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कहानियाँ  

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.के. से तेजेंद्र शर्मा की कहानी- जीना यहाँ किसके लिए


'जीतू बेटा! अब और नहीं सहा जाता। मुझे मार डाल बेटा! मुझे ' यह फुसफुसाहट तो बाऊ जी की ही लग रही है। मेरे बढ़ते कदम रुक गए हैं। सोचता हूँ कि बाऊ जी की ओर मुड़ कर देख लूँ। साहस नहीं जुटा पाता हूँ। क्या सचमुच यह बाऊ जी ने ही कहा है या यह मेरा वहम ही है? आजकल बाऊ जी फुसफुसाहट में ही बात कर पाते हैं। उनकी कही बात को समझने का प्रयास ही हम सबका काम है माँ, भैया जी, हम दोनों की पत्नियाँ और जब दीदी यहाँ हो तब। मन में कहीं यह डर भी तो है कि यदि बाऊ जी ने सचमुच ही यह सब कहा हो तब?

पिछले कुछ समय से बाऊ जी ने एक चुप्पी सी ओढ़ रखी है। एक शब्द भी तो नहीं बोलते। यदि उनसे कुछ पूछते हैं तो भी अस्फुट से स्वरों में हाँ या नहीं जैसा उत्तर ही मिलता है। हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कि बाऊ जी की आँखों में आँखें डाल कर देख पाऊँ। न जाने उन आँखों में क्या भाव हो। जब बाऊ जी ने यह बात कही होगी, उस समय उनकी अपनी मन:स्थिति क्या रही होगी? वे क्या सोच रहे होंगे? फिर इस काम के लिए उन्होंने मुझे ही क्यों चुना? मैं तो पेशे से भी सिविल इंजीनीयर हूँ कृष्णकांत भैया चाहे दाँतों के ही सही, कम से कम डाक्टर तो हैं। आजकल तो जया दीदी भी आई हुई है और फिर माँ तो सारा समय ही उनके पास ही रहती हैं। क्या बाऊ जी यह बात बाकी सबसे पहले कर चुके हैं? मैं बात को सुन कर भी अनसुना कर जाता हूँ। "जी बाऊ जी, आपके लिए चाय ले कर आता हूँ।"

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