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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से पावन की कहानी— सांता नहीं चाहिये


खत्म होते साल के आखिरी बचे-खुचे दिन। क्रिसमस और नये साल के आगमन के इन दिनों में बाजारों में बहुत रौनक होती है। बाजार, जो सबको लूट लेना चाहता है, खाली कर देना चाहता है।
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कॅनाट प्लेस का ‘इनर सर्कल’ रोशनियों से जगमगा रहा है।
वह ‘टी जी आई फ्राइडे’ के सामने की रेलिंग पर बैठी थी और उदास थी। लेकिन जब वह मैट्रो स्टेशन से बाहर निकलकर इनर सर्कल में आयी थी तो उदास नहीं थी बल्कि वह तो बहुत खुश थी। वह तो आज इस शाम को यादगार और लम्बी ठण्डी रात को खूबसूरत बनाकर बिताने वाली थी।
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टी जी आई एफ तक पहुँचते-पहुँचते उसका फोन आ गया था। उसने कहा था कि आज वह उसके साथ नहीं जा पायेगा।
‘क्यों?’, उसने हैरानी से पूछा था।

‘डियर, आज तुम मेरा ‘सैकेण्ड ऑप्शन’ थी, फर्स्ट मेरे साथ है। आज तुम फ्री हो, कुछ भी करने के लिए, वो भी जो मेरे साथ करती।’, उसकी शरारत भरी आवाज, ‘डोन्ट वरी, अभी तो न्यू ईयर भी है।’
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वह हमेशा दो ऑप्शन्स लेकर चलता था। उसे उसकी यह आदत पसन्द थी। मगर आज वह खुद उसकी इस आदत की शिकार हो गयी थी। उसका खून खौल गया।

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