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“माँ, आप पिताजी से कैसे मिली
थीं?”
सान्या ने बड़े भोलेपन से मेरी ओर देखते हुए पूछा, उसके सवालों
ने मुझे अतीत की दुनिया में पहुँचा दिया था।
“सागर किनारे दिल ये पुकारे...” गाना गुनगुनाते मेरे पाँव
थोड़ा ठिठक गए। एक बॉल मेरे पैरों के पास आकर रुक गई थी। मैंने
उस बच्चे की ओर बॉल दोबारा उछाल दी। बच्चे ने एक गहरी
मुस्कराहट के साथ मुझे देखा। बीच पर बच्चे का पूरा परिवार बॉल
के साथ खेल रहा था। थोड़ी दूरी पर कोयलों पर भुनते मीट की महक
वातावरण में फैली हुई थी। समुद्र के किनारे ‘बारबीक्यू’ (लोहे
के स्टैंड पर कोयलों को जलाकर मांस भूनना) बनता देखना मुझे
पसंद है।
हर तरफ छुट्टी के माहौल का जोश बरक़रार था, पर क़तर के इस
सीलाइन बीच पर अस्त होते सूर्य के साथ मेरा दिल भी कुछ डूबा जा
रहा था और अजीब से ख़याल लहरों की भाँति दिमाग में मचल रहे थे।
आसमान पीले, संतरी और लाल रंग के संगम की चित्रकारी से सजा हुआ
था और मुझे यह विहंगम दृश्य देखना सबसे मनोरम लगता है। सामने
एक मिश्रित जोड़ा हाथ पकड़े पानी के बीचोंबीच खड़ा था। उनके
प्रेम की ऊष्मा मुझे अपने अंदर महसूस होने लगी।
दुनिया के इस भाग में रहते-रहते विभिन्न देशों के नागरिकों से
मिलते-मिलते लगता है कि अभी तक कितना कम जानती थी लोगों के
बारे में—उनके खान-पान, रहन-सहन और मान्यताओं व विश्वास के
विषय में। पर अभी लोगों को समझने लगी हूँ और अपनी मान्यताओं के
साथ दूसरों की मान्यताओं को स्वीकारने भी लगी हूँ। ये
स्वीकारना भी अजीब ही होता है। जब स्वयं के मन से स्वीकारा जाए
तब सुखद, और दूसरे के मन से किया जाए तो दुखद।
ओह हो, इतना कुछ लिख दिया, पर अपने बारे में तो कुछ बताया ही
नहीं। मेरा नाम शीना, मान्या, आयशा, मरियम या कुछ और भी हो
सकता है—नाम में क्या रखा है? अधिकांश कामकाजी अकेली लड़कियों
का जैसा जीवन होता है, मेरा भी बहुत कुछ उसी प्रकार था। अगर
पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करूँ, तो भारत से दस साल पूर्व
खाड़ी के इस देश क़तर आई थी—पैसा कमाने, ताकि अपने परिवार की
कुछ मदद कर सकूँ। कुछ साल रहने के बाद जब वापस जाना हो, तब हाथ
में कुछ पैसे हों, घर की मरम्मत करवा सकूँ, भाई-बहनों को सहारा
दे सकूँ और एक अच्छी ज़िंदगी जीने का सपना पूरा हो सके। लोग
नैतिकता की बातें तो बहुत करते हैं, पर बिना पैसे कोई काम नहीं
आता—ये मेरे अपने अनुभव बताते हैं।
आप अगला भाग भेज सकती हैं 😊
माता-पिता ऐशोआराम की ज़िंदगी तो नहीं दे पाए, पर हम पाँच
भाई-बहनों को पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पापा के
गुज़रने के बाद घर की सबसे बड़ी बेटी होने के नाते सभी
ज़िम्मेदारी स्वयं ही अपने कंधों पर अनुभव करने लगी और यहाँ आ
गई। अच्छी नौकरी भी मिल गई। घर की स्थिति बदलने लगी। दोनों
छोटी बहनों का पढ़ाई में मन नहीं था, तो कुछ साल बाद दोनों की
अच्छे घरों में शादियाँ कर दीं। भाई अभी पढ़ रहे थे, तो सोचा
अभी कुछ साल और ज़िम्मेदारियाँ उठानी हैं।
टैक्सी में रेडियो ओलिव, जो यहाँ का प्रसिद्ध रेडियो एफ.एम.
है, बज रहा था। तभी ऊबर के पाकिस्तानी ड्राइवर ने ज़ोर का
ब्रेक लगाया और मैंने देखा, टैक्सी घर के पास पहुँच गई थी।
बटुए से पचास रियाल का नोट उसे पकड़ाते हुए मैं टैक्सी से उतर
गई।
“मेम, आपके घर के बाहर डिलीवरी का पैकेट रखा है,” नेपाली
वॉचमैन ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में मुझे सूचित किया।
“हाँ-हाँ, ठीक है,” बोलती हुई मैं अपने फ्लैट की ओर बढ़ गई।
सामने दूध और किराने के सामान का पैकेट रखा हुआ था, जो मैंने
आते-आते बुक कर दिया था। सामान उठाते हुए मैंने दरवाज़ा खोला
और सारा सामान फ्रिज में लगा दिया। हॉल में आकर टी.वी. चालू
किया और नहाने चली गई। टी.वी. की आवाज़ों से किसी के होने का
एहसास होता है, खाली घर का अकेलापन कुछ अधिक ही खाली लगता है।
स्नान करके मैं बिस्तर पर चली गई।
“क्या जीवन रह गया है, कोई ऐसा नहीं जिससे अपने मन की बात कर
सकूँ।” बस यही मेरी दिनचर्या थी—सुबह से शाम तक ऑफिस, छुट्टी
वाले दिन बीच पर जाना। सप्ताह में दो बार भारत बात करना और इसी
प्रकार साल-दर-साल का समाप्त होना। कल ऑफिस भी जाना है। कल
रविवार था, पर यहाँ रविवार से सप्ताह आरंभ होता है, तो शनिवार
रात से ऑफिस के कामों की चिंता सताने लगती है। सोचते-सोचते कब
नींद के आगोश में समा गई, मुझे भी नहीं पता चला।
“मेम, आपको बॉस बुला रहे हैं,” सहायक ने जैसे ही सूचित किया,
मैं नए प्रोजेक्ट की फाइल लेकर उनके केबिन की ओर बढ़ गई। आज
ऑफिस में बहुत अधिक काम था। एक नए प्रोजेक्ट पर काम चालू था और
मैं ही उसको लीड कर रही थी।
“मान्या, आजकल तुम्हारा ध्यान किधर है? दो दिन हो चुके हैं और
तुमने अभी तक क्लाइंट से बात नहीं की। तुम अच्छी तरह जानती हो,
बहुत दिन बाद हमें यह नया प्रोजेक्ट मिला है। अगर यह नहीं
फाइनल हुआ, तो सबकी नौकरी खतरे में है।” बॉस की आवाज़ की
गंभीरता मुझे यह बताने के लिए काफ़ी थी कि अब मुझे इस
प्रोजेक्ट पर पूरा ध्यान देना है।
वापस आते ही मेरे हाथ फ़ोन की ओर बढ़कर रुक गए। हाथ में फाइल
थी और उस पर बोल्ड अक्षरों में क्लाइंट का नाम लिखा हुआ
था—शिवम त्रिपाठी। क्या फ़ोन करूँ या न करूँ? मन पशोपेश में
था, पर मैंने सिर को हल्के से झटका दिया। कोई ज़रूरी तो नहीं,
ये वही हो। आखिरकार कॉल मिला ही लिया।
“जी, मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूँ?” उधर से एक सुरीली-सी
आवाज़ ने पूछा।
क्या मैं शिवम जी से बात कर सकती हूँ?
“जी, अभी तो सर ऑफिस में नहीं हैं। आप अपना नाम बता दें, तो
मैं उनको सूचित कर दूँगी,” शिवम की सचिव ने उधर से उत्तर दिया।
“जी, आप बता दीजिएगा—हाई टेक कंपनी क़तर से मान्या शर्मा का
कॉल था,” मैंने फ़ोन रखते हुए कहा।
शाम के पाँच बज चुके थे। मैंने डेस्क को सही करके लिफ्ट की ओर
कदम बढ़ाए।
“मान्या, मान्या, रुको तो, साथ में चलते हैं,” बोलते हुए सोहन
दौड़ता हुआ मेरे साथ लिफ्ट में प्रवेश कर गया। “हाँ-हाँ,” बेमन
से मैंने कहा और लिफ्ट का बटन दबा दिया। ऑफिस से बाहर आकर सोहन
और मैंने साथ-साथ मेट्रो स्टेशन की ओर चलना शुरू किया।
चलते-चलते मेरे पाँव थकने लगे, गला सूखने लगा था। सोचा, मेट्रो
स्टेशन में अंदर जाकर पानी पीती हूँ। सामने ही क़तर के अल विदा
पार्क का मेट्रो स्टेशन था, पर सिक्योरिटी गार्ड चप्पे-चप्पे
पर खड़े थे और हमें बीस मीटर की दूरी पार करने के लिए करीब तीस
मिनट तक गोल-गोल चक्कर लगाने थे। “हबीबी, दिस वे,” सिक्योरिटी
गार्ड ने मुस्कराते हुए आगे बढ़ने का संकेत किया। यह सारे
सुरक्षा चक्र पार करके ही स्टेशन के अंदर प्रवेश मिलना था।
भीड़ अनियंत्रित होने के डर से यह सारी व्यवस्था की गई थी। जो
स्टेशन खाली रहते थे, वे सभी अभी लाखों की संख्या में फुटबॉल
प्रेमियों से भरे पड़े थे। और हो भी क्यों न, फुटबॉल विश्व कप
2022 यहाँ क़तर में होने वाला था और पिछले दस वर्षों से मैं
इसका इंतज़ार भी कर रही थी।
आखिरकार स्टेशन में प्रवेश का अवसर मिल गया। सोहन मेरे लिए एक
पानी की बोतल ले आया था। पानी पीकर मुझे थोड़ा अच्छा लगा और
मैंने ‘अल वकरा’ की ट्रेन पकड़ी और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चली।
सीट पर बैठकर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, क्योंकि मुझे पता
था कि आखिरी स्टेशन अल वकरा ही है और वहीं मुझे उतरना था। यह
मेरी दिनचर्या का अंग था—प्रतिदिन सुबह आठ बजे घर से निकलना और
अल वकरा स्टेशन से दोहा के अल विदा पार्क स्टेशन पर उतरना।
मेरा ऑफिस स्टेशन से दस मिनट की दूरी पर ही था, पर कुछ दिन से
मेरी मनोस्थिति कुछ अलग-सी थी। उस पर से आजकल की भीड़ से अलग
परेशानी होने लगी थी। सोहन मेट्रो में सामने की सीट पर बैठा
था, पर हम दोनों के बीच बिल्कुल चुप्पी थी।
“मान्या, कहीं रात्रिभोज करते चलें,” मेट्रो से उतरते हुए सोहन
ने प्रस्ताव दिया।
“नहीं-नहीं, मैं तो आजकल रात में सलाद ही खाती हूँ,” मैंने
उत्तर दिया और आगे बढ़ गई। शायद सोहन ने इस महीने में मुझसे
दसवीं बार डिनर का प्रस्ताव दिया होगा। सामने ब्राज़ील के
फुटबॉल प्रेमी अपनी टीम के समर्थन में समूह बनाकर नाच रहे थे,
पर मुझे अपनी पीठ पर सोहन की दृष्टि देर तक महसूस होती रही।
क्या मुझे सोहन का प्रस्ताव स्वीकार करना चाहिए था? प्रतिदिन
उसका प्रेम-निवेदन उसकी आँखों में स्पष्ट पढ़ सकती हूँ, पर
हाँ-ना, हाँ-ना—यही विचार-मंथन मेरे अंदर चलता रहा और तभी
देखा, मैं अपनी बिल्डिंग के सामने खड़ी थी। गार्ड मुझे देखकर
मुस्कराया, मैं भी अभिवादन करती हुई लिफ्ट में चढ़ गई। घर
पहुँचकर स्नान करके कुछ अच्छा लगा। माँ से भारत बात की। माँ
भाई के बारे में ही अधिक बात करती रहीं—“मन्नो, अब छोटे की
नौकरी लगते ही उसकी शादी कर देंगे।” मैं अनमने मन से “हूँ-हूँ”
करती रही और फिर फोन रख दिया। माँ ने एक बार भी मेरा हाल-चाल
पूछने की ज़रूरत नहीं समझी। मैं क्या सिर्फ एटीएम मशीन हूँ,
जिसकी याद सबको पैसे निकालते वक्त आती है? यही सोचते-सोचते मैं
फिर नींद में झूलने लगी और एक और दिन समाप्त हो गया।
आज आँख खुलते ही मुझे बहुत तरोताज़ा-सा लगा, शायद रात को नींद
अच्छे से आने के कारण ऐसा लग रहा था। तैयार होकर मैं ऑफिस के
लिए निकल पड़ी। फिर वही मेट्रो का सफर, पर आज सब कुछ अच्छा लग
रहा था। ऑफिस जाकर नए प्रोजेक्ट की फाइल खोली और उस नए क्लाइंट
को फोन लगा दिया। उधर से एक भारी-भरकम आवाज़ सुनाई दी और मैं
उन्हें निश्चिंत होकर प्रोजेक्ट के बारे में समझाने लगी।
“मान्या, मान्या, रुको तो, साथ में चलते हैं,” बोलते हुए सोहन
दौड़ता हुआ मेरे साथ लिफ्ट में प्रवेश कर गया। “हाँ-हाँ,” बेमन
से मैंने कहा और लिफ्ट का बटन दबा दिया। ऑफिस से बाहर आकर सोहन
और मैंने साथ-साथ मेट्रो स्टेशन की ओर चलना शुरू किया।
चलते-चलते मेरे पाँव थकने लगे, गला सूखने लगा था। सोचा, मेट्रो
स्टेशन में अंदर जाकर पानी पीती हूँ। सामने ही क़तर के अल विदा
पार्क का मेट्रो स्टेशन था, पर सिक्योरिटी गार्ड चप्पे-चप्पे
पर खड़े थे और हमें बीस मीटर की दूरी पार करने के लिए करीब तीस
मिनट तक गोल-गोल चक्कर लगाने थे। “हबीबी, दिस वे,” सिक्योरिटी
गार्ड ने मुस्कराते हुए आगे बढ़ने का संकेत किया। यह सारे
सुरक्षा चक्र पार करके ही स्टेशन के अंदर प्रवेश मिलना था।
भीड़ अनियंत्रित होने के डर से यह सारी व्यवस्था की गई थी। जो
स्टेशन खाली रहते थे, वे सभी अभी लाखों की संख्या में फुटबॉल
प्रेमियों से भरे पड़े थे। और हो भी क्यों न, फुटबॉल विश्व कप
2022 यहाँ क़तर में होने वाला था और पिछले दस वर्षों से मैं
इसका इंतज़ार भी कर रही थी।
आखिरकार स्टेशन में प्रवेश का अवसर मिल गया। सोहन मेरे लिए एक
पानी की बोतल ले आया था। पानी पीकर मुझे थोड़ा अच्छा लगा और
मैंने ‘अल वकरा’ की ट्रेन पकड़ी और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चली।
सीट पर बैठकर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, क्योंकि मुझे पता
था कि आखिरी स्टेशन अल वकरा ही है और वहीं मुझे उतरना था। यह
मेरी दिनचर्या का अंग था—प्रतिदिन सुबह आठ बजे घर से निकलना और
अल वकरा स्टेशन से दोहा के अल विदा पार्क स्टेशन पर उतरना।
मेरा ऑफिस स्टेशन से दस मिनट की दूरी पर ही था, पर कुछ दिन से
मेरी मनोस्थिति कुछ अलग-सी थी। उस पर से आजकल की भीड़ से अलग
परेशानी होने लगी थी। सोहन मेट्रो में सामने की सीट पर बैठा
था, पर हम दोनों के बीच बिल्कुल चुप्पी थी।
“मान्या, कहीं रात्रिभोज करते चलें,” मेट्रो से उतरते हुए सोहन
ने प्रस्ताव दिया।
“नहीं-नहीं, मैं तो आजकल रात में सलाद ही खाती हूँ,” मैंने
उत्तर दिया और आगे बढ़ गई। शायद सोहन ने इस महीने में मुझसे
दसवीं बार डिनर का प्रस्ताव दिया होगा। सामने ब्राज़ील के
फुटबॉल प्रेमी अपनी टीम के समर्थन में समूह बनाकर नाच रहे थे,
पर मुझे अपनी पीठ पर सोहन की दृष्टि देर तक महसूस होती रही।
क्या मुझे सोहन का प्रस्ताव स्वीकार करना चाहिए था? प्रतिदिन
उसका प्रेम-निवेदन उसकी आँखों में स्पष्ट पढ़ सकती हूँ, पर
हाँ-ना, हाँ-ना—यही विचार-मंथन मेरे अंदर चलता रहा और तभी
देखा, मैं अपनी बिल्डिंग के सामने खड़ी थी। गार्ड मुझे देखकर
मुस्कराया, मैं भी अभिवादन करती हुई लिफ्ट में चढ़ गई। घर
पहुँचकर स्नान करके कुछ अच्छा लगा। माँ से भारत बात की। माँ
भाई के बारे में ही अधिक बात करती रहीं—“मन्नो, अब छोटे की
नौकरी लगते ही उसकी शादी कर देंगे।” मैं अनमने मन से “हूँ-हूँ”
करती रही और फिर फोन रख दिया। माँ ने एक बार भी मेरा हाल-चाल
पूछने की ज़रूरत नहीं समझी। मैं क्या सिर्फ एटीएम मशीन हूँ,
जिसकी याद सबको पैसे निकालते वक्त आती है? यही सोचते-सोचते मैं
फिर नींद में झूलने लगी और एक और दिन समाप्त हो गया।
आज आँख खुलते ही मुझे बहुत तरोताज़ा-सा लगा, शायद रात को नींद
अच्छे से आने के कारण ऐसा लग रहा था। तैयार होकर मैं ऑफिस के
लिए निकल पड़ी। फिर वही मेट्रो का सफर, पर आज सब कुछ अच्छा लग
रहा था। ऑफिस जाकर नए प्रोजेक्ट की फाइल खोली और उस नए क्लाइंट
को फोन लगा दिया। उधर से एक भारी-भरकम आवाज़ सुनाई दी और मैं
उन्हें निश्चिंत होकर प्रोजेक्ट के बारे में समझाने लगी।
शुक्र है, यह वह शिवम् त्रिपाठी नहीं था, जो मेरे साथ कॉलेज
में पढ़ता था और कॉलेज के आखिरी साल में मेरे माता-पिता से
मेरा हाथ माँगने आ गया था। पिताजी के इंकार करने पर भी उसने
हिम्मत नहीं छोड़ी और पुनः अपने माता-पिता के साथ मेरे घर आया
और मेरे पिताजी ने बुरी तरह अपमानित करके घर से निकाल दिया।
उसके बाद हम कभी नहीं मिले। मेरे किशोर मन के जिन तारों को
उसकी नज़रों ने झंकृत किया था, वे उसके बाद कभी नहीं बजे। पर
जाते-जाते शिवम की माँ का मुझे कोसते हुए यह कहना—“ज़िंदगी भर
परिवार को तरसना”—मुझे आज भी तड़पाने लगता है। शायद उनका श्राप
मुझे लग गया और मेरा जीवन तन्हा रह गया है।
“मान्या, आज शाम साथ में चलना, मैं कार से आया हूँ,” सोहन की
आवाज़ से मेरे विचारों की श्रृंखला टूट गई। पता नहीं कैसे मेरे
मुँह से हाँ निकला और सोहन के चेहरे की चमक ने उसकी ख़ुशी
ज़ाहिर कर दी। अच्छे से सोहन के जज़्बात समझती हूँ, पर पता
नहीं क्यों कभी भी उसके प्रस्ताव को स्वीकारने की हिम्मत नहीं
जुटा पाई।
शाम को जैसे ही लिफ्ट की ओर बढ़ी, सोहन ने लिफ्ट का बटन
बेसमेंट पार्किंग के लिए दबा दिया। उसके साथ कार की आगे वाली
सीट पर बैठते हुए थोड़ा अटपटा-सा लगता रहा। तभी मैंने देखा,
सोहन ने कार को एक पाँच सितारा होटल के बाहर रोक दिया।
“मान्या, आओ अंदर चलें,” सोहन ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए
कहा।
“अरे! सोहन, मैं आजकल डिनर नहीं करती और ऑफिस के इन फॉर्मल
कपड़ों में यहाँ बड़ा अजीब लगेगा।”
“ऐसा कुछ नहीं है, तुम आओ तो सही,” सोहन ने आज जैसे हठ ही ठान
ली थी।
“ठीक है, चलो,” मैंने बड़े बेमन से अंदर कदम बढ़ाते हुए कहा।
बड़े हॉल को पार करके मैंने जब अंदर वाले छोटे हॉल को देखा, तो
मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। सामने मेरी माँ, भाई-बहनें और
सोहन का पूरा परिवार खड़ा था और सोहन मेरे सामने घुटने पर,
हाथों में एक हीरे की अँगूठी लिए बैठा था।
“क्या तुम मुझसे शादी करोगी, मान्या?”
“हाँ,
सोहन,” कहते हुए मैंने उसे हाथ पकड़कर उठा लिया और अँगूठी
पहनने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।
ऐसे मेरी प्रेम-भरी वैवाहिक कहानी की शुरुआत हुई और जीवन जब से
सतरंगी किरणों से सराबोर है, कहते हुए मैंने सान्या के गालों
पर एक प्यार भरा चुंबन अंकित कर दिया।
जीवन चलते रहने का नाम है, रुकने का नहीं। छोटी-छोटी खुशियाँ
हमें जीवंत रखती हैं। ज़िंदगी में अपनों के रहने से ही बहार
होती है—यह बात मुझे समझ आ गई और आज मैं मान्या अपने परिवार के
साथ बहुत खुश हूँ। यही बात अपने सुधी पाठकों से भी कहना चाहती
हूँ कि अच्छे और सच्चे संबंध जीवन का आधार होते हैं। |