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अक्सर, ऐसा ही होता है, पापा के सामने पड़ने पर। उनका ठेठ-रोआबदार, संजीदा-संजीदा चेहरा देख कर अमि हमेशा से ही सहमी-सहमी रही है। इसीलिए पापा की उपस्थिति के घनीभूत क्षणों में अमि चाहती रही है कि जितना भी जल्दी हो सके, वह उनकी आँखों से ओझल हो जाए।
पापा रुके हुए थे।
रुके हुए और चुप। अमि को लगा, यह शायद पापा के बोलने के पहले की ख़तरनाक चुप्पी है, जो टूटते ही अपने साथ बहुत हौले-से एकदम ठंडे, लेकिन तीखे लगनेवाले शब्द छोड़ेगी, जो उसे भीतर ही भीतर कई दिनों तक रुलाते रहेंगे। उसे लग रहा था, पापा कुछ कमेंट करेंगे। उसके इतनी देर तक बाथरूम में बन्द रहने पर। मसलन, 'अमि! तुम्हें दिन-ब-दिन यह क्या होता जा रहा है?' मगर, वे कुछ कहे बग़ैर ही आगे बढ़ गए।
अमि आश्वस्त हो गई।

गीले पंजों के बल लम्बे-लम्बे डग भरती हुई, अपने कमरे में चढ़ आई। अमि को हमेशा अपने कमरे में आकर एक विचित्र-सा साहस आ जाता है। कमरे की सपाट और सफ़ेद दीवारें, छत, यहाँ तक कि कमरे की हर चीज़, उसे अपनी और एकदम अपनी, अकेले की लगती है। इन दीवारों व चीज़ों के बीच घिर कर अमि ने हमेशा ख़ुद को बहुत सुरक्षित अनुभव किया है। और अब आतंक के कुछ कँटीले-लमहों के बाद वह अपने कमरे में थी।
उसने खिड़की में से झाँक कर नीचे देखा। पापा अब लॉन की धूप में चेयर पर पसरे हुए थे। हाथों में, लॉन के पीले गुलाब से तोड़ा गया ताज़ा फूल था। और धीरे-धीरे पापा की लम्बी व सख़्त अँगुलियाँ उसकी एक-एक पँखुरी को उधेड़ रही थीं।
अमि डाइनिंग टेबुल पर पापा के साथ खाना खाने बैठते समय प्लेटों में चलती उनकी उन लम्बी व सख़्त अँगुलियों से ऊपर नज़र नहीं ले जा पाती। पापा की अँगुलियाँ देख कर उसे हमेशा दहशत होती है। जैसे, वे पिस्तौल के ट्रिगर पर रखी हुई हैं। थोड़ी-सी भी हरक़त हुई कि धड़ाम... यहाँ तक कि उनकी पेन थाम कर काग़ज़ पर लिखती अँगुलियों से भी उसे डर लगता है कि इधर उन्होंने साइन किया कि उधर किसी पर गोली चालन हो जाएगा। कोई नौकरी से बरख़ास्त हो जाएगा या फिर किसी की कलाई में हथकड़ी पड़ जाएगी।
अमि ने बहुत धीमे से खिड़की बन्द कर दी।

बालों को फिर से निचोड़ कर झटके से फैला लिया। फिर अपने कमर को छूने वाले लम्बे बालों के साथ एक सूखा-सा टॉवेल लपेट कर ढीला-सा जूड़ा बना, अपने कमरे के सामने टैरेस पर धूप में आ कर पसर गई। उसके इन बालों को लेकर पापा ने एक दफा खाना खाते वक़्त कहा था कि वह इन्हें कटवा लें। अभी से अधेड़ औरतों की तरह जूड़ा बाँधना भला नहीं लगता। पापा के कथन का स्वर सलाह नहीं, सिर्फ़ आदेश का ही होता है- वह कैसे कहे कि उसे अपने लम्बे बालों से प्यार है, परन्तु पापा के समक्ष यह तर्क देने की जगह अमि ने वहीं डाइनिंग टेबल पर ही फूट-फूट कर रोना शुरू कर दिया था, तो वे फिर कुछ नहीं बोले थे। चुपचाप उठ गए थे।

अमि को अमूमन लगता है, पापा उसे जिस तरह स्मार्ट व फारवर्ड बनाना चाहते हैं, उल्टी वह उतनी ही अधिक भीरु और सुस्त होती जा रही है। पता नहीं, कितने दिनों से पापा व अमि के बीच तनाव भरा है। उसने कई बार बड़ी शिद्दत से चाहा भी कि वह इस तनाव को फाड़ फेंके। चिंदी-चिंदी कर दे। मगर, दूसरे ही क्षण अमि के इस निश्चय को पापा के संजीदा-संजीदा चेहरे के रेशे-रेशे से झाँकती तनाव की तपन मोम की तरह पिघला देती। फिर यह तनाव टूटेगा तो आखिर कैसे टूटेगा? कब टूटेगा? पता नहीं क्यों पापा शुरू से उसे आपादमस्तक तनाव के आदमक़द प्रतिरूप लगते हैं। कॉशन देती कठोर आवाज़। कलफ लगी वर्दी और कैप के साथ शायद जैसे पापा के ओहदे की अर्हता बनी रही है, उनकी मूंछें। चित्र में उनकी मूँछें देखकर भैया ने एक बार कहा था, 'इन मूँछों को देखकर भ्रम होता है कि शायद विश्वयुद्ध रुका नहीं, अभी भी चल रहा है।'

नीचे से पापा की आवाज़ें आने लगी थीं। शायद वे लॉन से उठ कर रसोई में आ गए थे। और रम्मी को खाना पकाने सम्बन्धी हिदायतें दे रहे थे। फिर देर तक उसने कुछ नहीं सुना। काफी देर से टैरेस पर बैठे रहने से धूप तेज़ लगने लगी थी। अमि उठकर कमरे में आ गई। और धूप ज़रूर टैरेस पर छूट गई थी, लेकिन उसकी धीमी-धीमी आँच अभी भी देह में थी, पीठ पर।

कमरे में आते ही उसने अपने कामों के विषय में सोचना शुरू किया। मगर काफी देर तक सोचते रहने के बाद भी उसे कोई काम याद नहीं आया तो ड्रेसिंग टेबल के सामने जा पसरी। कँघी उठा कर काफी देर तक यों ही उसे अपने घने और लम्बे बालों में घुमाती रही। अक्सर, अमि छुट्टी के दिन ऐसा ही करती है। रोज़मर्रा के अपने छोटे-छोटे कामों को अनावश्यक रूप से लम्बा करके उनमें ख़ुद को न चाहते हुए भी उलझाए रखती है। एक बार छुट्टी के दिन रोज़ की तरह ज़ल्दी निबट गई थी, तो लगने लगा था कि दिन इतना लम्बा हो गया है कि शाम का इंतज़ार करते-करते तो वह पागल हो जाएगी। इस प्रकार का अनुभव करने का एकमात्र कारण पापा के सामने ज़्यादा देर तक पड़ते रहना ही था।

आज छुट्टी है। इसलिए अमि को यह दिन कल से ही बड़ा भयंकर व अनावश्यक रूप से लम्बा लग रहा है। उसने सोचा, आज का पूरा दिन बंदूक के सामने खड़े किसी शिकार की-सी घोर मानसिक यंत्रणा के बीच बीतेगा। लेकिन, उसने निष्कर्ष निकाला कि उसकी स्थिति तो शायद उस शिकार से भी बदतर है, क्योंकि शिकार के लिए तो कुछ क्षणों बाद ही 'ठाँय` होता है। और हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति! एक चैन! सब कुछ प्रलय। मगर, उसे तो हर क्षण मरते रहना पड़ता है। जीते हुए मरते रहना पड़ता है। उसे तब प्रगति पुस्तक भण्डार से ख़रीदी गई एक किताब का संदर्भ याद आया, जिसमें रूसी ज़ार द्वारा मोबेली नाम के एक शख़्स को सुबह गोली मार दी जानी होती है, तो रात भर में उसके सारे बाल सफ़ेद हो गए थे। वह अपने इतने घने और लम्बे बालों के एकाएक सफ़ेद हो जाने की कल्पना करके घबरा-सी उठी थी।...

अपनी स्थिति को इतने दयनीय निष्कर्ष की गोद में डाल कर वह ख़ुद के प्रति उपजी आत्मदया में भर कर काफी भावुक हो उठी। उसे लगा, उसके अंदर कोई एक और अमि है, जो उसकी स्थिति को हमेशा अतिरिक्त आत्मीयता और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के साथ देखती है। ख़ुद की स्थिति का ऐसा विश्लेषण करने पर दोहरे व्यक्तित्व की उपस्थिति का एहसास अमि को भीतर तक असहज बना गया। आखिर, उसमें यह दूसरी अमि कौन है? हाँ, कौन है? अंदर एक कुनमुनाती आवाज़ मन की भीतरी दीवारों से एक अनुगूँज की तरह टकराने लगी...

बहरहाल, ठीक इस वक़्त बँगले के पार्टीशन के उस पार के कमरों में भी टकरा रही थीं, दूसरी आवाज़ें... प्रतिध्वनित होती, आवाज़ें जो पापा की व लोकेश की थीं। उसने कभी उनको सुनने की कोशिश नहीं की। करती भी नहीं कि पापा व लोकेश क्या बातें करते हैं? उसे याद आया, घर का यह पार्टीशन भैया की अनिच्छा से हुआ था। पार्टीशन को लेकर पापा व भैया के बीच काफी कुछ अघट-सा घट गया था। तब उसने कुछ ख़ास नहीं समझा था कि पापा व भैया के बीच भी पार्टीशन थे। हज़ार-हज़ार पार्टीशन। भैया खूब नाराज़ होकर अपने एक दोस्त के पास बम्बई चले गए थे। और उनके जाने के एक हफ़्ते बाद ही पापा ने आधा फ्लैट किराए पर उठा दिया था, मिसेज नरूला के लिए...।

अमि को लगा, भैया के ख़यालों का भीगा फाहा, उसे मन की भीतरी गहराइयों तक तर कर गया है। अमि उदास हो उठी। भैया के विषय में सोच कर उदास होते समय पापा उसे हमेशा एक बेहद क्रूर व षड्यंत्रकारी व्यक्ति लगते रहे हैं, जो बुनता रहता है, रेशम के कीड़े की तरह कोई तन्तु। एक दिन भैया के संदर्भ में वे जैसे ख़ुद से जूझते हुए बड़बड़ाए थे, 'साला आख़िर, अपनी उस कमीनी व धोखेबाज़ माँ की तरह ही निकला।' ममी के लिए पापा इतने गंदे शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं, उसने पहली बार सुना था। अमि को पता नहीं, ममी कैसी रही होगी। पापा ने ममी के तमाम फोटोग्राफ्स फाड़ डाले थे। भैया के मुँह से ही यह भी जाना था कि ममी को लिखने-पढ़ने का खूब शौक था। साड़ियाँ या सौंदर्य प्रसाधन की चीज़ों की जगह ममी पत्रिकाएँ व किताबें भर लाती थीं और इसी बात को लेकर ममी व पापा के बीच टेन्शन बढ़ता गया था। नतीजतन पापा ने ममी को एक कमरा अलग से दे दिया था। ऊपरी मंज़िल का। जिसमें ममी अपनी किताबों और कपड़ों की अल्मारियों के साथ अलग-सी रहने लगी थी। पापा से लगभग अलग और असम्पृक्त।

भैया ने ही बताया था ममी बहुत मर्मस्पर्शी कहानियाँ लिखा करती थीं और उनकी एक कहानी छपने पर पापा ने ममी को बूटों की ठोकरों व थप्पड़ों से बहुत बेरहमी से पीटा था। भैया तब काफी छोटे थे और उन्होंने भी तब किसी आई.पी.एस. अफसर का गुस्सा पहली बार देखा था। ममी खूब रोई थीं। और जब सुबह हुई, तो ममी की लाश दुमंज़िले फ्लैट के पिछले पथरीले फ़र्श पर मिली थी। ममी ने टैरेस पर से कूद कर आत्महत्या कर ली थी। और जब पापा व भैया के बीच झगड़ा हुआ था, तो अमि को डर लगने लगा था, भैया भी किसी भी क्षण, उसकी आँख लगते ही फ्लैट के टैरेस से पथरीले फ़र्श पर कूद पड़ेंगे।

वह रात भर सिसकती हुई भैया के सीने में दुबकी सोई रही थी। पूरी रात उसकी आँखों में पापा की अँगुलियों व जूतों की 'टो' ही तैरती रही थी। चमकती हुई। अंधेरे में। किसी बनैल पशु की आँख-सी। अमि इतना सारा सोच कर घबरा-सी उठी। उठ कर उसने लॉन की ओर की बंद खिड़की खोल दी। हवा का एक ठण्डा झोंका पीले गुलाबों से होता हुआ कमरे में आ गया। मगर, घुटन फिर भी कम नहीं हुई। अमि पीले गुलाबों की ओर टकटकी लगाए देख रही थी। उसे याद आया, उस दिन अमि ने अपने बालों में पीला गुलाब लगा लिया था। कॉलेज के लिए निकलते वक़्त पापा लॉन में टकरा गए थे। और उन्होंने अमि को आवाज़ लगा कर अपने पास बुलाया था। और चुपचाप उसके बालों में से वह पीला गुलाब निकाल कर फेंकते हुए बोले थे, 'हाऊ अ गॉडी-कलर्ड फ्लावर इट इज़।' अमि का चेहरा रुआँसा हो आया था। तब से अमि ने उन फूलों को हाथ नहीं लगाया। वे खिलते हैं और वहीं सूख जाते हैं। अमि को बहुत दिन बाद पता लगा था, ममी को पीले गुलाब और अशोक के पेड़ बड़े प्यारे लगा करते थे। इन्हें लॉन में उन्होंने ख़ासतौर पर लगवाए थे। माली से कहकर। अपने सामने। ख़ुद खड़े रह कर। वह पीले गुलाबों की तरफ़ देखने लगी। देखकर उसे लगा, जैसे धूप भी अब इन पर कुछ ज़्यादा बेरहमी से ही गिरती है। अमि के भीतर उठे इस निष्कर्ष ने, आँखें गुलाबों से हटा कर अशोक की तरफ़ कर दी। वहाँ देखते हुए पहली बार ख़याल आया, गालिबन अशोक के पेड़ ने भी पापा के 'अटेंशन' का कमाण्ड सुनकर अपनी शाखें अपनी देह से ऐसी चिपका ली कि आज तक खोल ही नहीं पाया। हमेशा सहमा-सा, सीधा खड़ा रहता है। बिना हाथ के आदमी-सा।

यक-बयक उसके भीतर भैया की याद एक टीस की तरह उठी और वह सिहर-सी गई। उसने विश्लेषित किया कि ममी को याद करते वक़्त भैया व भैया को याद करते ही ममी याद आने लगती है... भैया के चले जाने के बाद से उनके कमरे की ओर तो अमि से देखा तक नहीं जाता।
भैया ने जाने के तीसरे ही दिन बाद ख़त डाला था, अमि के नाम, जिसमें ज़िक्र था कि वे बम्बई में ही अपने एक इंजीनियर दोस्त के पास पवई के होस्टल में रुके हुए है। कुछ दिनों बाद ही भैया ने अमि के लिए एक उपहार भेजा था। पापा ने उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंक दिया था। अमि रोने लगी थी, तो शाम को पापा ऑफ़िस से लौटते समय उसके लिए ढेर सारे स्कर्ट व कुर्तियों के पीसेज़ उठा लाए थे। और बाद इसके पापा हमेशा लाने लगे थे, कुछ न कुछ। अमि को खुश करने के लिए। मगर अमि को वे तोहफ़े कभी अच्छे नहीं लगे। उसे हमेशा लगता, जैसे पापा के द्वारा लाई गई इन तमाम चीज़ों में, उनका तनाव और उनका निर्मम पितृत्व लिपटा है। उनकी संजीदगी और गुस्सा लिपटा है। फ्रॉक से चल कर, इस वर्ष से वे साड़ियाँ लाने लगे हैं। उसे इन तोहफ़ों के बदलाव से अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगा है। मसलन अब वह बच्ची नहीं, बड़ी हो गई है। अमि को लगता है ठीक इसी प्रकार साड़ियाँ लाते-लाते पापा उसके लिए ऑफ़िस से लौटते समय एक दिन कोई लड़का ला देंगे, संजीदगी व गुस्से से भर कर, `कर लो इससे शादी...। आय'म गिफ्टिंग यू अ ब्राइडग्रूम !... देट्स ऑल!'
मगर, ऐसा नहीं हुआ। पापा में धीरे-धीरे बदलाव आता गया। चेहरे पर की संजीदगी का थक्का कभी-कभी पिघलता दीखने लगता। पापा कभी-कभी एकाएक बहुत खुश लगते। कई बार पापा के इस बदलाव की छाया के पीछे छुपे कारणों को जानने की तीव्र उत्कण्ठा ने अमि को काफी हद तक बेचैन बनाया है। भला ऐसा क्या काम्प्लेक्स या कन्फ्लिक्ट रहा होगा पापा व भैया के बीच, जो पापा ने उनको एकदम काट कर अलग फेंक दिया, जैसे हम फेंक देते हैं, त्वचा की भीतरी सतहों के भीतर से उगने वाला टूटा बाल या कि नाखून का सिरा। क्या पापा भैया की अनुपस्थिति से वाकई ख़ुश हैं? कौन बताएगा? किससे पूछेगी यह सब? अमि बेकल हो उठती।

और आख़िर धीरे-धीरे अपने आप ही उम्र की यात्रा के ठहराव का ऐसा फोकल-प्वाइंट आ गया, जहाँ खड़े हो कर अमि को सारा यथार्थ एकदम साफ व उजला दीख गया। अब वह पूरी तरह इतने लम्बे समय से प्रश्नचिह्न बनी आ रही स्थिति को बड़ी सरलता से समझ चुकी थी। ममी की पापा से दूसरी शादी थी व भैया पहली शादी के थे। यह जान कर अमि को एकाएक ऐसा पहली बार लगा था, जैसे वह अचानक सयानी और बड़ी हो गई है। बड़ी व अकेली। पापा व भैया के होते हुए भी अकेली। भैया ने एक दिन अवसादग्रस्त आवाज़ में, आँसुओं को पलकों के भीतर ही रोक कर कहा था, 'अमि, कभी-कभी माँ को याद करते हुए लगता है कि मुझे इतनी ममतामयी माँ देकर ईश्वर ने कुछ ज़्यादा ही दे दिया- और बाद देने के ईश्वर को लगा होगा कि वह उतावली में कुछ अधिक उदार हो गया है, नतीज़तन उसने मुझसे माँ को वापस छीन लिया- बस यही समझ लो तुम।'

खट... खट... खट... खट...। शायद पापा अमि के कमरे की ओर चढ़े चले आ रहे थे। उसे समझ में नहीं आ पा रहा था कि अब वह क्या करे? खिड़की में खड़ी-खड़ी इसी तरह बाहर देखती रहे या फिर बालों में कंघी करने लगे या चुपचाप यों ही खड़ी रहे। क्या वह पापा की उन तीखी नज़रों का सामना कर पाएगी? इतने में पापा आ ही गए। अमि अपराधी मन में आतंकित भाव लिए फ़र्श की ओर ताकती रही। वहाँ एक चींटी सरकती चली जा रही थी।

चींटी सरकती गई। क्षण भी सरकते गए। मगर पापा वहीं ठहरे रहे। इतने क्षणों तक कुछ भी नहीं बोले। ''अमि, तुम्हारा कमरा कितना गंदा हो रहा है। रम्मी से कह के साफ़ करवा लो।'' एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और टैरेस की ओर मुड़ गए। अमि ने सोचा, भाषा, पापा और उसके बीच कितना छोटा पुल बनाती है। छोटा और अस्थाई कि अपने उपयोग के बाद अपने आप ही समाप्त हो जाता है। अमि ने अपने कमरे पर एक नज़र डाली। गालिबन मुआयना कर रही हो। उसका पूरा कमरा साफ़ व व्यवस्थित ही तो है। मगर, पापा को पुलिसवालों की-सी व्यवस्था चाहिए। पापा टैरेस की ओर मुड़े। अमि झट से नीचे उतर आई। लेकिन, कुछ क्षणों के बाद ही पापा भी नीचे आ गए। अमि ऊपर जाने का रुख करने लगीं, तो पापा बोले, ''खाना लग गया है। पहले खाना खा लो।'' एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और अंदर ड्राइंग रूम की ओर निकल गए।

अमि ने चाहा कि वह कह दे, ''पापा, मुझे अभी भूख नहीं है।'' मगर चाह कर भी कुछ नहीं कह पाई। चुपचाप वॉश-बेसिन का नल खोल कर हाथ धोने लग गई। हाथ धोते हुए सोचने लगी। वह इतना छोटा-सा प्रतिकार भी क्यों नहीं कर पाती? ज़्यादा से ज़्यादा पापा का चेहरा तनाव भरा हो जाता। या डाँट देते। और अच्छा ही होता न यह सब। पापा का डाँटना पिछले समय से चले आ रहे तनाव को इस हद तक खींच देता, जहाँ आकर वह टूट भी सकता था।

अमि के भीतर कभी-कभी इसी तरह के प्रतिरोधों के ख़याल की लौ उठती है, जो लपट बनना चाहती है। वह ख़ुद को उकसाती भी है कि वह क्यों नहीं इस घर की दीवारों को तोड़ कर बाहर निकल जाती- जैसे कि परिन्दों के चूज़े तोड़ देते हैं, अण्डे की दीवारों को- पर, ऐसे ख़यालों की लौ धीरे-धीरे धुँधुआने लगती है। फिर चुपचाप बुझ जाता है, सब कुछ।
अमि हाथ धोकर डाइनिंग-टेबल के सामने बैठ गई। पापा ड्राइंगरूम से लौट कर उसके सामने की कुर्सी पर बैठ गए। फिर खाना खाते हुए पापा बोले, ''अमि बेटे, ख़ुद को सँभाल कर रखो। देख रहा हूँ, तुम दिन-ब-दिन बीमार-बीमार और सुस्त होती जा रही हो।'' अमि ने पापा के मुख से 'बेटा' सम्बोधन सुनकर बहुत धीमे से सिर उठा कर उनकी ओर देखा। पापा का चेहरा पहली बार उसे इतना सपाट व निर्विकार लगा। ऐसा चेहरा देख कर उसे कॉलेज की लेबोरेटरी का वह फ्लास्क याद हो उठा, जो बाहर से सख्त़ लेकिन भीतर कण-कण में टूट जाने वाले शीतल द्रव से भरा है। पापा के प्रति न चाहते हुए भी वह सहानुभूति से भर उठी। अमि की इच्छा होने लगी, देखे एक बार उस भीतर के द्रव को छूकर तो देखे। मगर, वह बाहर की सख्त़ी की कल्पना से ही डर कर रह गई। 'बेटे' सम्बोधन की अनुगूँज भी उसे फलाँग कर पापा के निकट जाने के लिए वाँछित हिम्मत नहीं भर पाई।

रम्मी ने एक चपाती और परोस दी। वह खाती रही। चुपचाप। प्लेट की चपाती ख़त्म हो गई, तो दूसरी उठाई भी नहीं। और रम्मी ने आवश्यकता न होने पर भी रख दी, तो मना नहीं किया। अंत में उठ गई। चढ़ कर फिर अपने कमरे में बंद हो गई। फिर कॉलेज से लाई गई किताब में से एक कहानी पढ़ने की कोशिश की। मगर, उसमें भी ख़ुद को ज़्यादा देर तक न डुबो पाई। अमि को लगा, वह बरसों से उदास और चुप है तथा अब उदासी इतनी गहराई पकड़ चुकी है कि कम से कम पापा के साथ रहते हुए तो वह जनम भर न हँस सकेगी...। ग़ालिबन, अब वह हँसी को गुमशुदा चीज़ों की फेहरिस्त में दर्ज़ कर चुकी है।

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