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"बाउजी, किस दुनिया की बात कर
रहे हैं। आपको यहाँ, इस देश में हमारे साथ रहना है। देखिए
बाउजी, ब्रिटिश पासपोर्ट के लिए लोग दो-दो लाख रुपए देते हैं
रिश्वत में, तब कहीं जाकर हासिल कर पाते हैं। आपको मुफ़्त में
मिल रहा है तो आप इसकी कदर ही नहीं करते। ब्रिटिश पासपोर्ट हो
तो आपको किसी भी देश का वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब
दिल किया, जहाँ जाना हो, बस, हवाई जहाज़ की टिकट लीजिए और घूम
आइए वहाँ।"
"लेकिन बेटा जी, मुझे हिंदुस्तान के लिए, अपनी जन्मभूमि के लिए
तो वीज़ा लेना पड़ेगा न। क्या इससे बड़ी कोई लानत हो सकती है
मेरे लिए? बेटा, एक बात बताओ, क्या कोई ऐसा तरीक़ा नहीं हो
सकता कि मैं हिंदुस्तान का नागरिक भी बना रहूँ और मुझे तुम
अपनी खुशी के लिए ब्रिटेन की नागरिकता भी ले दो?"
सरोज ने भी इंद्रेश को बहुत
समझाने का प्रयास किया था कि जब बाउजी को पसंद नहीं तो क्यों
उनकी नागरिकता बदलवाई जाए। लेकिन इंद्रेश ने किसी की नहीं
सुनी। ब्रिटेन की रानी के प्रति वफ़ादारी की कसम खाने के बाद
गोपाल दास जी ने तीन दिन तक कुछ नहीं खाया, पेट में जैसे कसम
का अफ़ारा उठ रहा था।
गोपालदास जी कभी अपने नए
पासपोर्ट को देखते, तो कभी अपनी बाईं बाजू को। उनकी बाईं बाजू
में एक गोली लग गई थी, उनकी हड्डी के साथ स्टील की रॉड लगा दी
गई थी। इसलिए उनकी बाईं भुजा दाईं भुजा से कुछ इंच छोटी थी। और
यह गोली उन्हें एक अंग्रेज़ सिपाही ने मारी थी, लाहौर में।
लाहौर से दिल्ली आना उनकी
मजबूरी थी। अपनी जन्मभूमि को उस समय छोड़ना उन्हें बहुत परेशान
कर रहा था। किंतु कोई चारा नहीं था। वहाँ किसी पर विश्वास नहीं
बचा था। दोस्त दोस्त को मार रहे थे। हर आदमी या तो हिंदू बन
गया था या फिर मुसलमान। रिश्ते जैसे ख़त्म ही हो गए थे। सभी
इंसान धार्मिक हो गए थे और जानवर की तरह बरताव कर रहे थे।
मजबूरी तो इंग्लैंड आना भी
थी। लेकिन यह मजबूरी बिछड़ने की नहीं, मिलने की थी, साथ रहने
की थी। पत्नी की मृत्यु के बाद का अकेलापन, किसी अपने के साथ
रहने की चाह और इकलौता पुत्र। यही सब गोपालदास जी को लंदन ले
आया था। बेटी विवाह के बाद अमरीका में है और बेटा इंग्लैंड -
बेचारे गोपालदास जी अकेले फरीदाबाद में अपनी बड़ी-सी कोठी में
कमरे गिनते रहते। अधिकतर रिश्तेदार दिल्ली में। अब तो फरीदाबाद
से दिल्ली जाने में भी शरीर नाराज़गी ज़ाहिर करने लगता था। ऐसे
में ज़ाहिर-सी बात है कि इंद्रेश ने अपने पिता की एक नहीं सुनी
और उन्हें लंदन ले आया था।
आज यही लंदन गोपालदास जी को
जैसे और अधिक पराया लगने लगा था। आजकल वो विधि और अगस्त्य से
भी कम बात करते थे। अगस्त्य छोटा है, बार-बार अपने दादा जी से
चिपटता रहता है। विधि महसूस करती थी कि दादा जी परेशान हैं।
अपनी मीठी-सी अंग्रेज़ी में पूछ लेती थी, "दादा जी, आप हर वक्त
क्या सोचते रहते हैं?" दादा जी क्या जवाब दें। अपनी छोटी-सी
नन्हीं परी को क्या और कैसे बताएँ अपने दिल का दर्द। बस स्टार
न्यूज़ और ज़ी टीवी उनके साथी बन गए थे। बार-बार वही ख़बरें
सुनते रहते। भारत के बारे में भारतवासियों से अधिक गोपाल दास
जी को ख़बर रहती थी।
"मुझे सच बाउजी पर बहुत तरस
आता है। सेम-सेम ख़बरें सुन कर बोर भी नहीं होते।" सरोज
इंद्रेश को बता देती थी। बस यही बार-बार सुनने वाली उबाऊ
ख़बरों में से ही एक दिन गोपालदास जी को एक ख़ास ख़बर सुनाई दे
गई थी जिसने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया था।
स्टार न्यूज़ ने समाचार दिया कि प्रवासी दिवस के दौरान
प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि पाँच देशों के भारतीय मूल
के लोगों को दोहरी नागरिकता दी जाएगी।
"सरोज बेटा, तुमने सुना। आज तो प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया
है कि हम दोहरी नागरिकता रख सकते हैं। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा
ही कि पाँच देशों के एन.आर.आई. बकायदा डयूल नेशनेलिटी रख सकते
हैं। और उन पाँच देशों में इंग्लैंड भी शामिल है। बेटा तू
जल्दी से इंद्रेश को फ़ोन मिला। उसको कह कि आफ़िस से निकलते
हुए हाइ कमीशन से एक एप्लीकेशन फॉर्म लेता आवे। हम कल ही
अप्लाई कर देंगे। अब मैं वापस इंडियन हो सकता हूँ।" बाउजी बस
बोले जा रहे थे। सरोज एकटक उन्हें देखे जा रही थी। विधि और
अगस्त्य भी मोटी-मोटी आँखों में अपने दादा जी को देखे जा रहे
थे।
सरोज बाउजी के साथ लिविंग रूम
तक चली गई। बाउजी के शरीर का रक्त प्रवाह तेज़ होता जा रहा था,
"तू खुद ही सुन लै पुत्तर। अभी मेन न्यूज़ दोबारा आएगी।" जब तक
मुख्य समाचार में सरोज ने सुन नहीं लिया कि बाउजी ने ठीक सुना
है, तब तक वह बाउजी के चेहरे पर बदलते भाव पढ़ती रही। उसे
इंद्रेश पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसने बाउजी को फ़िज़ूल की
मुसीबत में डाल दिया है। अगर बाउजी को वीज़ा लेने जाना होता था
तो अपने आप ही जा कर ले आते थे। इसी बहाने अपने आप को बिज़ी भी
रखते थे।
इंद्रेश शाम को घर आया।
"पुत्तर तू फ़ारम लै आया?" बाउजी की आँखों में उम्मीद की
नदी-सी बह रही थी।
"बाउजी, जब तक मेरा आफ़िस बंद होता है तब तक हाइ कमीशन के
काउंटर बंद हो जाते हैं। मैं आज ही त्रिलोक शर्मा को फ़ोन करता
हूँ। वो वहाँ के वीज़ा सेक्शन में है। उसे सही सिचुएशन मालूम
होगी।"
बातचीत, टी.वी., टेलिफ़ोन या भोजन गोपालदास जी का मन किसी भी
चीज़ में नहीं लग रहा था। बस एक ही इच्छा हो रही थी कि इंद्रेश
किसी भी तरह त्रिलोक शर्मा से बात कर ले। उनकी आँखों में बस एक
ही चाह थी - दोहरी नागरिकता। बैठे-बैठे सपना देख रहे थे।
इंद्रेश टेलिफ़ोन पर बात कर
रहा था और भावों का सूचकांक बाउजी के चेहरे पर दिखाई दे रहा
था।
"बाउजी, त्रिलोक कह रहा है कि अभी तो सिर्फ़ प्रधानमंत्री ने
घोषणा की है, बस। अभी यह बिल बना कर पार्लियामेंट में पेश
होगा, पास होगा, फिर उस पर राष्ट्रपति के दस्तख़त होंगे, फिर
एक्ट बनेगा तब जा के लागू होगा फिर उसके फ़ार्म वगैरह बनेंगे
तब कहीं जा कर आम आदमी तक पहुँचेगी दोहरी नागरिकता। फिलहाल तो
यह बस प्रवासियों को खुश करने भर का ड्रामा लगता है।"
"यार ये कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री नहीं है। यह करेक्टर वाला
बंदा है। आर.एस.एस. का आदमी है। झूठ नहीं बोल सकदा। त्रिलोके
को कह किसी तरह दिल्ली से पता लगवाए।"
"बाउजी, पॉलीटीशन सभी एक से होते हैं। आज़ादी के बाद सभी का एक
ही उद्देश्य बचा है। बस लूट लो जितना लूट सको। किसी को भी जनता
की परवाह नहीं।"
गोपालदास जी को इस समय
राजनीतिज्ञों के चरित्र पर बहस करने में कोई रुचि नहीं थी। रात
भर परेशान रहे। बस बिस्तर पर करवटें बदलते रहे। सुबह उठे,
दिनचर्या से निवृत्त हुए, नाश्ता किया, तैयार हुए और निकल
पड़े। बेकरलू लाइन ले कर सीधे ऑक्सफर्ड सर्कस, वहीं से सेंट्रल
लाइन ले कर होबर्न अंडरग्राउंड स्टेशन पहुँचे। होबर्न को वे
हमेशा होलबोर्न ही कहते हैं। उसके स्पैलिंग ही ऐसे हैं।
अंग्रेज़ी के साइलेंट लेटर हमेशा ही उनको परेशान करते हैं।
होबर्न से बाहर निकल कर बाएँ को मुड़े और आहिस्ता-आहिस्ता चल
दिए भारतीय उच्चायोग भवन की ओर। उनके लिए घर बैठे रह पाना संभव
नहीं था। वे स्वयं पता करना चाहते थे कि प्रधानमंत्री ने क्या
कहा है।
सामने बी.बी.सी. का बुश हाउस
दिखाई दिया। आल्डविच इलाके में बस यही दो भवन हैं जिनसे
गोपालदास जी को दिली लगाव है। एक तो बी.बी.सी. का बुश हाउस और
दूसरा भारत भवन। बी.बी.सी. देख कर गोपालदास जी को वो सभी महान
समाचार वाचक याद आ जाते थे जिनकी आवाज़ सुनने के लिए वे अपने
रेडियो पर शार्ट वेव पर बी.बी.सी. सेट करते परेशान होते रहते
थे। कभी भी बहुत साफ़ नहीं आता था लेकिन बात साफ़ करता था। ठीक
उसी ही तरह गोपालदास जी भी बात साफ़ और खरी करते हैं चाहे
सामने वाले को पसंद आए या न आए।
भारत भवन के बाहर हमेशा की
तरह भीड़ लगी हुई थी। बाहर की खिड़की वाले से नमस्कार करते हुए
एक टोकन ले कर हाल के अंदर जा पहुँचे। पहले दिल किया कि
त्रिलोक शर्मा को फ़ोन कर लेते। फिर ख़याल आया कि इंद्रेश
नाराज़ हो जाएगा। बस सीधे पूछताछ वाले काउंटर पर जा पहुँचे। और
उससे सीधे-सीधे दोहरी नागरिकता का फ़ार्म माँग लिया। सामने एक
युवा-सी लड़की बैठी थी। बात अंग्रेज़ी में करती थी या फिर
अंग्रेज़ीनुमा हिंदी में। "सॉरी, हमारे पास ऐसा कोई फ़ार्म
नहीं है। कहीं आप पी.आई.ओ. फ़ार्म की बात तो नहीं कर रहे?"
"जी नहीं, कल ही प्रधानमंत्री ने प्रवासी दिवस समारोह में ऐलान
कीता है कि अब इंग्लैंड के हिंदुस्तानी दोनों देशों की
नागरिकता रख सकते हैं। मैं उसकी बात कर रहा हूँ।
वह लड़की गड़बड़ा गई, 'एक्सक्यूज़ मी' कह कर अपने अफ़सर को
बुलाने चली गई। उसका अफ़सर भारतीय था। सरदार दिलीप सिंह,
"देखिए त्रिखा साहब, पालिटिकल स्टेटमेंट और सरकारी कार्यवाही
में बहुत फ़र्क होता है। दिल्ली में प्रधानमंत्री ने एक पॉलिसी
स्टेटमेंट दी है, बस। अब उस पर काम शुरू होते-होते कोई छ: सात
महीने तो लग ही जाएँगे। हमारे स्टाफ़ तक तो अभी यह ख़बर भी
नहीं पहुँची कि प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई स्टेटमेंट भी दी है।"
दिलीप सिंह ने भी वही बात दोहरा दी जो त्रिलोक शर्मा ने कही
थी। |