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समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से डॉ हरिसुमन बिष्ट की कहानी- 'हवाघर'

हाथ भर दिन चढ़ने के साथ ही नीलिमायुक्त आकाश का रंग बदलने लगा, हवा में तपिश आने लगी थी। सामने की पहाड़ी पर अनंत आकाश के गर्भ में डुबकी लगाकर एकदम तर-ओ-ताज़ा, झक सफ़ेद रूई के फाये से बादलों के बच्चे खेलने लगे थे। गुनगुनी धूप में उनकी किलकारियाँ, दम भरती उनकी आहें गिनी जा रही थीं। धरती आकाश का लमहा-लमहा प्रकृति के रंग में रंगा हुआ, चारों तरफ़ खुशियाँ बिख़री हुई, किंतु वह प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य से बहुत दूर दिखाई दिया। हौले-हौले चर्च की हुलार उतरता हुआ।
"ओह, यह तो नेपाली है- नेपाली जंग बहादुर।" मन को मज़बूत करते हुए स्वयं से कहा, "वह ज़रूर हवाघर की तरफ़ ही आएगा।"
मेरा अनुमान ठीक नहीं बैठा, जंग बहादुर उतराई की रेलिंग से टेक लगाकर खड़ा हो गया, यकायक गुनगुनाती बहती हवा, चहकती चिड़िया और आकाश में खेलते बादलों के बच्चों ने जैसे उसका भी मन मुग्ध कर लिया था। यही मौसम था जब वह अतीत को भुलाकर, भविष्य की चिंता से बेख़बर यहाँ का जन-जीवन अपना वर्तमान जी रहा था। जंग बहादुर का चेहरा भी अपना रंग बदलने लगा। अब तक मैंने उसके विषय में जितना सोचा था वे सभी बातें कपोल कल्पित और बेमानी लगने लगी थी।
आख़िर मुझसे रहा नहीं गया, दो तीन बार हवा में हाथ लहराकर मैंने उसे इशारा कर अपने पास बुलाना चाहा। वह जस-तस खड़ा रहा, मैं बैंच पर से उठा और आठ-दस कदम चलकर उसके सामने खड़ा हो गया।

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