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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से विभारानी की कहानी— अभिनेत्रियाँ


देर हो चुकी थी। नागम्‍मा जल्‍दी-जल्‍दी कपड़ा मार रही थी कि पीतल के नटराज नीचे गिरे – घन्न्न्न्न्.... जोरदार आवाज हुई। जयलक्ष्‍मी घबड़ाकर बाहर निकली–
‘क्‍या तोड़ दिया?’
‘कुछ नहीं... नटराज गिर पड़े।’
‘संभालकर बाबा! कितनी बार समझाऊँ?’‘हाथ ही तो है न माँ! हो जाता है।’

जयलक्ष्‍मी के भाषण से नागम्‍मा चिढ़ती है। नागम्मा की दलील से जयलक्ष्‍मी चिढ़ गई -‘एक तो गलती, ऊपर से गलथेथड़ी। सॉरी तो इन लोगों की जीभ पर है ही नहीं।’
नागम्‍मा के हाथ फिर से मशीन की तरह चलने लगे। आठ बजे उसे दफ्तर पहुँचना होता है-‍ पैसेज की सफाई, क्यूबिकल्स की सफाई, केबिन की सफाई, बाथरूम की सफाई, केबिन के अफसरों के लिए पानी। कान्ट्रैक्‍ट पर है वह। सब कुछ करते-धरते दस बज जाते हैं। दफ्तर के कैंटीन में ही वह नाश्‍ता करती है। कांट्रैक्टर से उसे यूनीफॉर्म मिली हुई है – साड़ी! एकदम मटमैले रंग की। हमेशा गन्‍दी दिखती। गहरे रंग की नागम्‍मा पर वह साड़ी उसे और गहरा बना देती। साड़ी के संग संग वह भी और गन्‍दी व अशोभनीय दिखती।

जयलक्ष्‍मी भी जल्‍दी-जल्‍दी हाथ मार रही थी। सुबह पाँच बजे वह उठती है – दोनों

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