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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से पवन कुमार की कहानी— 'वह एक शाम'


प्रिय धीरज,
कैसे हो मेरे बच्चे?
उस शाम मुझे सचमुच बहुत अच्छा लगा। बहुत, बहुत, बहुत अच्छा। मेरे जीवन का अनमोल व स्मरणीय समय। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि ऐसा क्षण भी मेरे जीवन में आ सकता है। तूने मुझे वो समय दिया, वो क्षण दिया-आई लव यू मेरे बच्चे।
बारह मार्च दो हज़ार सात! यही दिन था न वो, तेरे चकित कर देने वाले निमंत्रण का। मेरी याददाश्त चाहे कितनी भी कमज़ोर हो जाए मगर मैं वह दिन नहीं भूलूँगी, कभी नहीं। उससे पहली वाली रात को, देर रात को जब तेरा फ़ोन आया तो मैं चौंक गई थी, किसी अनिष्ट की आशंका से आशंकित। और जब तूने कहा, 'क्या कल मेरे साथ डिनर पर चल सकती हो?' तो मैं सोच में पड़ गई थी। फिर साथ में तुमने ये भी जोड़ा था, 'सिर्फ़ हम दोनों।'
मुझे 'हाँ' तो कहना ही था पर मैंने सोचने के लिए काफ़ी समय ले लिया।

और अगले दिन, यानि बारह मार्च दो हज़ार सात।
मैं सुबह से ही रोमांचित थी, इसी कारण से रात को ठीक से सो भी नहीं पाई थी। मुझमें बदलाव देखकर नौकरानी भी अचंभे में थी। शायद वो भी सोच रही थी कि ये बुढ़िया पागल हो गई है? मैं आज की शाम के बारे में किसी को तो बताना चाहती ही थी, मैंने उसे बताया। मुझे नहीं मालूम उस पर क्या असर पड़ा क्योंकि मैं अपने में ही मगन थी। सचमुच अजीब-सा पागलपन छा गया था।

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