मुखपृष्ठ

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार हिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP            पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org


कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से
उदय प्रकाश की कहानी— अरेबा परेबा


सभी के शरीर में मस्से कहीं न कहीं होते ही हैं। उनकी संख्या ज़्यादा नहीं होती। हर कोई अपने शरीर में उनकी जगह के बारे में जानता है। उनकी संख्या का भी कुछ-कुछ अनुमान उसे होता है। लेकिन हमारे गाँव में सेमलिया की पूरी देह में मस्से ही मस्से थे। इतने कि उसे खुद अपनी देह में उनकी जगह और उनकी संख्या के बारे में अंदाज़ा नहीं होगा।

मस्से सबसे ज़्यादा उसके चेहरे पर थे।
मस्से भी बड़े-बड़े। गोल, चमकीले। चने की दाल या भुट्टे के दानों की तरह चेहरे पर छितराये हुए। उनमें से कोई-कोई तो काफी बड़ा भी था। जैसे चेहरे पर त्वचा का कोई बुलबुला बन गया हो। कुंदरू के आकार का। सेमलिया का रंग काला था।

यह तब की बात है, जब तक बिजली हमारे गाँव में नहीं आयी थी। रात में लालटेन, लैंप और दिये जला करते थे। सँझबाती हुआ करती थी। बुआ शाम होते ही पहला दिया जला कर, सारे घर में उसे फिराने के बाद, भगवान के पास रख देती थीं। उस दिये को सब प्रणाम किया करते थे। लैंप को हम 'लंफ` कहते थे।

ढिबरी भी होती थी, जो किसी छोटी-सी शीशी के ढक्कन में छेद बनाकर, उसमें चिथड़े की बत्ती डालकर और उसके काँच के पेट में मिट्टी का तेल भर कर बनाई जाती थी।

पृष्ठ : . . .

आगे-

अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसारहिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP / पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।

 

hit counter