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कहानियाँ  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
यू.के. से उषा वर्मा कहानी— मंजूर अली


मंजू़र अली यहीं ब्राडवे के मोड़ पर रहते थे। मकान बड़ा नहीं था पर अच्छा था। वैसे अकेले आदमी के लिए दो कमरों का मकान भी बड़ा ही होता है। कुछ ही दिनों पहले पाकिस्तान से आए थे। लंबा कद, चुस्त शरीर, बड़े ही मिलनसार, उनकी तबीयत का क्या कहना, जब भी अपने पाकिस्तानी दोस्तों से मिलते बड़े ही गर्मजोशी से हाथ मिलाते, हालचाल पूछते। हर समय खुशी की एक लहर उनकी आँखों में दौड़ती रहती थी।

सुधाकर को भी लीडस में रहते यही सात आठ साल हो रहे थे। सुधाकर भारत के उड़ीसा प्रांत से आए थे। परिवार को अभी तक नहीं बुला पाए थे, दो छोटी बहनें थीं उनकी शादी करने के बाद ही पत्नी एवं बच्चों को बुलाने का इरादा था, अकेले थे अत: हर एक से मिलना जुलना भी खूब रखते थे। समय पड़ने पर हर किसी की मदद करने को तैयार रहते थे। स्वभाव की इस उदारता की वजह से वह सबके चहेते थे लोग उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। वे भी ब्राडवे के अंदर जा कर बाई तरफ़ एक फ्लैट में रहते थे।
मंज़ूर अली से उनकी मुलाक़ात कभी आते जाते सड़क पर कभी लोकल शॉप में होती रहती। धीरे-धीरे आठ दस महीने बीत गए, ऐसा लगता था कि मंजू़र अली सुधाकर को देखकर औपचारिकतावश मुस्करा तो देते थे, पर घर पर मिलने की कभी पहल नहीं करते।

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