निराश से गोपालदास जी भारी कदमों से बाहर आ गए। भारत भवन से होबर्न तक का जो रास्ता आते समय पाँच-सात मिनट में तय हो गया था वही अब बीस मिनट से अधिक ले चुका था। होबर्न स्टेशन अचानक इतनी दूर कहाँ चला गया?

गोपालदास जी वापस हैरो एँड वील्डस्टोन स्टेशन से सीधे घर न जा कर लायब्रेरी की तरफ़ चल दिए। वहाँ मधोक साहब और बधवार जी मिल गए। "भाई लोगों, आपने डयूएल नेशनेलिटी वाली ख़बर पढ़ी है क्या?"
ख़बर दोनों ने पढ़ ली थी। मधोक साहब का अपना ही अंदाज़ था, "त्रिखा जी, मैंने तो अभी तीन महीने पहले ही पाँच साल के वीज़े पर सौ पाउंड खरचे हैं। मुझे तो कोई जल्दी पड़ी नहीं है दोहरी नागरिकता की। जब लागू होगी तब देखा जाएगा। अभी से क्यों दिमाग़ ख़राब करूँ। फिर अपना अभी वहाँ कोई प्रापर्टी वगैरह ख़रीदने का भी कोई प्रोग्राम है नहीं।"

बधवार साहब त्रिखा जी की मानसिकता से परिचित थे, "मैं समझता हूँ त्रिखा जी कि आपके लिए दोहरी नागरिकता के अर्थ कुछ और ही हैं। लेकिन आप तो जानते ही हैं कि अपनी भारतीय सरकार हर काम में कितना टाइम लेती है। पचास साल में हिंदी को भारत की राजभाषा नहीं बना पाईं। कहीं यह दोहरी नागरिकता वाला मामला भी पचास साला योजना न हो।"
"मेरे हिसाब से तो यह बस प्रवासियों को खुश करने की एक भोंडी कोशिश से ज़्यादा कुछ भी नहीं है।" यह दवे साहब थे। जो पास ही बैठे तीनों की बातें सुन रहे थे।

दुखी मन लिए गोपालदास जी घर वापस आ गए। सोच थी कि पीछा नहीं छोड़ रही थी। एक, दो, तीन, चार, आठ महीने बीत चुके थे लेकिन दोहरी नागरिकता अभी तक देहरी लाँघ कर त्रिखा जी के घर नहीं पहुँच पाई थी। बीतते-बीतते क़रीब एक वर्ष ही बीत गया। दूसरा प्रवासी दिवस भी आ पहुँचा। पुत्र से बात करके भारत जाने का कार्यक्रम जनवरी महीने का ही बनवा लिया। सोचते थे कि जब प्रवासी दिवस मनाया जा रहा होगा उसी समय शायद कुछ नई बात निकल आए और उनकी बात बन जाए।

गोपालदास जी पहली बार भारत के लिए वीज़ा लेने जा रहे थे। बहुत शर्म आ रही थी। सुबह नाश्ते के समय इंद्रेश की ओर देखा, "पुत्तर जी, क्या तुम त्रिलोक को कह कर मेरे लिए वीज़ा नहीं लगवा सकते। भारत के लिए विज़ा अप्लाई करने में बहुत अजीब-सा लग रहा है।"
इंद्रेश ने सरोज को कह दिया कि इंटरनेट से आज फार्म डाउनलोड करके बाउजी से भरवा ले।
" पुत्तर वीज़ा सिर्फ़ सिंगल ऐंट्री ही अप्लाई करना है। दूसरे ट्रिप तक तो दोहरी नागरिकता लागू हो ही जाएगी।"
इंद्रेश मुस्करा भर दिया, "बाउजी आप भी बस।"

भारत में बाउजी ने सोचा कि प्रवासी दिवस में शामिल हो आएँ। लेकिन उनका मन नहीं मान रहा था कि दो सौ डॉलर की फ़ीस दे कर अपने देश में प्रवासी दिवस में शामिल हों। फिर वे रिपोर्ट पढ़ते रहे कि सारा का सारा प्रवासी दिवस अंग्रेज़ी में मनाया जा रहा है। हिंदी बेचारी वहीं खड़ी है जहाँ बधवार जी बता रहे थे।

प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन पर एलान किया कि दोहरी नागरिकता अब सोलह देशों के भारतीयों को दी जा सकेगी। बाउजी सोच रहे थे कि जब सोलह देशों की बात की जा रही है तो जिनके लिए पहले वर्ष में घोषणा की जा चुकी है, उनको तो अवश्य ही इस वर्ष मिल जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने के बहुत प्रयास किए। लेकिन जनता के प्रतिनिधियों को रू-ब-रू मिल पाना क्या इतना आसान होता है।

गोपालदास जी विदेश मंत्रालय के दफ़्तर के भी चक्कर लगाते रहे। श्रीवास्तव जी और स्वरूप सिंह से मुलाक़ात की। मुस्कुराहटें तो मिलीं, दोहरी नागरिकता बस दूर खड़ी थी दूर ही रही। और गोपालदास जी वापस अपने देश आ गए। अपने देश यानी लंदन। अब वो इसी देश के नागरिक थे।
वे वापस आए और भारत में सरकार बदल गई। वही कांग्रेस वापस जिससे गोपालदास जी को शिकायत रहती थी। एक तो यह मीडिया भी गोपालदास जी को आराम से नहीं जीने देता। कभी भी कुछ भी छापता रहता है। इंटरनेट से सरोज ही एक ख़बर निकाल कर लाई थी कि कांग्रेस सरकार ने एक प्रवासी मंत्रालय बना दिया है। गोपालदास जी को विश्वास हो चला था कि जब सरकार ने मंत्रालय तक बना डाला है तो दोहरी नागरिकता ज़्यादा दूर नहीं हो सकती। उनका उत्साह दोगुना बढ़ गया था। लेकिन उनके मित्र अब उनसे दूर ही भागते थे।

"लो वो बोर फिर आ गया। अब सारा टाइम दोहरी नागरिकता की भेंट चढ़ जाएगा।"
"यार इस आदमी को और कोई काम है या नहीं, बस सारा वक्त यही सोचता रहता है। पागल हो जाएगा कुछ दिनों में।"
"ये हो जाएगा क्या होता है जी। हो चुका है। इस तरह की बातें पागल ही कर सकते हैं।"

बस एक बधवार जी थे जो गोपालदास जी की मनोदशा को समझ पा रहे थे। वही उनसे बात भी करते थे और अपनी राय भी देते रहते थे, "गोपालदास जी, आज अख़बार में ख़बर आई है कि प्रवासी मंत्री ने आस्ट्रेलिया में दोहरी नागरिकता देने के फ़ार्म अपने हाथों से बाँट कर दोहरी नागरिकता की शुरुआत कर दी है। यह देखिए, अख़बार आपके सामने हैं।"

गोपालदास जी ने अख़बार देखा, समाचार देखा और अख़बार वहीं रख दिया। और घर की ओर चल पड़े। उनके साथी हैरान कि इतनी बड़ी ख़बर और गोपालदास जी बिना कोई टिप्पणी किए चल दिए।

गोपालदास जी पहले सीधे भारतीय कार्नर शॉप की तरफ़ गए। वहाँ जा कर अख़बार ख़रीदा और उछलते मन को उस अख़बार का सहारा देते हुए घर की ओर चल दिए। अपने कमरे में जा कर पूरा समाचार ठीक से पढ़ा। उम्मीद जागी कि अब अशोक के शेर वाला मेरा नीला पासपोर्ट एक बार फिर से जीवित हो उठेगा। केवल पासपोर्ट का रंग नीले से लाल होने पर इंसान के भीतर कितनी जद्दोजहद शुरू हो जाती है। आज उन्होंने घर में किसी से बात नहीं की। रात भर करवटें बदलते रहे। सुबह होने का इंतज़ार, बस यही कर सकते थे, करते रहे। सुबह का नाश्ता करने के बाद एक बार फिर भारतीय उच्चायोग के दरवाज़े पर खड़े थे।

अंदर का दृश्य ठीक वैसा ही था जैसा कि पिछली बार। अबकी बार उन्होंने फ़ार्म माँगने की जगह अपना अख़बार काउंटर क्लर्क के सामने रख दिया। काउंटर पर बैठी महिला परेशान-सी हो उठी। पिछली मुलाक़ात उसे याद आ गई। लेकिन आज गोपालदास जी का गुस्सा बहुत उग्र होता जा रहा था, "आप समझती क्या हैं अपने आपको। यहाँ आपका ही मंत्री आस्ट्रेलिया में जा कर फ़ार्म बाँट रहा है, उसकी फ़ोटो तक छपी है और आप कहती हैं कि आपके पास अबतक फ़ार्म नहीं आए हैं। बुलाइए अपने अफ़सर को, कराइए मेरी बात। यह भला कोई तरीक़ा हुआ कि दो साल तक प्रधानमंत्री कहते रहे कि दोहरी नागरिकता दी जाएगी। अब प्रवासी मंत्री फ़ार्म बाँटता साफ़ दिखाई दे रहा है और आप कहती हैं कि आपने दिल्ली से क्लैरिफ़िकेशन माँगा है। आप लोग काम करना ही नहीं चाहते। ज़रूर आप लोग कोई नया अलाउंस माँग रहे होंगे। यह ब्यूरोक्रेसी की वजह से कभी कोई काम हो ही नहीं सकता। हमारी दोहरी नागरिकता के रास्ते के सबसे बड़े रोड़े आप लोग ही हैं।"

झगड़े की आवाज़ सुन कर त्रिलोक शर्मा भी बाहर आ गए। गोपालदास जी को देख कर वे हैरान भी हुए। काउंटरों के ज़रिए ही बाहर चले आए और गोपालदास जी को सुरक्षा कर्मियों के धकियाने से बचा लिया। समझाते हुए घर जाने को कहा, "आप चिंता न करें बाउजी, मैं खुद ही इंद्रेश से बात कर लूँगा।"
गोपालदास जी हाइ कमीशन की इमारत से बाहर आ गए। अपने आप को बहुत पराया-सा महसूस कर रहे थे। उनके कदम उन्हें बिना बताए ही वाटरलू पुल की तरफ़ ले गए। नीचे टेम्स का पानी अपनी रफ़्तार से बहता जा रहा था। हाइ टाइड थी इसलिए पानी भी काफ़ी था। सूर्य सिर पर चमक रहा था और हवा तेज़ चल रही थी। गोपालदास जी की आँखों में से पानी बहने लगा। वे तय नहीं कर पा रहे थे कि यह पानी नमकीन है बस पानी है। मन में एक पल के लिए आया कि इस पुल से नीचे छलांग लगा कर इस टंटे को ख़तम ही कर दें।

वाटरलू स्टेशन से ही बेकरलू ट्यूब ले ली। घर पहुँचे। सरोज को देख कर सकपका गए। कहीं त्रिलोक ने फ़ोन न कर दिया हो। सरोज ने बिना कुछ पूछे चाय बना कर आगे रख दी। बिस्किट के साथ चाय पी। अपने कमरे में चले गए। इंद्रेश शाम को घर लौटा, "सरोज, बाउजी की तबीयत शायद ज़्यादा बिगड़ती जा रही है। आज हाइ कमीशन में जा कर नाटक कर आए हैं। त्रिलोक का फ़ोन आया था मुझे।"
"क्यों, ऐसा क्या कर आए?" सरोज परेशान हो उठी, "देखिए आज कुछ कहिएगा मत। हाइ कमीशन से बहुत परेशान लौटे हैं। मुझे तो पता नहीं था कि वहाँ गए थे। लेकिन चेहरा देख कर मुझे लगा कि बहुत निराश दिखाई दे रहे हैं। आप कल समझा दीजिएगा। डिनर टेबल पर कुछ मत कहिएगा।"

विधि बाउजी को बुलाने गई तो कमरे में अँधेरा था। टेलिविजन पर स्टार न्यूज़ चल रही थी। उसने आवाज़ दी लेकिन उसकी पतली-सी आवाज़ टी.वी. की आवाज़ में दब गई। उसने बत्ती जलाई। देखा कि बाउजी एकटक छत को देखे जा रहे थे।

वह घबरा कर बाहर आ गई और ममी पापा को बताया। इंद्रेश और सरोज दोनों एक साथ कमरे में आए। बाउजी को आवाज़ दी। गोपालदास जी एकटक छत को देखे जा रहे थे। उनके दाएँ हाथ में लाल रंग की ब्रिटिश पासपोर्ट था और बाएँ हाथ में नीले रंग का भारतीय पासपोर्ट। उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी जहाँ के लिए इन पासपोर्टों की ज़रूरत नहीं थी।

स्टार न्यूज पर नए प्रधानमंत्री घोषणा कर रहे थे कि अब विदेश में बसे सभी भारतीयों को दोहरी नागरिकता प्रदान की जाएगी।

पृष्ठ- . . .

१ जनवरी २००६