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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
यू.एस.ए. से अनिल प्रभा कुमार की कहानी घर


कॉलेज में साल का आख़िरी दिन था। विश्व - विद्यालय के अहाते में खूब सरगर्मी मची हुई थी। सलिल भी अपनी इमारत से नीचे उतर कर, मुख्य द्वार के साथ लगी पटरी पर अपना थोड़ा-सा सामान रख कर खड़ा हो गया। प्रतीक्षा कर रहा था अपनी माँ की । खीझ भी आ रही थी कि पता नहीं अपनी बड़ी-सी स्टेशन वैगन लेकर कहाँ अपनी धीमी-धीमी चाल से चला कर आ रही होगी। पर अन्दर ही अन्दर उसे अच्छा भी लग रहा था कि डैडी तो अन्य पिताओं के विपरीत इस वक्त नाइट-शिफ़्ट कर रहे होंगे पर माँ अकेली ही, हिम्मत करके. हनुमान चालीसा पढ़ती उसे लेने चल पड़ी होगी।

विद्यार्थियों का, उनके अभिभावकों का, सहायता के लिए आए मित्रों और भाई-बहनों का रेला-पेला तो बहुत था, फिर भी इतने हुजूम में भी, अपने जैसे देसी चेहरों को पहचान लेने की आँख में एक ख़ास दैवी शक्ति होती है।

"हाय सलीम" सलिल ने दूर से ही पुकारा।

सलीम ने वहीं खड़े -ख़ड़े पीछे मुड़ कर देखा । सलिल को पहचान कर वहीं से हाथ हिला दिया। कोई मुस्कराहट या उत्तेजना उसके चेहरे पर नहीं आई।

सलिल ही तेज़ क़दम फलाँगता उसके पास आ गया।

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