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कहानियाँ

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से
तरुण भटनागर की कहानी— धूल की एक परत


उस रोज मैं अकेला था। सरकारी रेस्ट हाउस में शाम के बाद मैं अक्सर अकेला होता था। नई जगह थी, सरकारी मकान खाली नहीं था और मैंने रेस्ट हाउस के एक कमरे को घर जैसा बना लिया था। रेस्ट हाउस के उस कमरे के सामने लंबा बरामदा था, जिसकी छत ऊंचे खंभों पर टिकी थी। बरामदे के सामने से डामर की रोड रेस्ट हाउस के गेट तक बल खाती हुई गई थी और रोड के साथ रेस्ट हाउस की बाउंड्री तक बेतरतीब घास से अटा हुआ एक छोटा लॉन था। लॉन में घास की थप्पियों के बीच लिली के कुछ पौधे खोए हुए थे, जिनके पीले कपनुमा फूल बरसाती हवा में कँपकँपाते रहते थे और तेज बारिश में अपनी पंखुड़ियाँ घास के उस जंगल में गुमा देते थे। फिर पता भी नहीं चलता था कि वे वहां थे। मैं अक्सर शाम अंधेरा होने तक उस खुले फ़रफ़राते बरामदे में बैठा रहता था।

ऐसी ही एक बरसाती सलेटी शाम को वह आया था। बाद में मुझे पता चला उसका नाम हरि था। छिछडांद और कीचड़ वाली बरसात में उसने सफेद कपड़े पहर रखे थे, सफेद पैंट और उस पर बाहर निकली सफेद शर्ट, पैरों में काले गमबूट और सिर पर गुलाबी साफ़ा जिस पर माथे के ठीक ऊपर एक चमकता हुआ बिल्ला लगा हुआ था। उसकी साँवली देह पर वह ड्रेस विचित्र सी लग रही थी, मौसम के प्रतिकूल उसकी भासित क्षमताओं के परे, एक बेमेल जोड़ जो कभी–कभी पहरा जाता हो, कुछ नाटकीय सा और कुछ ऐसा जैसा उसे जबरदस्ती पहराया गया हो।

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