मुखपृष्ठ

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार हिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP            पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org


कहानियाँ

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस माह प्रस्तुत है ब्रिटेन से उषा राजे सक्सेना की कहानी - "शुकराना"

रोज की तरह उस दिन भी ठीक साढ़े छे बजे मेरी आंख तो खुल गयी पर बदन अलसाया ही रहा। बिस्तर छोड़ने को मन नहीं कर रहा था। अचानक याद आया सवा आठ पर मुझे फियोना से इंश्योरेंस के सिलसिले में उसके ऑफिस में मिलना है। अब चाहे तन आलस करे या मन। उठना ही होगा। किसी तरह बदन को पैरों पर घसीटते हुए शावर के नीचे ले आई। शावर के तीखे धार वाले गुनगुने पानी ने बदन को गुदगुदाया। सारी ख़ुमारी क्षण भर में छू मंतर हो गयी। फिर तो बीस मिनट में मैं अपने पूरे फार्म में आ गयी।

ठीक सवा सात पर मैंने घर का दरवाज़ा बन्द किया और गेट से बाहर आई। सड़क के दोनो ओर काले बैग के ढेर करीने से लगे हुए थे। कूड़ा गाड़ी अगले मोड़ पर खड़ी आरा मशीन की तरह शोर मचा रही थी। डस्टबिन मैन पूरी मुस्तैदी से गमबूट और रबर के दस्ताने पहने कूड़ा उठा-उठा कर वैन में फेंके जा रहे थे। गाड़ी में लगी कूड़ा-मशीन कूड़े के बड़े-बड़े बैगों को किसी दैत्य की तरह निगले जा रही थी। घड़ी भर में सड़क साफ हो जाएगी। फिर हफ़्ते भर घरों में कूड़ा इकठ्ठा होगा। उन्हें छोटे-छोटे बैगों में बाधा जाएगा। मंगल की रात को घर के लोग उन्हें काले बैग में इकठ्ठा कर सुतली से बाधेंगे। और सड़क के किनारे डस्टबिन मैन के लिये सजा कर रख देंगे। और यह सिलसिला चलता रहेगा

पृष्ठ-

आगे -

इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें - दूसरों की प्रतिक्रिया पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार हिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP / पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।