मुखपृष्ठ

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार हिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP            पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org


कहानियाँ  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
 यू.एस.ए. से नीलम जैन की कहानी— प्रश्न


उस दिन सुबह से ही घर में खूब गहमागहमी थी। माँ चाह रहीं थी कि पास पड़ोस वालों को न्यौता देने के लिए घर से कोई जाए। अनौपचारिक रूप से तो सभी को सूचित कर ही दिया गया था पर बरसों की आदत है जब तक कोई न्यौता देने ना आए माँ खुद भी किसी के घर खुश हो कर नहीं जाती। मान सम्मान की बात जो ठहरी।
स्नान पूजा से निवृत्त होते-होते माँ को साढ़े दस बज जाते हैं। तब तक कोई न कोई पास पड़ोसन आ बैठती हैं। वह बतियाने और घरेलू कामों की देखभाल साथ-साथ करतीं हैं।
"ए फागनी," माँ ने गुहार लगाई, "ये कुक्कर की आवाज़ कम कर।" "ये कुक्कर भी मरे इतनी ज़ोर सी सीटी मारे है जैसे गली के आवारा लड़के, न कोई बात कर सके है न मश्वरा।" ज़रा झुँझलाई हुई ज़रूर थीं पर मुझे तो नहीं लगा कि इसमें माँ की कोई और मंशा थी लेकिन पास ही बैठी सत्तू की घरवाली बिलबिला उठी।
"किसे सुना रही हो बहना। हमारा ओम तो बिल्कुल सुधर गया है। रोज़ चाचा के साथ दुकान जावे हैं आजकल। अबके बरस उसके लगन की बात चलाई है।"
"हद करो हो सत्तू की बहू, मैंने फागनी को कुकर के नीचे आँच कम करने को कहा है इसमें तुम्हारा ओम कहाँ से आ गया?" माँ भी जब तक बात खुलासा कर अपनी कही समझा न लेंगी मानेंगी नहीं।
"मैं तो उड़ते पंछी के पर गिन लूँ क्या समझती नहीं कि तुम्हारे दिल में क्या है।" "बिन बाप का अनाथ बालक उसने देखा जाना ही क्या?"

पृष्ठ : . . .

आगे

अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसारहिंदी लिंक हमारे लेखक लेखकों से
SHUSHA HELP // UNICODE  HELP / पता- teamabhi@abhivyakti-hindi.org

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।

 

hit counter