कर समा गई, वह धीरे–धीरे ठीक होने लगा। घर पर भी वातावरण 'इन्फैक्श्न फ्री' रखने के लिए, अपने ऑपरेश्न व अपनी दुर्बलता सभी को नकार कर गुल घर का सारा काम अपने हाथों से करती – न कोई आ सकता था, न जा सकता था – तिस पर पानी की तरह बहता पैसा। समीर की बढ़ती हुई खुन्दक, लडाई झगड़े...मारपीट...जो दरवाज़ों के भीतर उठते सिगरेट के धुएँ से शुरू होकर बीअर के भभके में समाप्त हो जाती थी।

मुन्नू ठीक हो कर किसी स्कॉलरशिप पर विदेश चला गया। इतने वर्षों में शायद एक या दो बार आया था, परन्तु अभी तक उसकी सभी महँगी, सस्ती दवाईयाँ गुल ही भेजती थी। विदेश में उसकी यह दवाईयाँ? मैं पूछती तो कहती, "मुन्नू कहता है यही सूट कर रही है तो यही रहने दो, नया कुछ क्यों प्रयोग किया जाए?" समीर अवकाश प्राप्त कर चुका था। पैंसों की तंगी में गुल सब उल्टे–सीधे काम कर डालती। पोस्टर पेंट करने से लेकर पत्रकारिता तक–दफ्तर की नौकरी, अनुवाद का काम, यहाँ–वहाँ भागकर काम उठाना, पहुँचाना सब कुछ। कितने साल से चक्की के पाटों में पिस रही थी गुल। जिस्म बेचारा क्या करता, काम से थके हाथ .. . .और फटे, बिवईयों भरे पैर। यही नहीं किसी बड़ी सामूहिक जगह से पर्सों में से पैसे चुरा लेना...क्या होता जा रहा था गुल को? फिर अचानक शहर छोड़ कर यहाँ आ गई, यहाँ किसी जमाने में उसके पिता का सेब का बागीचा था, देखभाल करने वाले मैनेजर के लिए बना छोटा सा घर, जिसकी काफी खस्ता हालत थी। उसमें यों अकेले रहना। मैं जैसे अपने को समझा रही थी – पहाड़ों में तिलस्मी ताकतें होतीं हैं। पहाड़ों में बसी शान्ति और शुद्धता किसी को भी सहलाकर अपने आप में लौटा लाती है, तभी तो तपस्वी संन्यासी तप करने पहाड़ों पर चले जाते थे। गुल पता नहीं कौन सा मसान साधती है? कैसी हो गई है कि पहचानना कठिन है।

"मुन्नू की चिठ्ठी आती है कभी?"
"बहुत दिनों से नहीं आई, मैं ही बूथ पर जाकर कभी कभी फोन कर आती हूँ। वह ठीक है, खुश है। एक अच्छी सी अमरीकन लड़की से शादी कर ली है। दोनों पीएच.डी. कर रहे हैं...पढ़ना उसका ध्येय था ना..."
"शादी" मैने प्रश्न चिन्ह लगाया।
"हाँ डाक्टर ने एलाउ कर दिया था .. . .मैंने यहाँ भी पूछा था..."वह रोई नहीं थी, पर जहाँ तक मुझे याद है अस्पताल से डिस्चार्ज के समय डॉक्टर ने बताया था कि ट्रांस्प्लांट के बाद ज़िदगी कुछ ही वर्ष आगे सरकती है...उसके बाद नहीं। कच्चे उम्मीद के धागे से बँधी एक दहशत की अदृश्य तलवार जैसे गुल के सिर पर झूल रही थी। वह उठ कर भीतर वाले कमरे में चली गई, दरवाज़ा बंद हो गया, सवालों पर जैसे दरवाज़ा भेड़ दिया था परन्तु जवाब...दरवाज़े पर एक पुराना बदरंग मास्क लगा था – भयानक राक्षसी चेहरे का लकड़ी का वह मास्क ही जैसे मेरे प्रश्न का उत्तर था, तभी तो ज़ोर ज़ोर से हँसा था। परन्तु इस बार, दरवाज़ा खोल कर जो गुल आई थी, वह जाने कैसे मास्क की कठोरता में घुलती कोई और स्त्री थी, रबड़ की सी, यन्त्रचालित सी आत्मविहीन, मिस्र की मम्मी जैसी, जो कुर्सी पर ऐसे बैठ गई थी जैसे उस तरह उसका बैठ जाना, उसकी वह मुद्रा तयशुदा थी।

आकृतियों की दुनिया में जीने के लिए वह इतनी विवश क्यों थी? उसे किसी तरह उस खोल से मुक्त करने के लिए, उसे अक्स की प्रतिबिम्बता से वास्तविकता में लाने के लिए मैंने कुछ भी किया – लगातार बोलती रही, पानी पिलाया, चाय पिलाई उसे पढ़ना पसंद था, कुछ पढ़ा भी– पर वह थी कि अपनी वह समाधित्व, आकृति रिक्त स्थिति से बाहर नहीं आई। निराश होकर मैंने खिड़की से बाहर देखा। डूबती हुई शाम रात में घुल रही थी। शहर की बत्तियाँ दूर कहीं टिमटिमा रही थी। अतः मैंने उस ट्रान्सफामर्ड गुल को कुर्सी से उठाया। वह ढहती लड़खड़ाती मेरे साथ घिसट कर बिस्तरे तक आ गई। बदसूरत पैरों की चप्पल उतार कर उसे लिटा दिया। फटा–मैला कंबल उढ़ाते मेरे भीतर दर्द टीस मारने लगा। कैसे रह रही थी गुल? बड़े बाप की बिगड़ी बेटी।

कहाँ गया माँ की वसीयत का इतना पैसा? समीर दिल्ली में रहना पसंद करता है, नई गाड़ी में कभी –कभी आता है – नया ‘शो रूम’. . .और गुल? कैसी फकीरी कैसी फाकामस्ती? सुबह गुल उठ गई थी। वैसे ही जैसी कोई भी साधारणतः अपने घर उठता है। चाय पीते हुए दिल्ली में उसके न रहने की बात पर...गुल ही बताने लगी थी, "मेरी हड्ड़ियों में मार खाने लायक दम कहाँ बचा है जो दिल्ली में रहूँ....और फिर मेरे और समीर के बीच कभी पुल बंधा ही नहीं। अकेला एक तरफा प्रेम पैरों की तरह दिल को भी लहूलुहान कर देता है। विन्नी, मैं हूँ ना तेरे सामने?"

"तू मुझे हमेशा पागल लगी थी गुल, बिना आगे–पीछे सोचे, समीर के प्यार में इतना डूब गई कि शिमला के 'स्कैंड़ल प्वाइंट' से बिना माँ–बाप को बताए भाग गई। तेरे माँ–बाप कितना विरोध करते रहे, पर तेरे पर तो किसी फिल्मी मुहब्बत जैसे जुनून सवार था। समीर क्या था, क्या है? तेरे मुकाबले में .. . .आज भी क्या है? कुछ बन पाया क्या?"

"प्रेम में आदमी पागल न हो तो वह प्रेम कैसा। विन्नी मैं जो भी करती हूँ दिल के कहने पर ही करती हूँ, फिर मुझे हिसाब–किताब आता ही कहाँ है जो समीर के हैसियत के जोड़–तोड़ निकालती...कन्वेन्शनल शादी मेरे बस की बात नहीं थी जो हेमा की तरह मैं भी पापा के ढूँढे किसी अमीरज़ादे को सिर झुका कर स्वीकार कर लेती।"
"हेमा कैसी है?"
"ठीक है, माँ की छोड़ी कोठी में अड्ड़ा जमाए बैठी है...समीर ने उस पर कोर्ट केस किया है। मैं भी तो बराबर की हकदार हूँ, वह कहता है। हेमा यहाँ आती है – बगीचा और यह टूटा–फूटा घर भी हथियाना चाहती है...उसे भी लगता है मुन्नू जी? साल बीत रहे हैं ना..."

"चल छोड़" मैं उसे डिप्रैशन के उस बिन्दु से ले आना चाहती थी। दरवाज़े के निकट छोटी से उस बगीची में थोड़े से फूल लगे थे, खास तौर पर जामुनी रंग के.....मैंने बात बदलने के लिए कहा–
"अरे बड़े सुन्दर फूल हैं, क्या नाम है इनका?"
"अंगरेजी में इन्हें 'आइरिस' कहते हैं। तुझे पता है ये फूल कब्रिस्तान में कब्रों के निकट लगाए जाते हैं..."
"तो तूने क्यों लगाया इन्हें?"
"अरे ये तो हमेशा हमेशा से यहाँ थे, 'सीमेट्री' ज्यादा दूर नहीं है ना यहाँ से, वह देख झील के उस किनारे पर...और फिर मुझे क्या फर्क पड़ता है। खैर, तू घबरा मत, मैंने इनका नाम बदल दिया है। मार्कन्डेय पुराण में नर्क के कगार के फूलों का वर्णन आया है, कि वे सभी फूल जामुनी रंग के होते हैं और उनका नाम है 'तप्तखुम्बा', अकेले निर्जन प्रदेश के फूल या शायद लावारिस–फूल।" अपने ही में खोई हुई गुल कह रही थी, "अपनी इस ज़िंदगी में किसी भी चीज़ से मुझे लगाव नहीं हुआ, विन्नी कभी किसी चीज़ ने मुझे आकर्षित भी नहीं किया। माँ के घर कितना कुछ था – बेशकीमती सामान, ज़ेवर, कपड़े, फर्नीचर...मैंने कभी कुछ नहीं उठाया। कुछ नहीं बांधता मुझे...मैं शायद किसी भी नौस्टेल्जिया में जी नहीं सकती।"

तभी खिड़की में टंगी वह अजीब लम्बोत्तरी घंटी हवा में हिलने लगी। "हल्लो मुन्नू जी" वह मुड़कर बोली – "इसे मुन्नू जी ने भेजा है। जापानी गुडलक का चिन्ह बना है इस कागज़ पर। पिछले साल उन्हें अपनी थीसिस पर एक लाख डालर का पुरस्कार मिला था – उसी खुशी में भेजा है। ये घंटियाँ जब भी बजती हैं, विन्नी मुझे लगता है मुन्नू जी मेरे पास हैं, मुस्करा रहे हैं...वह ठीक हैं, इतना मान सम्मान है उनका, उनके शरीर में मेरी किड़नी ठीक से काम कर रही है..." और गुल अपने सपने में ही चलती हुई भीतर के कमरे में गायब हो गई। जब बाहर आई तो शायद मेरे कारण ही साफ कपड़े पहनकर नहा धो आई थी।

"चल खाना रेस्तरां में चलकर खाते हैं विन्नी मेरे पास कुछ खास नहीं है तुझे खिलाने लायक..."
"ठीक है" मैं उठ खड़ी हुई। मैं भी बाहर जाना चाहती थी, कल से कुछ खाया नहीं था – ना उसने ना मैंने...
"कल रात तू...अच्छा जाने दे, ये बता कि तू क्या खाती है...बदबू मारती ओवर फरमेंटेड बीअर या घर की बनी बेस्वाद ब्रेड? मुझे तो लगता है तू खाना कभी बनाती ही नहीं – और समीर...वह क्यों नहीं देखता तेरी ज़रूरतें..."
"तू ही तो है विन्नी, जो ठीक से जानती है...मेरी ज़रूरतें क्या हैं? और फिर समीर...वह तो मेरे साथ कभी भी नहीं था...मेरे लिए प्रेम का रास्ता कांटों और उलझनों का था बस...और शादी का घोषणा–पत्र, कैसी अजीब सत्यता का?" पहली बार कहा था गुल ने वह, जो मैं जानती थी।

हमारा रेस्तरां आ गया था, बीते हुए वर्ष गवाह थे कि किसी भी रेस्तरां में बैठकर हमने कितना कुछ जिया था साथ–साथ, बेहिसाब बातें की थीं। हमारे चुपचाप बैठे पलों का भी लम्बा इतिहास थे ये रेस्तरां। वहाँ की पेपर नैपकिनों पर रक्खी हुई हमारी रचनाओं की नींव, कहानियों–उपन्यासों के अलावा उनकी चित्र प्रदर्शनियों के थीम, मेरे शोध कार्य का काम, सभी कुछ जीवंत हो उठा था। मुझे याद है ऐसे ही एक बार हम रेस्तरां में काफी पी रहे थे...समीर आँधी तूफान सा आया और गुल को घसीटता हुआ ले गया। उसे शक था कि गुल अपने गुरू समान इन्दर से प्रेम करने लग गई। उस दिन पहली बार मुझ पर समीर के व्यवहार का राज़ खुला था। मुन्नू जी के फोन करने पर जब गुल को देखने गई थी तो समीर की मार पीट, मुन्नू की बीमारी, घर की हालत सभी कुछ...तब से जैसे गुल मेरे ज़िम्मे आ गई थी . . डॉक्टर, दवाइयाँ, उनके बिल...।

तब गुल ने इतना भर कहा था, "गलत पैर रख देने से सभी कुछ गलत हो जाता है ना, बच्चे हो जाते हैं, आप किसी की मिल्कियत हो जाते हो...जिसका वजूद बैडरूम के डबलबेड से ज्यादा कुछ नहीं होता...इन्दर से प्रेम...वह हँसी थीं, शरीर क्या फिर शरीर होता है? विन्नी तुझे पता है कभी कभी मौत भी अपने पीछे मृत लाश नहीं छोड़ जाती...।"

छोटे से उस रेस्तरां के कोने में एक गिलहरी मरा हुआ तिलचट्टा खा रही थी। मैंने बहुत दिन बाद गिलहरी देखी थी... "ओह...गिलहरी...कैसे मज़े से खा रही है अपने कमज़ोर शिकार को।"
"सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट..." गुल ने कहा। उसकी पीली आँखों में अजीब सी पिलाई तैर आई थी...मैं सोच रही थी कि उसकी ये पिलाई हमेशा की तरह किसी रौशनी की किरण से क्यों नहीं मिलती...इतनी बुझती हुई क्यों है?

रेस्तरां का छोकरा दो प्लेटों में खाना रख गया था और उस दिन का अखबार भी..." जब भी बाहरी दुनिया की याद आती है विन्नी, मैं यहाँ आ जाती हूँ। यहाँ 'त्रिवेणी' जैसे परांठें मिलते हैं। बस खाने के साथ अखबार भी पढ़ लेती हूँ... चलो देखें इस बार कौन सा मिसाइल छूटा, किसने छू लिया चांद को?" उसने अखबार को मेज़ पर फैला लिया – एक पृष्ठ पर भुवनेशवर के निर्वस्त्र साधू का चित्र छपा था जो 'विशुभ–संक्रांति' के अवसर पर नंगे पैरों जलते हुए अंगारों पर चल रहा था परंतु पैर नहीं जले थे उसके।

"अजीब है न यह हठयोगी। आग भी अजीब है। उसने अपना धर्म नहीं निभाया। कैसे खड़ा है...निर्विकार..." मैंने कहा।
"घड़ी दो घड़ी आग पर चलता है तो तमाशा होता है। कुछ लोग तो उम्र भर आग पर चलते हैं...और चर्चा नहीं होती..." वह तेज़ जलती हुई काफी का कप उठाकर गटागट पी गई...एक ही घूंट में, एक ही साँस में।

घर पहुँचे तो कमरे में कुर्सी पर एक बड़ी सजी–धजी महिला बैठी थी – एक ठंडी सी 'हैल्लो' कहकर गुल भीतर चली गई। मैं वहीं बैठ गई, वह गुल से कुछ बड़ी सी लग रही थी – खूबसूरत साड़ी, कटे हुए बाल, गहरा मेकप, बड़ा सा पर्स जिसके साथ ही मेज़ पर उसकी लाई एक पत्रिका पड़ी थी 'द टू मर्डर स्टोरीज़' जिसकी काली पृष्ठभूमि पर कुछ चहेरे बने थे और अधनंगी विदेशिन के जिस्म से गिरता खून। दर्द का चेहरा, या फिर बड़ी प्रभावशाली आँखों और लम्बे सफेद घुँघराले बालों वाले न्यायाधीश का चेहरा, कानून का चेहरा, आतंक का चेहरा। एकाएक हवा के झोंके से मुन्नू जी की भेजी पतली नन्हीं सी घंटियाँ टुनटुनाने लगीं...
"ये कब खरीदा तूने...खरीदा या चोरी किया?"
"छिः, हेमा...ये तो मुन्नू जी ने भेजा है जापान से, उनको अवार्ड मिला है न, उसी खुशी में..."
"कमाऊ बेटे कुछ भेजते हैं तुझे? पैसा धेला? या बस घंटियाँ ही बजाते हैं...कितना पैसा बहाया उसके इलाज पर कुछ तो लौटाता..."
"हेमा...पैसा ही तेरे लिए सब कुछ है...तू इतना सब तो ले चुकी मुझसे...और फिर तुझे पता ही है...कितना पैसा विन्नी ने दिया अस्पताल में, मिली ना विन्नी से..." फिर मेरी तरफ देखकर बोली..."विन्नी ये है मेरी बहन हेमा .. . ."
"ओह" वह उठ खड़ी हुई...झटपट गुल की पेन्टिंग्स अखबार के कागज़ों में लपेटने लग गई।
"बस चार महीने में इतना ही बनाया, या ये तेरी विन्नी ले जाती है तेरी तस्वीरें...ये कब से आने लगी है यहाँ?"

अपमान से जलती मैं देखती रही। गुल बीअर का जग ले आई थी और चाय की केतली के साथ हेमा के लिए सैन्डविच भी। वह हाँफती हुई बोली..."हेमा विन्नी यहाँ पहली बार आई है...उसे क्या लेना देना है...मेरी पेन्टिंग्स से" वह ज़ोर–ज़ोर से साँस ले रही थी और एकाएक उसकी आँखों में पीला रंग हल्दी सा होने लगा। मैंने ही कहा..."हेमा जी अच्छा हुआ आप आ गई, इसको इलाज की जरूरत है – देख रही हैं कैसी हो गई है...आप इसे शहर ले जाएँ...इसे नशे की अँधेरी खाइयों से बचा लीजिए, कितनी बीअर पीने लगी है ये...?"

"पहले ये बताओ तुम्हारा क्या इंटरेस्ट है यहाँ, क्यों आई हो – किसलिए खर्चा करती हो गुल पर, क्यों इतने रूपए बहाए इसके और मुन्नू जी के ऑपरेशन पर? क्यों?" मैं स्तब्ध उसको, गुल की एकमात्र बहन को, फटी–फटी आँखों से देखती रही। मेरे पास जवाब भी क्या था? वही क्रूरता से बड़बड़ाए जा रही थी, "तभी मैं सोचती थी इसकी पेन्टिंग्स जाती कहाँ है? कीमत बढ़ गई है ना इसकी। समीर का शोरूम इसी की बदौलत चल रहा है। लोग तभी तो पता पूछते हैं इसका।"

गुल बीअर के गिलासों में डूबती जा रही थी। पहली शाम जैसी तन्द्रा टूटे हुए बादल की तरह उस पर फिर मंडराने लगी थी। मैं उठ खड़ी हुई। पर्स में टटोल कर देखा। वापसी का टिकट था, परन्तु रूपए–पैसे नदारद थे, एकमात्र मुड़ा–तुड़ा सौ का नोट, कोने में फँसा रह गया था। काफी था सफर के लिए, सोच कर चल पड़ी। टुनटुनाती घंटी का डूबता स्वर और मास्क लगा वह दरवाजा मेरी पीठ पीछे बंद हो गया था।

अब तक बस किसी कच्चे रास्ते पर उतर आई थी। काई लगी झील पितलाई आँखों से ओझल हो चुकी थी। एकाएक पहाड़ी शाम और गहरे ढलान से नीचे जाती बस...दिल जैसे बैठा जा रहा था। मैंने आसपास देखा, सभी दहशत में थे। एक तरफ जानलेवा खाई तो दूसरी तरफ यह गहरी ढलान...मैंने डिप्रैशन में डूबते अपने दिल से सवाल किया, या शायद बहुत पहले के पुराने सवाल का जवाब माँगा, "गुल? मेरा क्या इंटरेस्ट है उसमें? क्या?" परन्तु कुछ आत्माएँ जवाब नहीं देतीं, या कुछ उत्तर अपने आप में समाविष्ट होते हैं, उन्हें माना जाता है...कहा नहीं जाता...।

तभी एक लम्बी सी रुलाई चीख में बदलती हुई...बस की छुटपुट आवाज़ों में खट् की आवाज़ से किसी चीज़ का गिरना, चीख में सम्मिलित होती कुछ और चीखें...बहुत से स्वर, चिल्लाहटें . .. ."ठहरो" "रूको" जैसी दहशत धुंध के साथ खिड़कियों में अँधेरे सी भरने लगी।

रिफ्लेक्स ऐक्शन, सभी ने मुड़कर देखा, एक बूढ़ी औरत ज़ोर ज़ोर से दहाड़ें मार कर रो रही थी, हतप्रभ सी एक जवान लड़की बेहोशी जैसी स्थिति में उसके साथ बैठी थी। बूढ़ी औरत का जो स्वर समझ आया था, "हाय मेरा बेटा...हाय मेरा लाल...इलाज तो होने देता, तू तो पहले ही चल बसा...।"

बस झटके से रूक गई थी। लोग अपने–अपने मशवरे दे रहे थे..."उतारो इसे", दिल का मरीज़ था, बुढ़िया इलाज के लिए शहर जा रही थी, रास्ते में ही दम निकल गया बेचारे का।"
"छोटी सी नवब्याहता बहू..." बस ड्राइवर और कंडक्टर यात्रियों से पूछताछ करने लगे...बूढ़ी माँ का सफेद बालों से घिरा कमज़ोर चेहरा जाने क्या–क्या कह रहा था...हाथ जोड़ रहा था, पैर छू रहा था, पर कानून? दर्द से बड़ा है कानून...?
"माई हम क्या करें? कानून है – लाश बस में नहीं ले जाई जाती...तुझे उतरना पड़ेगा माई, यहीं इसी वक्त..."
सभी सहयात्री हाँ में हाँ मिला रहे थे, "उतारो...उतारो..."
"मैं कहाँ जाऊँगी...यहाँ जंगल है...मेरा बेटा...मेरे बच्चे के साथ ये सलूक हो रहा है...मेरे पास पैसे तक नहीं है...भाई के आसरे शहर जा रही थी, इलाज करवाना था..."

दयावान यात्रियों ने चन्दा इकठ्ठा किया – मेरा एकमात्र मुड़ा तुड़ा नोट, पैसे पास न होने का अफसोस गम...मौन को समझा न पाने की अपनी दुर्बलता, क्या कर सकता था कोई? जवाब फिर जहाँ खामोश हो जाते हैं वहीं शब्दों की दलाली में घुला भीड़ का विकल्प उस निर्जीव शरीर को ज़मीन पर उतार रहा था। एक बूढ़ी, एक जवान और...आसपास बस्ती का कोई नामोनिशान नहीं। यात्री जिद्दी आँखों से पता नहीं क्या देख रहे थे। बस चल पड़ी थी, परन्तु मैं उस गति में शामिल नहीं थी। एक मुर्दा हुए इतिहास में कुछ खोजना चाह रही थी। कानून का हृदयहीन चेहरा, चाह रही थी कानून के स्टेल, पुराने दकियानूसी चेहरे पर से सफेद बालों का झूठा, नकली विग उतार कर फेंक दूँ। कुछ तो देखे कानून, कुछ तो? मैं क्यों इतनी ज़ोर से चिल्लाकर रोने लग गई थी, पता नहीं। लोग मुझे घेर रहे थे –
"आपकी रिश्तेदारी थी क्या?"
"इतनी फकीर सी, इस मेमसाहब की रिश्तेदारी कैसे हो सकती है..."
"बताइए तो क्या सम्बन्ध है आपका उसका...?"

सारा संसार सिर्फ रिश्ते तलाशने में लगा है। स्वार्थ से बड़ी कोई दूसरी भावना नहीं हैं क्या? लगा मेरे भीतर कुछ टूट कर बह गया था। कुछ...जिसे मैं बहुत साहस के अब तक रोके हुए थी – रुका हुआ बाँध प्रपात हो गया था। आँसू का पानी किसी भी आँख से बहे, तो केवल पानी होता है? आँसू नहीं? पानी का रंग इतना अहम होता है क्या?

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९ सितंबर २००४  

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