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कभी अपनी नाक को चुटकी से पकड़ पकड़ कर ऊँचा और पतला करती या कभी आँखें खींच खींच कर और बड़ा करने का प्रयास करती। और नहीं तो साबुन से रगड़ रगड़ कर मुँह ही घिसना शुरू कर देती। फटे तौलिये से, जिसके रोंए पोंछ पोंछ कर झड़ चुके थे, जूते की तरह चमकाने की कोशिश करती। इस सारी प्रक्रिया से थक जाती तो गहरी साँस लेते हुए धम से पलंग पर गिर जाती।
बेचारा पलंग – इसे पलंग कहना इलज़ाम ही माना जा सकता था। हाँ इसे झिलंगा कहा जा सकता था। उसके लेटते ही पलंग ज़मीन से जा लगता। शायद अम्मा ने पलंग भी शम्मों के जन्म के आसपास ही ख़रीदा होगा। बेचारा अभी भी झकोले दे रहा था।
शम्मों घन्टों बेसुध सी पड़ी रहती और बेचैन मां को इधर से उधर चलता फिरता देखती रहती। इसी तरह पड़े पड़े आंख लग जाती जब तक कि मच्छर आक्रमण न कर देते। सारे मच्छर एक सुर में भुनभुनाते हुए जब हमला करते तो कभी अपने कानों पर हाथ मारती या कभी दुपट्टे से मुँह ढाँपने का प्रयास करती। दुपट्टे के बड़े बड़े सुराख़ों से तांक झाँक करते हुए मच्छर एक बार फिर शम्मों को बेचैन कर देते।
काश! उसके घूंघट से भी कोई ऐसे ही ताक-झांक करता। वह शरमाती, लजाती, इक़रार के अन्दाज़ में इन्कार करती और फिर..... फिर अपने आपको किसी को सौंप देती। किन्तु वह कब आएगा? क्या उसके सपने बिना किसी राजकुमार के आए ही टूट जाएँगे?
कब तक इसी तरह इसी घर में अम्मा के बच्चों की देखभाल करती रहेगी? वह गहरी और बेफ़िक्र नींद भी न सो पाती क्योंकि अम्मा से अधिक स्वयं उसको अपने छोटे भाई बहनों का ख़्याल रहता। इसी तरह के हज़ारों ख़्यालों से उलझती रहती और न जाने कब नींद की गोद में पहुँच जाती। दिन भर बैल की तरह काम करके शरीर फोड़े की तरह दुख रहा होता। सोने में हलके हलके कराहने की आवाज़ आती रहती। आनन फ़ानन में मुर्गों की बांग मस्जिद के मुल्लाओं से मुक़ाबला करने लगती और शम्मों और ज़ोर से मुँह ढांप लेती; कानों को तकिए से दबा कर बन्द करने की नाकाम कोशिश करती। किन्तु तकिया भी पैबंदों की ज़्यादती और रुई की गुठलियों के कारण कानों को चुभता।
अम्मा की आवाज़ कानों में नश्तर की तरह चुभती, "उठ शम्मो बेटी! गुड्डु को ग़ुसलख़ाने ले जा, वरना सुबह होते होते बिस्तर भिगो देगा।" शम्मो लेटे लेटे सोचती कैसा बिस्तर? क्या एक बोसीदा चादर जो सुराख़ों की कसरत से जाली बन गई है, चादर कहलाए जाने कि हक़दार भी है? अगर गुड्डु भिगोने का प्रयास भी करे तो भिगो नहीं पाएगा, क्योंकि सब कुछ छन जाएगा। अम्मा की आवाज़ फिर से आती, "अरे शम्मों, उठ न बेटी, अभी तक पड़ी सोए जा रही है! सूरज सर पर चढ़ा आ रहा है, और तू है कि तेरी नींद ही नहीं टूटती। तेरी उम्र में तो तेरे समेत मेरे चार बच्चे हो चुके थे और अल्लाह रक्खे, आख़िरी दो तो तेरे ही लगते हैं। अब उठ भी जा बेटी, उठ जा!"
शम्मों यह सोचती रहती कि अम्मा ने अपनी शादी तो मज़े से कम उम्र में रचा ली; और अब मेरी बारी आयी है तो इन्हें कोई वर ही नहीं मिलता। फिर वह अपने पक्के रंग को दोष देने लगती। इसमें अम्मा का क्या दोष, यह तो अल्लाह की मर्ज़ी है।
बेचारी शम्मों! उसे क्या मालूम कि उसके सलोने हुस्न में जो कशिश है वह दुनियाँ के किसी और रंग में नहीं है। इस कृष्ण रंग में वह क़ूवत है जो मुहब्बत की गर्मी और दूसरों की मुसीबतें जज़्ब कर लेने की ताक़त रखता है। किन्तु इसके लिये राधा और मीरा जैसी मन की आँखों की ज़रूरत पड़ती है। हर आने वाला शम्मो की ऊपरी कमज़ोरियों को देखता; उसके मन के भीतर की थाह लेने की ज़रूरत महसूस नहीं करता।
बेचारी शम्मो! जब रात गए लेटती, कोठरी की छत से चूती बारिश की फुहारें उसको भिगोती रहती। वह बिस्तर के हर कोने, हर पट्टी में पनाह ले कर थक जाती तो उसके गले से गुनगुनाहट उभरने लगती –
अम्मा मेरे भइया को भेजो री कि सावन आया
अम्मा मेरे भइया को भेजो री कि सावन आया
कि सावन आया
कि सावन आया
कि सावन.......
और फिर पलंग की बेढंगी खुरदरी मोटी सी पट्टी से लिपट कर नींद के आग़ोश में गुम हो जाती। जवानी की नींद भी तो कितनी मस्त होती है। तमाम दुःख और दर्द सिमट कर नींद की भेंट चढ़ जाते हैं। अम्मा को शम्मों की बेसुध जवान नींद से खासी चिढ़ थी। पर अम्मा जैसे अपनी जवानी की नींद भूल ही गई थी। इसी नींद ने तो बच्चों की एक फ़ौज खड़ी कर दी थी।
अब्बा ने तो कभी अम्मा को बेसुध सोने का ताना नहीं दिया। वह तो ख़ुश होते थे जब अम्मा हाथ पैर ढीले छोड़ कर दुपट्टे की गठरी बना कर सिर के नीचे रख लेती और सो रहती। शरीर का हर अंग अब्बा को निमन्त्रण दे रहा होता। मां झिलंगे पलंग पर पड़ी बड़े सुर में ख़र्राटे ले रही होती और चंद महीनों बाद ही हम बड़े भाई बहनों को ख़ुशख़बरी सुनाती, "सुनो बच्चो, तुम्हारा नन्हा मुन्ना सा भाई या बहन आने वाला है। अब मुझे परेशान न करना और अपने तमाम काम आप ही करने की कोशिश करना, क्योंकि मुझसे अब नहीं होते यह काम काज। काम करूँ या बच्चे पैदा करूँ? मुझे गाय भैंस समझ लिया है तुम्हारे बाप ने! हर साल गाभिन कर देता है, जानवरों की तरह।"
शम्मो सोचती अम्मा को क्या फ़र्क पड़ता है। मज़े उड़ाती है आप और रोब मारती है हम पर। सारा काम तो मुझे ही संभालना पड़ता है। यह भी नहीं कि बच्चे सुन्दर ही पैदा कर दे, कि किसी राह चलते की हम पर नज़र पड़े तो मुस्कुरा ही दे। हम चार दिन तो उसको सोच सोच कर ख़ुश हो लेते। उसके ख़्वाब देख लिया करते। फ़िल्मी गाना गाते समय उसी से सब कुछ जोड़ लिया करते। यह सोचते ही शम्मों के शरीर में रोमांच हो उठा।
ऐसा लगता जैसे शम्मों बेचारी पर जवानी तो आई ही नहीं। सीधे बचपन से उठ कर प्रौढ़ा बन गई। जैसे किसी ज़हीन बच्चे को डबल प्रमोशन दे दी गई हो, और बच्चा अपने साथियों से बिछड़ जाने के दुःख में न तो रो सके और न ही आगे बढ़ जाने की ख़ुशी में हँस सके। ग़रीब की ज़िन्दगी भी कुछ यों ही आगे बढ़ती जाती है।
शम्मो को कभी समझ नहीं आया कि वह अपनी छोटी बहन रानी का क्या करे। वह उससे बस एक ही साल छोटी है। लेकिन उसके शरीर का उठान शम्मों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा ज़रख़ेज़, रंग ज़रा खिलता हुआ पर नक़्श वही नकटे, चिपटें। उसकी अदाएँ निराली थीं – न किसी से डर, न ख़ौफ़। बिन्दास – छोटी छोटी आँखों को टेढ़ी करके बात किया करती; बात बात पर खिलखिला कर हँस देती; और हँसते हुए झूल सी जाती। वो जो कपड़े पहने होती, ऊँचे नीचे, बेमेल से, कहीं कहीं से सिलाई खुले हुए उन कपड़ों से जवानी झांक रही होती। वह एक ऐसी बेरी थी जिसके कारण घर में कंकरों की आमद बनी रहती। मुहल्ले के हर लड़के को रानी जानती थी, हर लड़का उसका दोस्त था, उसका दीवाना था।
शम्मो इस मामले में भी उसकी मां का किरदार निभाती थी। ऊँच-नीच समझाती। पर रानी की चंचल तबीयत को कौन लगाम देता ? पारे की तरह अस्थिर और चंचल! घर के भीतर तो घुटन का माहौल तनाव पैदा करता। मां बेटियाँ चुप चुप, परेशान परेशान, हर समय लेक्चर। फ़िक्र यही रहती कि अगले वक़्त पकेगा क्या। रानी को यह सब बेकार लगता - बोरिंग! वह तो एक छलावा थी, कभी यहाँ कभी वहाँ। किस समय किसकी झुग्गी में बैठी बातें बघार रहीं होगी, यह मालूम करना मुश्किल हो जाता।
अम्मा कह कह कर थक गई थी, "रानी, तू नाक कटाएगी - नाक!" रानी एक नहीं सुनती। सारा दिन लड़के लड़कियों के साथ बाहर घूमना – खाना और खेलना, बस यही उसकी दिनचर्या थी। बेफ़िक्री की वजह से रंग निखरता जा रहा था और बदन गदराने लगा था। हफ़्तों पहले धुले बाल भी उलझे उलझे, काले काले, चमकदार हुए रहते थे। बदबू से क्या होता है ? बदबू भी तो जवान थी। जवानी की बदबू को गली के लड़के ख़ूब अच्छी तरह समझते थे। रानी का तो काम ही था हर वक़्त बोलते रहना – फ़िल्मी डायलॉग भी बोल लेती और गाने गाती लहक लहक कर।
अम्मा का पेट अकसर फूला और जी कांपता रहता कि वह दूसरी लड़कियों को कैसे संभालेगी। अगर रानी को लगाम न लगा सकी तो होगा क्या ? चुन्नी – मुन्नी तो पैदा होते ही पोलियो की मार खा गईं। आजतक घिसट घिसट कर चल लेती हैं, तो वो भी अल्लाह मियाँ की कृपा ही है। वर्ना इन चारों टांगों की भी देखभाल करनी पड़ती। कौन देता पहरा इतनी सारी लड़कियों की किस्मत पर ? लड़कियों के तो देखते ही देखते पंख निकल आते हैं – चिड़ियों की तरह आज़ाद उड़ना चाहती हैं। पता भी नहीं चलता कि कब और क्या हो गया। इन अभागिनों को भगवान ने भाई भी दिया तो एक ही। वह अभागा तो अपनी उम्र से ज़्यादा ही छोटा और मासूम है। उस पर तो कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं डाली जा सकती। और बेचारी अम्मा! उसके पास समय ही कहाँ बचता था – बच्चों की भूख मिटाती या उनकी देखभाल करती ? अब्बा तो बच्चों की पलटन खड़ी कर, अम्मा के हवाले कर ख़ुद जन्नत में जाकर घर बसा लिया। अम्मा को ज़िन्दगी और मौत के बीच हिचकोले खाने के लिये अकेला छोड़ गये। अम्मा किसको देखती! किस किस का ख़्याल रखती ? हालांकि सामने खड़ी फ़ौज के सभी सिपाही उसकी अपनी कोख के जाये थे।
रानी बस्ती वालों को हैरान किये रखती थी। रोज़ाना उसकी शिकायतें सुन सुन अम्मा परेशान रहती। कई बार तो कह भी देती, "अगर तू न पैदा हुई होती, कलमुही, तो दुनियाँ में क्या कमी रह जाती ?" वैसे किसी न किसी समय तो अम्मा अपनी सभी बेटियों के बारे में यही सोचती। उसका पूरा जीवन अपने बेटे पर ही केन्द्रित था। बच्चियाँ! करें भी तो क्या? क्या पढ़ाई करें ? क्या उम्मीद रखें इस बस्ती के स्कूलों से? स्कूल तो वैसे ही परेशान बच्चों का जमघट लगते थे। ऊपर से अध्यापक बच्चों से भी अधिक परेशान और दुःखी लगते। उनके चेहरों पर चिन्ता और उलझनों के लक़ीरें साफ़ दिखाई देती थीं। शायद उनके अपने घरों की भी वही समस्या थी; फिर बेचारे बच्चों को क्या ख़ाक पढ़ाते !
रानी बता रही थी कि हिसाब की मिस का चक्कर भूगोल के टीचर से चल रहा है। यह सुन कर अम्मा ने सिर पकड़ लिया और रानी की ख़ूब पिटाई लगाई थी, "करमजली, अपने उस्तादों के बारे में ऐसी ऊल-जलूल बातें नहीं करते – अरे वो तो अल्लाह के बन्दे होते हैं। पर अम्मा को क्या मालूम कि हर घर में एक शम्मो बसती है। चक्कर चला कर शायद हिसाब वाली मिस अपना हिसाब चुकाने का प्रयास कर रही हो। वर्ना ग़रीब की लड़कियों का जोड़ा तो शायद भगवान के यहाँ ही बैठा रह जाता है; और लड़कियाँ बैठे बैठे गीली लकड़ियों की तरह सुलगती रहती हैं।
रानी ने अपनी इन हरकतों से कई जोड़े बनवाए और कई बनते जोड़े टूट भी गए। छेड़- छाड़ उसकी आदत थी। जहाँ किसी लड़के को किसी लड़की से बात करते देखा और ले उड़ी। सारे मुहल्ले में आजकल के पत्रकारों की तरह झूठी सच्ची ख़बर आग की तरह फैला देती। जिस किसी के दिल में गुदगुदी न भी हुई होती, रानी की बातें सुन होने लगती। और ऐसा ही हुआ; बहुत दिनों बाद उस बस्ती में जवान लड़के लड़की का विवाह हुआ और हिसाब की 'मिस' भूगोल के 'सर' के साथ विदा हो गई। रानी को ख़ुशी हुई कि उसे अब दोनों विषयों को पढ़ने से छुटकारा मिल जाएगा। वैसे रानी को फ़र्क कहाँ पड़ता था. वह तो हर कक्षा में पीएच.डी. करके ही आगे बढ़ती। पंद्रह की हो गई थी, मगर किसी भी तरह बस तीसरी जमात में पहुँच पाई थी।
चंचल रानी एक शाम अम्मा से छेड़छाड़ करती रही कि अम्मा ने इतना दहेज जमा कर लिया है मगर लड़के ही नहीं मिलते। रानी थी बहुत तिग़ड़मी। बचपन से सारे मुहल्ले की इंस्पेक्शन करना उसका प्रिय शुग़ल था। घर घर के समाचार मालूम करना, फिर उनका प्रचार – वह अपनी ज़िम्मेदारी व कर्तव्य समझती थी। अम्मा को बताए बिना अंकल जी के यहाँ उसने बरतन मांजने की छोटी सी नौकरी कर ली थी। यों तो अंकल जी की आड़ में तो आजकल बहुत कुछ होने लगा था। सिर्फ़ अंकल जी कह देना होता था... बस! अंकल जी को पासपोर्ट मिल जाता था कहीं भी जाने का।
रानी को इतने पैसे मिल जाते थे कि चाट खा लेती, सुर्ख़ी ख़रीद लेती ; कभी मोटे मोटे गोल गोल होंठों को लाल लाल रंग लेती ; कभी नाख़ूनों की हदों से बाहर को फैली हुई ऊबड़ खाबड़ नेल पॉलिश पोते जवानों व बूढ़े मर्दों के इमान डगमगाती रहती। धड़ल्ले से घर घर की ख़बर व ख़ैरियत मालूम किया करती।
अंकलजी और आंटी जी दोनों ही उसके स्वभाव से बहुत ख़ुश रहते। मज़बूत बाज़ुओं से पतीलियाँ चमाचम चमका दिया करती। अंकल जी की आँखें उसको देख कर पतीलियों से भी कहीं अधिक चमक जातीं। आंटी जी रोज़-ब-रोज़ उसके काम बढ़ाती जातीं पर मज़दूरी न बढ़ातीं। बदले में रात की बासी रोटी पर दाल रख कर खाने को दे देतीं। रानी के लिये वही दाल मल्टी-विटामिन का काम करती। ऐसी निखरी जा रही थी कि दूसरी बहनें उसे सिन्ड्रेला समझ कर जलने लगी थीं।
एक दिन मौक़ा देख कर अंकल जी ने उसकी उम्र पूछ ही ली। साढ़े अट्ठारह साल! अंकल जी ने कुछ हिसाब लगाया। उंगलियों पर नहीं – मन ही मन। आँखें नचाईं और रानीके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, "तेरे घर में आइऩा है ?" रानी को आँखों के आइने में सब कुछ नज़र आ गया। ज़रा इतरा कर बोली, "अंकल जी मुझे आंटी जी बहुत अच्छी लगती हैं। कितनी जवान भी हैं। आपसे तो बहुत छोटी हैं।"
"अरे तो क्या हुआ? मर्द को उम्र से नहीं जाँचा जाता।"
"फिर कैसे जाँचा जाता है?" रानी ने ज़बान ऐंठा कर कहा, जैसे मजाक उड़ा रही हो।
अंकल जी लड़खड़ा गये। उम्र का अहसास होते ही बोल पड़े, "तुम्हारी कोई बड़ी बहन भी है क्या ?"
"हाँ, है तो.....! " रानी ने 'तो' को इतना लम्बा खींच दिया, और फिर छोटी छोटी काली काली आँखों से, जिनमें ये काजल बाहर को उबला पड़ रहा था, घुमा कर झपक कर टेढ़ी करते हुए दोबारा आवाज़ लगाई, "अंकल जी, बोलो न! कहाँ खो गए ? "
अंकल जी तो उलझ गए थे। खोए कहाँ थे ? रानी के कंधे पर रखा हाथ इतना हल्का पड़ गया था कि महसूस ही नहीं हो रहा था कि कहाँ गया उनका वह हाथ।
रानी ने सारे मुहल्ले में घूम घूम कर दोस्तियाँ बना बना कर और दोस्ती न निभा कर जो पीएच.डी. की थी – तजुरबे की पीएच.डी. – उस पर अंकल जी जैसे कई एक क़ुरबान किये जा सकते थे। ग़रीब लड़की जिन जिन राहों से जितनी मंज़िलें तय करती है, हर मंज़िल की अपनी एक कहानी होती है।
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