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मनोहर की सरकारी अफसरी और सविता की स्कूल टीचरी से जो मिलता था, उससे उनकी गृहस्थी की गाड़ी दुपहिए स्कूटर की रफ्तार ठीक से पकड़ लेती थी। आम तौर पर मनोहर सविता को सुबह सात बजे स्कूल के दरवाजे पर उतार आता था। राहुल को लेकर उस समय तक कुछ परेशानी हुई जब तक वह तीन साल का नहीं हुआ। उसके बाद सविता उसे अपने साथ ही ले जाने लगी थी।

किसी स्थिर तालाब के किनारे बैठना कितना अच्छा लगता है। पानी में हल्की-हल्की लहरें आती रहती हैं। कभी-कभी कोई चिड़िया या कौवा आकर उसमें चोंच भरता है। पानी में हल्की-सी हलचल होती है। किनारे बैठे लोग भी इतनी शांत स्थिरता देखकर कभी-कभी ऊबने लगते हैं। तब वे किनारे से छोटी-सी कंकरी उठाकर उसमें फेंक देते हैं। पानी में छप-सी होती है। लहरों में कुछ उछाल पैदा हो जाती है। किनारे बैठे व्यक्ति को अच्छा लगता है।

सविता की स्थिर शांत ज़िंदगी के तालाब में सुधाकर एक कंकरी बनकर नहीं, पूरा बड़ा पत्थर बनकर गिरा था।

कुछ सीढ़ियों की बनावट बहुत विचित्र होती है। उसमें ऊपर जाने वाली और नीचे उतरने वाली सीढ़ियाँ साथ-साथ काम करती हैं। जिन सीढ़ियों से व्यक्ति ऊपर चढ़ रहा होता है, पास की ही दूसरी सीढ़ियों से वह नीचे उतर रहा होता है। सविता के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। सुधाकर युवा मोर्चे से निकल कर पार्टी की मुख्य धारा में आ गया था। जब वह पार्टी का महासचिव बना तो सविता पार्टी के चार सचिवों में शामिल कर ली गई और उसे महिला मोर्चे की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई।

नीचे जाने वाली सीढ़ियों में उतनी रोशनी नहीं होती जितनी ऊपर चढ़ने वाली सीढ़ियों में होती है। ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर व्यक्ति मुँह ऊँचा करके चढ़ता है। महत्वाकांक्षाओं का संसार उसे सामने झिलमिलाता दिखाई देता है। नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ उतरते समय व्यक्ति नीचे की तरफ देखता है और हर कदम पर फिसल जाने, चूक जाने का डर बना रहता है।

एक दिन मनोहर ने उससे कहा था, ''सविता, जिस रास्ते पर तुम चल पड़ी हो वह कहीं थमने वाला रास्ता नहीं है। एक स्कूल टीचर ऊपर चढ़ता हुआ सीनियर टीचर बन जाता है। ज़्यादा से ज़्यादा प्रिंसिपल बनता है और रिटायर हो जाता है। मेरे जैसा सरकारी अफसर, जिसने ज़िंदगी एल.डी.सी. और यू.डी.सी. से शुरू की हो कहाँ तक जाएगा... सेक्शन ऑफिसर तक... बहुत ज़ोर मारेगा तो अंडर सेक्रेटरी तक। मैं तुमसे यह नहीं कह सकता कि तुम वापस आ जाओ। यह भी सच है कि तुम मुझे कितना भी खींचो मैं तुम्हारे साथ-साथ नहीं चल सकता। हमारे रास्ते भी अलग हो रहे हैं और दिशायें भी।''

सविता गुमसुम-सी उसकी बातें सुन रही थी। पिछले कुछ वर्षों में उसके पारिवारिक जीवन में बहुत अंतर आया था। राहुल अपनी बढ़ती उम्र के साथ स्कूली पढ़ाई के अंतिम पड़ाव पर आ गया था। पहले उसने स्कूल से लंबी छुट्टी ले ली थी। फिर सुधाकर ने उससे कहा था- यह टीचरी-फीचरी छोड़ो और सारा समय पार्टी को दो... चिंता न करो। पार्टी तुम्हारी ज़रूरतों का ध्यान रखेगी।

सुधाकर ने अपनी बात पूरी की। वह उस प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुन ली गई जहाँ पार्टी के विधायकों की काफी गिनती थी।

जब लोधी एस्टेट में सविता को एक लंबी-चौड़ी कोठी एलाट हो गई तो उसने मनोहर से कहा, ''अब हम लोग उस कोठी में शिफ्ट कर सकते हैं। अपना यह फ्लैट किराए पर उठा देते हैं। कम से कम छह वर्ष तो हमें वहाँ से कोई नहीं हिलाएगा।''

मनोहर के सामने एक दृश्य घूमने लगा- कोठी पर आने-जाने वालों का तांता लगा हुआ है। वहाँ लगातार एक शब्द गूँजता रहता है... सविता जी... सविता जी...। वहाँ उसका एकमात्र परिचय है- मनोहर मेहरा... सविता जी के पति।

उसे एक और बात सल रही थी। उस कोठी के हर कोने में एक छाया व्यापी हुई होगी, जिसका चेहरा-मोहरा सुधाकर से कितना मिलता-जुलता होगा।

उसने कहा था, ''सविता, मैं यह फ्लैट छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। तुम कहाँ रहना चाहती हो, यह फैसला तुम कर लो।''
''आप मेरी बात समझते क्यों नहीं?'' सविता ने बड़े अधिकार भरे स्वर में कहा था, ''मैं संसद सदस्य हूँ। पार्टी की सीनियर लीडर हूँ। मुझसे मिलने के लिए सैंकड़ों लोग रोज़ आते हैं। पत्रकारों की भीड़ लगी रहती है। अभी तक मैं पार्टी के ऑफिस से काम चला लेती थी। अब मुझे यह सारा काम अपनी कोठी से करना चाहिए। इसीलिए मुझे राज्य सभा का सदस्य बनाया गया है। इस फ्लैट में तो यह नहीं हो सकता।''

जो हो सकता था, वही हुआ। सविता राहुल को अपने साथ रखना चाहती थी, किंतु मनोहर इसके लिए तैयार नहीं हुआ। राहुल भी अपने पिता के साथ रहना चाहता था। सविता अपनी पुरानी नौकरानी के साथ नई कोठी में आ गई।

वह पीछे कुछ छोड़ आई है, इसका कभी उसे एहसास नहीं हुआ। जिन ऊँचाइयों पर वह उड़ रही थी, वहाँ से पीछे मुड़कर देखने का न ही समय था न कोई अकुलाहट। उड़ते-भागते क्षणों में जब कभी उसे लगता कि उसकी गाड़ी के चक्कों में कुछ चूँ-चूँ होने लगी है तो सुधाकर के कलावे की स्निग्धता उसमें तेल का काम कर देती थी।

लेकिन आज... इस धुँधलाई शाम में... अंधेरे में चुपचाप बैठी वह सोचने लगी- उसका एक अपना घर है, तीन कमरों वाला छोटा-सा फ्लैट है। उसका पति है, जो रोज़ उसे अपने स्कूटर पर बैठाकर स्कूल छोड़ने जाता था और मुड़ने से पहले मुस्कुराता था और उसका हाथ दबाता था। उसका एक बेटा है। वह कॉलेज में पहुँच गया है। क्रिकेट का अच्छा खिलाड़ी है... टीम का कप्तान बन गया है।... उसे याद नहीं कि उसकी मसें कब फूटी थीं। पिछली बार जब उसे देखा था, वह शेव किए हुए था।

एकाएक उसे कुछ चुभने लगा। उसके चारों ओर अंधेरा अधिक गहरा होने लगा। वह सोचने लगी, राहुल धीरे-धीरे कैसे बड़ा हुआ होगा, कब उसकी मसें फूटी होंगी, कब उसने पहली बार शेव किया होगा। उसके सामने मनोहर की तस्वीर भी घूमने लगी। उसके बालों में कितनी सफेदी आ गई है। पिछली बार जब वह उससे मिली थी, वह बता रहा था कि शायद वह प्रीमेच्योर रिटायरमेंट की स्कीम में रिटायरमेंट ले ले। पर... वह सेवा मुक्त होने के बाद करेगा क्या?

वह अंधेरे में आँखें बंद किए बैठी थी।

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२५ जनवरी २०१०

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