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पर्व परिचय



चैत्र नवरात्र में बाड़ी पूजन
- श्रीकृष्ण जुगनू
 


बाड़ी पूजन (या माताजी की बाड़ी) चैत्र नवरात्रि के दौरान किया जाने वाला एक पारंपरिक अनुष्ठान है, जिसमें जवारे (गेहूँ/जौ) बोए जाते हैं और माताजी का प्रतीक मानकर उनकी पूजा की जाती है। इसमें देवी की आराधना के बाद कलश स्थापना की तरह विशेष स्थान पर जवारे बोकर माताजी को आमंत्रित किया जाता है और अंत में विसर्जन किया जाता है।

चैती (चैत्र) नौरता में बाड़ी पूजन: लोकजीवन, नारी और प्रकृति का समन्वित उत्सव
चैत्र मास के आगमन के साथ ही भारतीय लोकजीवन में एक विशेष चेतना का संचार होता है। यह समय केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि प्रकृति के पुनर्जागरण का भी होता है। इसी पुनर्जागरण के साथ जुड़ा है 'चैती नौरता' (नवरात्र) और उसमें विशेष रूप से किया जाने वाला 'बाड़ी पूजन', जो भारतीय लोक संस्कृति में प्रकृति, नारी और समृद्धि के गहरे संबंध का प्रतीक है।

बाड़ी का अर्थ और उसका सांस्कृतिक महत्त्व
'बाड़ी' शब्द का सामान्य अर्थ है—वाटिका, बगिया या वह स्थान जहाँ जीवन अंकुरित होता है। किंतु लोक परंपरा में इसका अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। बाड़ी केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि वह संपूर्ण जीवन-चक्र है जिसमें अन्न, जल, वायु, परिवार और समाज सब समाहित होते हैं। नारी जीवन में 'बाड़ी' को कुल और परिवार के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार बाड़ी में बीज बोकर उसे सींचा जाता है, उसी प्रकार नारी अपने स्नेह, श्रम और त्याग से परिवार को पोषित करती है। वह जननी बनकर सृजन करती है और अन्नपूर्णा बनकर पोषण देती है। इस दृष्टि से बाड़ी पूजन नारी के सृजनात्मक और पोषणात्मक स्वरूप का सम्मान भी है।

बाड़ी पूजन की परंपरा
चैत्र नवरात्र के दौरान विशेषकर तृतीया से षष्ठी तक 'बाड़ी की बात' कही जाती है। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक जीवंत लोककथा है जिसे स्त्रियाँ सामूहिक रूप से गाती और सुनती हैं। इस 'बात' में विभिन्न देवी-देवताओं की बाड़ी का स्मरण किया जाता है; जैसे—दशामाता, शीतला माता, पथवारी माता, अन्नपूर्णा, सूर्य, चंद्र, शनि, महादेव, नागदेवता, हनुमान, लक्ष्मी, संतोषी माता आदि। यह स्मरण केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्त्व के प्रति कृतज्ञता का भाव है। प्रत्येक देवता की 'बाड़ी' का पूजन करते हुए यह कामना की जाती है कि जीवन के हर क्षेत्र—अन्न, धन, स्वास्थ्य, संतति और संबंधों में संतुलन एवं समृद्धि बनी रहे।

लोकवाणी में समृद्धि की कामना
बाड़ी पूजन के दौरान जो 'बात' कही जाती है, उसमें लोकजीवन की सहज और सरल कामनाएँ झलकती हैं। इसमें अन्न, धन, सुख-समृद्धि, संतति और पारिवारिक एकता की प्रार्थना की जाती है। लोकवाणी में यह कामना कुछ इस प्रकार व्यक्त होती है कि घर में अन्न की कमी न हो, धन-धान्य बढ़े, परिवार विस्तृत हो और संबंधों में प्रेम बना रहे। सास-बहू, ननद-भाभी, देवरानी-जेठानी, माँ-बेटी—सभी रिश्तों के सुदृढ़ और सौहार्दपूर्ण बने रहने की प्रार्थना की जाती है। यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि लोकजीवन में समृद्धि का अर्थ केवल भौतिक संपन्नता नहीं, बल्कि संबंधों की मधुरता और परिवार की एकता भी है।

नारी और बाड़ी का संबंध
बाड़ी पूजन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है—इसमें नारी की केंद्रीय भूमिका। इस पूरे अनुष्ठान में स्त्रियाँ ही प्रमुख होती हैं। वे ही 'बात' कहती हैं, पूजन करती हैं और परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। लोक मान्यता है कि खेती और वनस्पति के ज्ञान की प्रारंभिक खोज महिलाओं ने ही की थी। यायावरी जीवन से स्थायी कृषि जीवन की ओर बढ़ने में स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इसलिए बाड़ी (जो कृषि और प्रकृति का प्रतीक है) का पूजन भी नारी के माध्यम से ही संपन्न होता है। यह परंपरा नारी को केवल परिवार की संरक्षक नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-चक्र की आधारशिला के रूप में स्थापित करती है।

पर्यावरणीय चेतना का संदेश
बाड़ी पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गहरे पर्यावरणीय संदेश से भी जुड़ा है। लोककथाओं में वर्णित है कि देवियों ने पाताल से पेड़ लाकर पृथ्वी पर रोपे और उनके संरक्षण का संकल्प लिया। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि वृक्ष ही जीवन का आधार हैं। इस परंपरा में यह स्पष्ट संदेश निहित है— "पेड़ बचेंगे तो पृथ्वी बचेगी, और पृथ्वी बचेगी तो जीवन बचेगा।" आज के समय में जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, बाड़ी पूजन जैसी लोक परंपराएँ हमें प्रकृति के साथ संतुलित संबंध बनाने की प्रेरणा देती हैं।

सामाजिक समरसता और लोकधर्म
बाड़ी पूजन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू है—सामाजिक समरसता। 'बात' के अंत में जो प्रसाद या लड्डू बनाए जाते हैं, उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों में बाँटा जाता है; जैसे—बच्चों, ग्वालों, बहनों, जल भरने वाली स्त्रियों और वृद्ध महिलाओं आदि में। यह वितरण केवल दान नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग के प्रति सम्मान और सहभागिता का प्रतीक है। इससे यह संदेश मिलता है कि समृद्धि तभी सार्थक है जब वह साझा हो।

बाड़ी पूजन में बार-बार यह भाव आता है कि जीवन में कर्म और धर्म दोनों का संतुलन आवश्यक है— “खाजे करम रो, बाटजे धर्म रो” अर्थात् कर्म करो, लेकिन धर्म के मार्ग पर चलते हुए। यह लोक दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन की सफलता केवल अर्जन में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और संतुलन में है। चैती नौरता का बाड़ी पूजन भारतीय लोक संस्कृति का एक अद्भुत उदाहरण है, जिसमें प्रकृति, नारी, परिवार और समाज सभी का समन्वय देखने को मिलता है। यह परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है। आज जब आधुनिक जीवनशैली हमें प्रकृति से दूर कर रही है, तब बाड़ी पूजन जैसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि जीवन का वास्तविक सुख सामंजस्य और सह-अस्तित्व में है।

१ अप्रैल २०२६

 
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