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सीधा रसोईघर की ओर बढ़ जाता
हूँ, बाऊ जी के लिए मसाले वाली चाय बनाता हूँ। जबसे बाऊ जी की
मित्रता पटेल अंकल से हुई है, तभी से चाय में मसाले का प्रयोग
करने लगे हैं। दफ़्तर में चाहे कैसी भी चाय पी लेने वाले बाऊ जी,
घर में हमेशा मसाले वाली चाय ही पीते हैं। ईलिंग रोड से जब
भारतीय दालें, चावल और आटा आदि मंगाये जाते हैं तो चाय मसाले का
पैकेट लाना कभी नहीं भूलती माँ। कल रात से लन्दन और उसके आसपास
के क्षेत्रों में भारी हिमपात हो रहा है। बाऊ जी के बारे में
सोचते-सोचते कड़ाके की बर्फ़ीली ठण्ड में भी मेरे माथे पर पसीने
के बूँदे दिखाई दे रही हैं।
किचन टॉवल से ही माथा पोंछ लेता
हूँ। बाऊ जी को हमेशा से ही बाऊण्टी के किचन टॉवल पसन्द आते हैं।
थोड़े महंगे अवश्य होते हैं किन्तु उनका काग़ज़ मजबूत और मुलायम
होता है, उस पर नीले फूलों की बेल बनी रहती है। घर में वर्षों से
यही किचन टॉवल ख़रीदे जाते हैं।
चाय लेकर बाऊ जी के निकट पहुँच
जाता हूँ। बाऊ जी की ओर देखता हूँ। उनकी आँखों मे याचना स्पष्ट
दिखाई दे रही है। जैसे मुझ से प्रार्थना कर रहे हो, क्यों नहीं
मुक्ति दिला देते मुझे इस नरक से मैं अचानक एक गहरी सोच में डूब
जाता हूँ। बाऊ जी ने तो कभी जान बूझ कर किसी का दिल तक नहीं
दुखाया, सदा ही सबसे हँस कर बातचीत करते, जीवन्त व्यक्तित्व के
स्वामी, किसी को कभी दु:ख देने के बारे में कभी सोचा ही नहीं
होगा। तो फिर बाऊ जी इस नरक में जीने को क्यों अमिशप्त है?
बाऊ जी की आँखों में बसे
प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं हैं। पाँच फूट दस इंच कद के
बाऊ जी आज बस एक व्हील चेयर पर विराजमान कृषकाया ही बन कर रह गए
हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाऊण्टेण्ट, बाऊ जी को लन्दन के आर्थिक
जगत में एक विशेष दर्जा हासिल था। इस क्षेत्र में वे अकेले
भारतीय, या कहा जाये कि एशियन रहे होंगे तो अतिशयोक्ति नहीं
होगी। इंग्लैण्ड में भारतीय मूल के लोगों को हाथ के काम वाले
क्षेत्र में तो आसानी से काम मिल जाया करता है,परन्तु जहाँ कहीं
प्रबंधक या इस से ऊपर की बात होती है तो गोरी चमड़ी एक अनिवार्य
योग्यता बन जाती है। आपसे कहीं कम पढ़े लिखे गोरे लोग वाया
भटिण्डा आपसे आगे कूदते फाँदते निकल जाते हैं। उस दिन विजय भाई
भी अपने रेडियो स्टेशन का रोना रो रहे थे जहाँ उनका गोरा
स्टूडियो मैनेजर सैम उनका ही बॉस बना बैठा है।
किन्तु बाऊ जी का तो जलवा ही
दूसरा था। मैंने तो बाऊ जी को कभी भी थ्री-पीस सूट के बिना
दफ़्तर जाते नहीं देखा। भला कौन सा ऐसा सुरुचिपूर्ण रंग होगा जिस
रंग का सूट बाऊ जी के पास न हो। उन्हें मार्क्स एण्ड स्पेन्सर के
सेंट माईकेल के सूट ही अच्छे लगते हैं। उसी कंपनी की टाई कमीज़ें
और स्वेटर भी। उस से सस्ते कपड़े उन्हें पसन्द नहीं आते और उससे
महंगे कपड़े उन्हें फिजूलखर्ची लगती है। वैसे बाऊ जी को काले रंग
का सूट हमेशा ही अधिक पसन्द आता है। कभी कभी तो बन्द गले की काली
कमीज़ पहन लेते हैं तो टाई लगाने के झंझट से बच जाते हैं। घर में
बाऊ जी सदा ही सफेद कुर्ता पजामा पहनते हैं। लखनऊ से विशेष रूप
से मंगवाया करते हैं।
थियेटर में उन्हें विशेष रुचि
रही है। साऊथ बैंक का इलाका उनका प्रिय इलाका है। सत्येंद्र जी
ओर बाऊ जी घण्टों नाटकों पर बातें कर सकते हैं। कई बार दोनों शाम
को टेम्स के किनारे साहित्य, राजनीति और नाटकों के विषय में
बतियाते रहते हैं। सत्येंद्र अंकल हिन्दी साहित्य के प्रेमी हैं
तो बाऊ जी अंग्रेजी और उर्दू के। किन्तु दोनों ही अंग्रेज़ी नाटक
साथ-साथ देखा करते थे। जब से बाऊ जी ने व्हील चेयर का साथ अपना
लिया है सत्येंद्र अंकल अकेले पड़ गए हैं। अब उन्हें नाटक अच्छे
नहीं लगते। पूरा जीवन ही एक नाटक लगने लगा है।
सत्येंद्र अंकल माँ को भी
छेड़ते रहते थे। 'भाभी जी इसे जरा काबू में रखा करें। गोरी मेमें
भी इस पर मरती हैं। यह जब काले रंग का ओवरकोट, सिर पर फेल्ट हैट
और मुँह में पाईप लगा कर चलता है तो के एन सिंह तक को कम्पलेक्स
दे देता है।' बाऊ जी का तो व्यक्तित्व ही ऐसा है कि किसी को भी
मिले तो अपने व्यक्तित्व की एक अमिट सी छाप छोड़ सकते हैं। हैं?
या थे? बाऊ जी के जीवित रहते उनके बारे में थे कह पाना कितना
कठिन कार्य है?
बाऊ जी कई बार पुराने किस्से
सुनाया करते थे। 'बेटा जी, बंगे से चले थे तो पाँच पाउण्ड ले कर
आए थे। तुम्हारी माँ की गोद में तो जया भी थी। यह जो सब घर में
देखते हो न; यह सब तुम्हारी माँ का प्रताप है। इस भागवन्ती ने जो
जिन्दगी की लड़ाई में साथ दिया है उसकी तो मिसाल भी नहीं मिल
सकती। यह जो आज की पीढ़ी है न, जो बिना शादी ब्याह के लिव-इन
अरेन्जमेण्ट की बात करती है, वो इस त्याग, इस मेहनत को समझ नहीं
सकती। यह अन्नपूर्णा मेरे साथ न होती तो मैं कब का थक कर हार
चुका होता।' माँ बस शरमा कर मुँह फेर लेती। उसे बच्चों के सामने
अपनी तारीफ़ सुनना अजीब-सा लगता।
कितना अजीब-सा लग रहा है बाऊ जी
को व्हील चेयर पर बैठा देख कर। कैसे एक भरा पूरा स्वस्थ शरीर
प्रकृति के एक ही झटके से धम से गिरता है और कुर्सी से चिपक कर
रह जाता है। कभी-कभी अच्छे मूड में होते तो मुकेश के दर्द भरे
गीत गुनगुनाया करते। राज कपूर की पूरी टीम ही उन्हें प्रिय थी -
शैलेंद्र, शंकर जयकिशन, मुकेश और राजकपूर - सजनवा बैरी हो गए
हमार! अब तो जीवन ही बैरी हो गया है!
चाय देख कर भी बाऊ जी ने कोई
प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की है। बस एक ओर ही देखे जा रहे हैं।
चाय देख कर राज कपूर की फिल्म तीसरी कसम का डायलॉग सुनाया करते
थे, 'चाह की तासीर गर्म होती है जी!' आज एकदम चुप हैं। ऐसा क्यों
हो जाता है? कैसे हो जाता है?
बाऊ जी सेवानिवृत्त होने वाले
थे। वे चाहते तो उनकी कम्पनी उन्हें एक्स्टेंशन दे सकती थी।
परन्तु बाऊ जी माँ के साथ भारत दर्शन के लिए जाने का निर्णय लिए
बैठे थे। पाकिस्तान जाने का भी तो कार्यक्रम था। झंग के उस
क्षेत्र में भी जाना चाहते थे जहाँ उनकी पुश्तैनी तिकोनी हवेली
थी। बाऊ जी के दादा जी के दो भाई और थे। यानी कि कुल तीन भाई,
इसीलिए तिकोनी हवेली। गीली आँखों से बाऊ जी याद किया करते हैं कि
कहाँ उनके दादा जी घोड़ा बाँधा करते थे, कैसे कन्धे पर बन्दूक
लगी रहती थी, कुल्ले वाली पगड़ी और बड़ी-बड़ी मूँछें, स्वयं बाऊ
जी के चौड़े कन्धे और ऊँचा कद, दादा जी की ही तो देन थी। बाऊ जी
सेवानिवृत्ति के बाद माँ के साथ दक्षिण भारत की सैर भी करना
चाहते थे। कन्या कुमारी में विवेकानंद स्मारक पर खड़े हो कर भारत
की विशालता को नाप लेना चाहते थे।
उनका इरादा वैष्णोदेवी के दर्शन
का भी था तो साथ ही साथ चारों धामों की यात्रा का भी कार्यक्रम
था। जीवन में एक ही वस्तु की तो कमी रह गई थी। अपनी मातृभूमि को
जी भर कर देख लेना। मातृभूमि भी तो बँट गई थी। जब विभाजन हुआ था,
तो परिवार 'बंगा' नामक स्थान पर रहने आ गया था। शरणार्थी, अपने
ही देश में शरणार्थी। पीड़ा विस्थापन की पीड़ा। अपनी मर्ज़ी से
विदेश में बसने जाना एक अलग बात है परन्तु तलवार के जोर पर अपने
ही देश में विस्थापित हो जाना? कभी-कभी कलम उठा लेते थे तो अपने
वतन की याद में कुछ पंक्तियाँ स्वयंमेव ही उतर जाती थीं, 'करदा
है मन मत्थे लांवां, मुड़ वतन दी खाक नूं, कर के सजदे सिर
झुकावां, उस जमीने पाक नूं'
मैं तो पूछ ही लेता था, "बाऊ जी आप पाकिस्तान की ज़मीन को इतना
क्यों याद करते हैं?''
"ओये लल्लू यह ज़मीने पाक का मतलब पाकिस्तान की जमीन नहीं है।
इसका मतलब है पाक यानि कि पवित्र ज़मीन। आई बात समझ में।"
सेवानिवृत्ति के बारे में सोच
कर ही बाऊ जी की आँखों में एक विशेष सी चमक आ गई थी। एक भरा पूरा
जीवन सम्मानपूर्वक जी लेने का सुकून, बस दो महिने बाद बाऊ जी और
माँ भारत भ्रमण पर निकलने वाले थे। बाऊ जी पहले पाकिस्तान जाना
चाहते थे, तो माँ भारत। माँ का कहना था कि सारे रिश्तेदार तो
भारत में ही हैं, इसलिए पहले वहाँ चलते हैं। जबकि बाऊ जी का
विचार था कि पहले झंग का चक्कर लगाया जाए ताकि सारे रिश्तेदारों
को अपनी मातृभूमि का आँखों देखा समाचार सुनाया जा सके। माँ का
बचपन तो बंगे में ही बीता था। भला उसे झंग में क्या दिलचस्पी हो
सकती थी। परन्तु माँ तो माँ ही है न। बाऊ जी की प्रत्येक इच्छा
माँ के लिए हुक्म के समान हो जाती है। इसीलिए माँ भी पहले झंग
चलने को तैयार हो गई थी। वे भी देखना चाहती थीं कि हीर स्याल के
इलाके में ऐसा क्या है जो बाऊ जी को वहाँ जाने के लिए इतना आतुर
बना रहा हैं। कहीं भी अपनी इच्छानुसार जा पाना इतना आसान होता है
क्या? बाऊ जी तैयारियों में लग गए थे। अधिकतर रिश्तेदारों को एक
लम्बे अर्से के पश्चात मिलने वाले थे। झंग के अपने पड़ोसियों के
तो चेहरे भी खासे धुंधले पड़ चुके थे। इकबाल नाई, उनके कालेज के
साथी मंजूर, परवेज और मुन्ना 'क्या वे सब वहाँ झंग में होंगे?
दुनिया कितनी बदल चुकी है। यदि वे स्वयं पाँच नदियों का जल
छोड़कर टेम्स के किनारे आ बसे हैं, तो क्या उनके मित्र अभी भी
वहीं के वहीं खड़े होंगे? पाकिस्तान से भी तो कितने नौजवान खाड़ी
के देशों में किस्मत आजमाने निकल चुके हैं।
बढ़िया भोजन बाऊ जी की कमज़ोरी
है। अच्छे खाने के लिए बाऊ जी वेम्बले से इलफर्ड तक कार चला कर
जाने से भी नहीं हिचकिचाते थे। भारतीय, कॉन्टिनेंटल, चायनीज और
इटेलियन खाने उन्हें एक समान प्रिय थे। किन्तु जब जब आवश्यकता
होती तो वे ऑमलेट और डबल रोटी खा कर भी गुज़ारा कर लेते थे। तीन
महीने बाद ही बाऊ जी पैंसठ के होने वाले थे। और मैं सोच-सोच कर
हैरान होता कि यह कभी न बूढ़ा होने वाला इन्सान, सेवा निवृत्त
जीवन किस प्रकार बिताएगा।
किन्तु बाऊ जी के पास पुस्तकों
का एक विशाल भण्डार-सा था। बाऊ जी का सपना था कि उनके पास एक
निजी पुस्तकालय हो। उनकी इस लायब्रेरी में न जाने कितने प्रकार
की पुस्तकें थीं। अनगिनत पुस्तकें, बेशुमार विषय। इनमें कानून की
पुस्तकें थी तो उपन्यास भी थे, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की
जीवनियाँ थीं तो शेक्सपीयर के नाटक भी थे। उर्दू, पंजाबी, और
हिन्दी की पुस्तकें भी दिखाई दे जाती थीं।
माँ तो पंजाबी और हिन्दी के
उपन्यास ही पढ़ती है। अंग्रेज़ी और उर्दू का असला बाऊ जी के लिए
है। बाऊ जी की प्रिय पुस्तकों में एमिली ब्रॉंटी का उपन्यास 'वदरिंग
हाइट्स' और चार्ल्स डिकन्स का उपन्यास 'डॉम्बे एंड सन' है। बाऊ
जी उपहार में पुस्तकें ही लेना देना पसन्द करते थे। उनके अनुसार
पुस्तक से बेहतर साथी मिलना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। भारत
के राजनीतिक जगत पर एक उपन्यास की भी योजना बना रखी थी। उन्होंने
उपन्यास का नाम भी सोच रखा था, 'जीना यहाँ -किसके लिए!'
आज उनके उपन्यास का शीर्षक उनके
अपने जीवन का शीर्षक बन गया है। जिस दिन बाऊ जी को पक्षाघात हुआ
उस दिन मैं घर पर ही था। पढ़ते-पढ़ते मुझे गहरी नींद आ गई थी।
अधखुली पुस्तक मेरे सीने पर ही रखी थी। बाहर लन्दन की तेज़ ठण्डी
हवाएँ चल रही थीं। कुछ गिरने की सी आवाज़ से मैं चौंक कर उठा।
गुसलखाने में से आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कोई सहायता के लिए
फ़र्श पर प्रहार करके हमें बुलाने का प्रयास कर रहा हो।
मैं भाग कर गुसलखाने तक पहुँचा
तो वहाँ माँ पहले से ही बाऊ जी को उठाने का प्रयास कर रही थी।
माँ रोये जा रही थी, उसका पूरा शरीर काँप रहा था। मुझे देखते ही
उसकी रुलाई जोरों से फूट पड़ी, 'जीतू पुत्तर, वेख एह की हो गया।
हाय रब्बा ऐहना दी आई मैनूं आ जाए।'
मैंने माँ को बाऊ जी से अलग
किया। बाऊ जी के असहाय शरीर को कन्धे पर उठाया और बिस्तर पर वापस
ले आया। वे खड़े नहीं हो पा रहे थे। माँ स्थिति को और बिगाड़ रही
थी क्योंकि स्वयं भी बेहोश हुए जा रही थी। मैंने एम्बुलैंस के
लिए फ़ोन किया। माँ को संभाला और उन्हें अपने साथ मिला कर बाऊ जी
के पैरों के तलवों की मालिश करने लगे। सर्द तलवों में गरमाहट
पैदा करने की एक बेकार-सी कोशिश।
बाऊ जी ने मुझे सदा से ही अपना
मित्र समझा है। बाऊ जी जब कंबल में सिर लपेटे पड़े थे, तो मैं
उन्हें हौसला देने के लिए मज़ाक में कह रहा था कि वे बंगे वाली
पागल नर्स जैसे दिखाई दे रहे हैं। बाऊ जी जब कभी भी बंगे के बारे
में बात करते हैं तो उस पागल नर्स का ज़िक्र अवश्य हो जाता है जो
के कमेटी के दफ़्तर के बाहर गुदड़ी में लिपटी रहती। उसे एक मरीज़
से प्रेम हो गया था, जिसकी हस्पताल में ही मृत्यु हो गई। तब से
वह नर्स पागलों का सा व्यवहार करने लगी। सड़क पर गिरे सिगरेट के
टुकड़ों का आनंद उठाती और जून की चिलचिलाती धूप में भी कंबल ओढ़े
रहती। पागल नर्स का ज़िक्र भी बाऊ जी होठों पर मुस्कुराहट नहीं
ला पाया। उनकी हालत देख कर मेरे पेट में मरोड़ सा उठने लगा। यह
विचार भी दिमाग को मथे जा रहा था कि कहीं बाऊ जी का अन्तिम समय
तो नहीं आ पहुँचा।
बाऊ जी के मुँह से अजीब अजीब
आवाज़ें निकल रही थीं। कुछ गुर्राहट, फुसफुसाहट और फुंकार का सा
मिश्रण। कुछ बेमेल बेमतलब से शब्द। उनकी आँखों में बेचारगी,
मजबूरी और दयनीयता के भाव साफ़ दिखाई दे रहे थे। न जाने क्यों
मैंने एक बार फिर उन्हें कंबल ठीक ओढ़ाया।
बाऊ जी उस रात मरे नहीं, किन्तु
उन्होंने जीना बंद कर दिया था। अब वे केवल सांस लेता हुआ, व्हील
चेयर से चिपका आधा अधूरा-सा शरीर मात्र रह गए थे। उनके भीतर कुछ
मर गया था। जैसे उनके भीतर की अग्नि बुझ चुकी थी। यह उनका सबसे
तीव्र संघर्ष था, किन्तु उनके संघर्ष करने की शक्ति जैसे चुक-सी
गई थी।
हस्पताल के डॉक्टर भी बाऊ जी की
तबीयत में सुधार लाने में असफल रहे थे। बाऊ जी को अधरंग हो चुका
था। अब वे स्वयं अपना कोई भी काम करने में सक्षम नहीं थे। उन्हें
उठने, बैठने, नहाने, खाने सभी कामों में किसी न किसी की सहायता
की आवश्यकता पड़ती थी। त्रासदी तो यह थी कि पक्षाघात के इस हमले
से उनकी नज़र पर भी असर हुआ था और वे नजरें टिका कर कुछ भी पढ़
पाने में असमर्थ हो चुके थे। और सबसे गहरा असर उनके व्यक्तित्व
पर हुआ था। उनके दिमाग से बीमारी से लड़ने की शक्ति छिन चुकी थी।
मैं और भैया बाऊ जी की हर ज़रूरत का ध्यान रखने का प्रयास करते।
किन्तु माँ, माँ को तो और कुछ सूझता ही नहीं था। कौन विश्वास
करेगा कि इस औरत ने एक पूरा जीवन इंग्लैण्ड में बिता डाला है।
पश्चिमी सभ्यता की हवा उसके संस्कारों को ज़रा भी तो नहीं भेद
पाई। बाऊ जी की हर फुसफुसाहट भरी बात माँ को समझ में आ जाती।
उनकी नज़रों के भावों को माँ आसानी से पढ़ लेती।
बाऊ जी की बुझी हुई निगहें मुझ
पर टिकने का प्रयास कर रहीं हैं। लैंगलैण्ड कम्पनी का फ़ाइनेंस
निर्देशक अपने ही पुत्र से कुछ माँगने की कोशिश कर रहा है। वहीं
फुसफुसाहट मेरे पूरे जिस्म पर एक बार फिर रैंग गई, 'मुझे मालूम
है बेटा, अब मैं बचने वाला नहीं। प्लीज किल मी माई सन। मुझ पर
दया...।' कुछ शब्द उनके गले में अटक कर रह गए हैं।
'अरे बाऊ जी, आप भी कैसीं बातें करने लगे? आप बिल्कुल ठीक हो
जाएँगे। मेरे हाथ की चाय पीजिए। अभी तो अपने ममी को चारों धामों
के दर्शन करवाने हैं।' मेरी आवाज़ मेरे लिए ही अजनबी हुई जा रही
है। आवाज़ का खोखलापन मुझे ही समझ नहीं आ रहा। बाऊ जी की आँखें
दूर कहीं शून्य की ओर ताके जा रही हैं। मेरी बनाई हुई चाय मेज़
पर पड़ी ठण्डी होती जा रही हैं।
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