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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से
ज़ाकिर अली रजनीश की कहानी— 'इकामा फ़ी'


वह दोपहर का समय था। जैसे ही घड़ी ने बारह का घंटा बजाया, जद्दा शहर के सैफा मोहल्ले की तीन नम्बर गली के 'अल-हजरत' कारखाने में जलजला उतर आया। अचानक बाहर का गेट खड़का और दरवाजा खुलवाने के लिए कई लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे। उस समय अल-हजरत में कुल सोलह लोग मौजूद थे। देर रात तक काम करने के कारण वे लोग कुछ ही समय पहले उठे थे और हाथ मुँह धोने के बाद नाश्ता करने जा रहे थे। बाहर से आ रही आवाज की तेजी बता रही थी कि आने वाले लोग सुरता यानी पुलिस महकमे से ताल्लुक रखते हैं। और जैसे ही यह बात कारखाने में मौजूद लोगों की समझ में आई, वहाँ खलबली मच गयी। सामने रखे खाने को छोड़ कर कोई आदमी कपड़े पहनने लगा, तो कोई पासपोर्ट की खोज में मसरूफ हो गया। पुलिस बाहर आ चुकी थी, इसलिए पकड़ा जाना तो तय था। हाँ, पकड़े जाने से पहले वे आगे आने वाली मुश्किलों को आसान बना लेना चाहते थे।
मशगल यानी सिलाई के उस कारखाने में कुल जमा बीस गैरकानूनी मुलाजिम काम करते थे। बीस में से दो लोग पिछले हफ्ते छुटटी पर अपने मुल्क हिन्दुस्तान गये हुए थे। तीन लोगों को कल रात बलद मार्केट के पास से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। वे तीनों अभी एक महीने पहले ही आए थे, अपने खेत और मकान गिरवीं रखकर। लेकिन बलद की शीशे वाली मार्केट, जोकि अपनी खूबसूरती के लिए पूरे शहर में मशहूर है, के जादू ने उन्हें बनीमान जेल पहुँचा दिया था।
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