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तीनों बेटों के घेरने पर उन्होंने कहा कि उन्हें साहब की जमा पूँजी, फार्म हाउस और बैंक बैलेंस नहीं चाहिए, सिर्फ़ यह घर उनसे न छीना जाए। उन्हें लगा, उनके जीने के लिए यह खिड़की और खिड़की से बाहर दिखता आसमान और रेगिस्तान बहुत ज़रूरी है।
घर उन्हें मिला पर बच्चे छिन गए। तीनों बेटे अब विदेश में थे और ज़मीन-जायदाद की देख-रेख करने साल छमाही आ जाते थे पर आकर छोटी माँ के दरवाज़े पर दस्तक देना अब उनके लिए ज़रूरी नहीं रह गया था।
उन्हें पता ही नहीं चला, कब वह धीरे-धीरे खिड़की के चौकोर फ्रेम में जड़े लैंडस्केप का हिस्सा बन गईं।

"आँटी, हम लोग आज चले जाएँगे-वापस दुबाई।" वैसे ही 'आ' को खींचते हुए बड़ी लड़की ने कहा। "हमारे ग्रैंड पा मतलब नाना हमें लेने आए हैं। चलिए हमारे साथ, उनसे मिलिए।" बच्चों ने दोनों ओर से उनकी उँगलियाँ थामीं और उनके मना करने के बावजूद उन्हें गेस्ट हाउस की ओर ले चले। इन चार दिनों में बच्चे उनके ईद-गिर्द बने रहे थे।
सोफे पर एक अधेड़ सज्जन बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उन्हें देखते ही हड़बड़ाकर उठे और अभिवादन में हाथ जोड़कर बोल पड़े, "बच्चे आपकी बहुत तारीफ़ करते है - आँटी बहुत अच्छी है आँटी इतनी अच्छी पेंटिंग बनाती हैं, आँटी की खिड़की से इतना अच्छा 'व्यू' दिखता है बोलते-बोलते वह स्र्के, चश्मा नाक पर दबाया और आँखें दो-तीन बार झपकाकर बोले, "अगर मैं ग़लत नहीं तो आर.यू. छवि?"

छवि-छवि-छवि जैसे किसी दुर्घटना में इंद्रियाँ संज्ञाहीन हो जाएँ, वे जहाँ थीं, वहाँ खड़ी जैसे सचमुच बुत बन गईं।
"हाँ, पर आप?" बोलते हुए उन्हें अपनी आवाज़ किसी कुएँ के भीतर से उभरती लगी। "नहीं पहचाना न? मैं. . .महेश, महेश गुप्ता। कॉलेज में तुम्हारा मजनू नं वन!" कहकर वे ठहाका मारकर हँस पड़े, "ये दोनों मेरे तुम भी अब नानी दादी बन गई होगी- पोते-पोतियों वाली अपने साहब से मिलवाओ।" उन्होंने आँखें झुकाईं और सिर हिला दिया, "वे नहीं रहे।"
"सॉरी, मुझे पता नहीं था!" उन सज्जन ने दोनों हाथों की मुठि्ठयाँ ऐसे बाँध लीं जैसे हथकड़ियाँ पहना दी हों।
"चलती हूँ।" वे रुकी नहीं, घर की ओर मुड़ गईं।
पीछे से छोटे बच्चे ने उनका पल्लू थामा, "आँटी. . .आँटी।"
वे मुड़ी। बच्चे ने एक पल उनकी सूनी आँखों में झाँका, फिर पुचकारता हुआ धीरे से बोला, "आँटी यू आर एन एंजेल।"
वे मुस्कुराई, पसीजी हथेलियों से गाल थपथपाया, फिर घुटने मोड़कर नीचे बैठ गई, उसका माथा चूमा, "थैंक्यू!" और घर की ओर कदम बढ़ाए।
काँपते हाथों से उन्होंने चाभी घुमाई। दरवाज़ा खुला। दीवारों पर लगीं पेंटिंग्स के कोनों पर लिखा उनका छोटा-सा नाम वहाँ से निकलकर पूरे कमरे में फैल गया था। कमरे के बीचोंबीच वह नाम जैसे उनकी प्रतीक्षा में बैठा था। वे हुलस कर उससे मिलीं और ढह गईं जैसे बरसों पहले बिछड़े दोस्त से गले मिली हों।

खिड़की के बाहर रेगिस्तान धीरे-धीरे हिलोरें लेने लगा था। और फिर न जाने कैसे खिड़की के बाहर हिलोरें लेता रेगिस्तान उमड़ते समुद्र की तरह बेरोकटोक कमरे में चला आया और सारे बाँध तोड़कर उफनता हुआ उनकी आँखों के रास्ते बह निकला।

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२४ अक्तूबर २००५

 

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