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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से
राजेन्द्र त्यागी की कहानी— अनजान रिश्ते


असगर आज अपने गाँव चला गया। जाते-जाते खुद तो रोया ही हमारी आँखें भी नम कर गया। जाते-जाते ही क्यों, जाने के एक दिन पहले से ही वह इस तरह सुबक रहा था, मानों अपने अपने प्रियजनों से हमेशा-हमेशा के लिए बिछुड़ रहा हो। नहीं, साल-छह महीने बाद फिर उसे रोजी-रोटी की तलाश में अपना गाँव छोड़कर फिर उसे इस शहर की किसी झुग्गी को आबाद करना है! फिर भी हमसे बिछुड़ने के गम ने उसे रोने के लिए मजबूर कर दिया था। जब कभी असगर की मासूम सूरत मन में उतर आती है, मैं उसके साथ अपने रिश्तों के बारे में विश्लेषण करने लगता हूँ। सोचने लगता हूँ, अनजान रिश्तों के बारे में। और, कुछ अनजान रिश्ते भी होते हैं, इस मान्यता को स्वीकारने के लिए मजबूर हो जाता हूँ।

असगर गंभीर प्रकृति का इनसान था। उसे कभी हँसते हुए नहीं देखा, मगर कभी उदास भी नहीं। बस गुमसुम अपने काम में लगा रहता। हाँ, एकबार मेरे कुछ सवालों पर वह मुस्कराया अवश्य था और फिर मौन हो गया था। शाम का वक्त था। राज-मिस्त्री काम समेट कर अपने-अपने घर चले गए थे। आदत के अनुसार असगर अभी भी साफ-सफाई के काम में जुटा था। मैं तभी दफ्तर से लौटा था। हाथ-मुँह धो कर कपड़े बदले और प्रेमलता से चाय के लिए गुजारिश की। प्रेमलता ने मुझे चाय का कप पकड़ाते हुए रोजाना की तरह असगर को भी चाय के लिए आवाज दी। असगर भी मेरे पास ही फर्श पर बैठ कर चाय पीने लगा।

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