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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से राहुल ब्रजमोहन की कहानी— 'विनिवेश'


मैंने चाबी के छल्ले की तरह गोल-गोल रूमाल घुमाकर उमस में भीजते जिस्म के साथ अपनापा निभाने की सतही कोशिश ही की थी, कि वह पूछ बैठे, ''कितने घंटे का रन है जी उज्जैन तक?''

''बमुश्किल दो घंटे।'' कमोबेश हैरत भरे अंदाज़ में मैंने जवाब दिया। आम तौर पर कम ही लोग मुझसे बातचीत करते हैं। नौजवानों को मुझसे अपनी जमात का पिटा हुआ मोहरा नज़र आता है और अधेड़ मुझे लड़कपन का मारा समझकर काम का आदमी मानने से साफ़ इंकार कर देते है। उन्हें मुझमें लोकाचार की कोई जागृत सम्भावना दिखाई नहीं देती। मैं खुद भी किसी से खुलकर नहीं मिलता। सच कहूँ तो अपनी दिनचर्या के दायरे से बाहर कदम रखते हुए मुझे घबराहट सी होती है। इसलिए जब एक सर्वथा अपरिचित सज्जन मेरी तरफ़ इस तरह मुतवज्जेह हुए, तो ऐसा लगा जैसे मैं ग़लत वक्त और ग़लत ज़मीन पर ग़लत तरीके से धर लिया गया हूँ।

वह ठीक सामने बर्थ पर बैठे थे। मैंने गौर से देखा, साठ-पैसठ के करीब रहे होंगे। चेहरे पर झुर्रियाँ बहुत कम, बल्कि नदारद थी। शायद उम्र को यकीन होगा कि वह शिलालेखों को उखाड़ ले जाने वाले शख्स नहीं है इसलिए अपनी शिनाख्त के निशान यहाँ बहुत गहरे गाड़ने की ज़रूरत भी उसे महसूस नहीं हुई होगी।

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