चित्रलेख

    

नीलाभ हो उठा गगन
अंतरिक्ष पर
ठहर गया रंगों का कारवा
बादलों के समंदर में
तिरने लगी दिवस की नाव
लहरों को मिलने लगे अनमोल आकार
अनजानी आकृतियों में
ढलने लगा आकाश
धरती की पलकें मुंदी थीं अभी भी
पर आकाश में बिखर रहा था
रंगों का सैलाब
सजने लगी थी
प्रकाश की तोरण

 

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