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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
यू.के. से तेजेंद्र शर्मा की कहानी— मलबे की मालकिन


समीर ने यह क्या कह दिया!
एक ज़लज़ला, एक तूफ़ान मेरे दिलो दिमाग़ को लस्त-पस्त कर गया है। मेरे पूरे जीवन की तपस्या जैसे एक क्षण में भंग हो गई है। एक सूखे पत्ते की तरह धराशाई होकर बिखर गई हूँ मैं। क्या समीर मेरे जीवन के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके एक वाक्य ने मेरे पूरे जीवन को खंडित कर दिया है? फिर मेरा जीवन सिर्फ़ मेरा तो नहीं है। नीलिमा, मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नीलिमा को अलग करके, मैं अपने जीवन के बारे में सोच भी कैसे सकती हूँ? नीलिमा का जन्म ही तो मेरे वर्तमान का सबसे अहम कारण है। उससे पहले तो मैं अत्याचार सहने की आदी-सी हो गई थी। नीलिमा ने ही तो मुझे एक नई शक्ति दी थी। मुझे अहसास करवाया था कि मैं भी एक जीती जागती औरत हूँ, कोई राह में पड़ा पत्थर नहीं कि इधर से उधर ठोकरें खाती फिरूँ।

एक भाई की चार चिंताएँ और उनमें मैं माता-पिता की चौथी चिंता थी। मुझसे पहले की तीन चिंताओं से मुक्त होते-होते पिता की कमर टेढ़ी हो चुकी थी। मैं थी कि पढ़ना चाहती थी। चिंता दर चिंता! लड़की यदि अधिक पढ़-लिख गई, तो लड़का कहाँ से मिलेगा! अपनी बिरादरी में तो ज़्यादा पढ़े-लिखे लड़के ढूँढे से नहीं मिलते।
कहते हैं ढूँढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं। परन्तु भगवान के बनाए हुए इंसान! इंसान न भी मिले तो क्या फ़र्क पड़ता है?

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