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कहानियाँ

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से संतोष गोयल की कहानी—"जिंदगी एक फोटोफ्रेम"।


रात का खाना खाने के बाद अक्सर शैलेश मुझे बालकनी में बुला लेते और ऊपर आसमान को दिखा कर कहते, "देखो डीयर। आसमान कितना साफ है, तारे चमक रहे हें मानो उन्हें धो पोंछ कर साफ कर दिया गया हो। वो सामने देखो चाँद, पूरा नहीं हैं पर दमक कितनी।"

चाँद दिखाते हुए वे आधा बाल्कनी के नीचे लटक जाते। मुझे लगता कहीं बैलेन्स ना बिगड़ जाये। मैं उन्हें थामने की कोशिश करती ही रह जाती। वे वापिस मेरी ओर मुड़ते और मुझे अपनी बाहों में थाम लेते। उनका अन्दाजे.–बयां बच्चों की सी उत्सुकता और उत्साह से भरा होता। हर दिन वही देख सुन कर भी मैं उस स्पर्श से बच न पाती। चाहती तो भी पर, फिर मैं चाहती ही कब थी।

असल में, हम लोग तमाम ज़िन्दगी शहर के फ्लैटनुमा घरों में बिता कर आये थे। वो तो रिटायर होने के बाद ही यह निश्चय किया था कि गाँव की हवेली में चले जायें। अपना अन्तिम समय तो खुले आसमान तले, ताज़ा हवा में साँस लेते हुए बिता दें। गाँव की पुरानी गिरती व झरती दीवारों वाली हवेली में बहुत कुछ ऐसा था जो टूट कर खण्डहर बन गया था, पर बहुत कुछ ऐसा भी था जिसे सुधार कर रहने लायक बनाया जा सकता था अतः बना लिया गया था।  वहाँ रहने में एक अजब सी संतुष्टि मिलती थी जिसे शब्दों में बाँध कर बताया नहीं जा सकता।

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