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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से दुर्गेश गुप्त 'राज' की कहानी— 'आइटम नंबर दस'


"आइटम नंबर दस" यह एक ऐसी पुकार है जिसके आते ही मैं सतर्क हो जाता हूँ। आवाज़ के उत्तर में कहता हूँ- 'हाँ, मैं तैयार हूँ।' और तुरंत कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए अपने आपको तैयार करने लगता हूँ। सायकल उठाता हूँ और उस पर सवार हो अपने चेहरे पर रोज़ वाली कृत्रिम मुस्कुराहट लाने की कोशिश करता हूँ। बालों में कंघी मारता हूँ। फिर होठों की मुस्कुराहट को स्थिर करने की कोशिश करने लगता हूँ। तभी देखता हूँ जिमनास्टिक वाला ग्रुप लौटकर आ रहा है और मेरा ही नंबर है।

तभी मेरे पाँव हमेशा की तरह यंत्रवत अपना कार्य शुरू कर देते हैं और मैं एक बार फिर अपने करतब दिखाने के लिए कूद पड़ता हूँ ज़िन्दा लाशों के बीच। हाँ हज़ारों ज़िन्दा लाशों के बीच में। जो केवल सर्कस देखने के लिए आते हैं। सर्कस यानि कि जाँबाज़ कलाकारों के ख़तरनाक खेल। हैरत-अंगेज़ कारनामे।

मैं संगीत की धुन पर किसी लहराते, बलखाते नाग की तरह अपने होठों पर सदाबहार मुस्कुराहट बिखेरते हुए सायकल पर नाचने लगता हूँ। बीच-बीच में तालियों के उपहार मिलते हैं, लेकिन उनसे अब मुझे विशेष खुशी नहीं होती। क्योंकि ये तालियाँ अब मेरे जीवन का अंग बन चुकी हैं। ठीक खाने-पीने की तरह। अब मैं इन्हें आसानी से पचा जाता हूँ।

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