मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


अचानक कुछ आवाज़ें उस पर जैसे आक्रमण कर देती हैं। बच्चे की पीठ के नीचे पहले आहिस्ता से और फिर ज़ोर से हथेली टकराने की आवाज उसे सुनाई देती है। “डाक्टर... बच्चा रो नहीं रहा।” आवाज नर्स की है।... डाक्टर की बैचैनी की आवाज बिना कोई आवाज किये उसके दिल पर प्रहार कर रही है। प्रसव वेदना और आवाज सुन पाने की बेचैनी उसे बेहोशी की गोद में पहुँचा देते हैं।

तय हो गया कि उसकी पहली संतान अपने समय से एक सप्ताह पहले ही पैदा हो गई और संतान एक ‘ स्टिल बॉर्न ’ बेटा थी यानि कि मृत पुत्र। इला ने जो सपने अपने पति के लिये देखे थे... अपने परिवार और माँ बाप के लिये देखे थे, वे सब अचानक स्थिर हो गये थे। नीलेश नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी मृत बच्चे का शव देखे। उसके दिमाग़ पर सारी उम्र के लिये एक मृत तस्वीर चिपक जाए।

किन्तु इला यह कैसे सह पाती, “मैनें नौ महीने उसे पेट में रखा नीलेश। दिन में जागते हुए भी उसके सपने देखे। कमरे में हमेशा संगीत चलाए रखती थी जिससे उसकी आवाज भी मधुर हो जाए। उसमें संगीत की समझ पैदा हो जाए। उसके लिये एक एक ड्रेस, प्रैम, मोज़े, स्वैटर, जंपर, दूध की बोतल, बिब, नैपी.... खरीदने के लिये मदरकेयर के कितने चक्कर लगाए। कितनी बार मन ही मन उसकी शक्ल बनाई और उसे गोद में उठा कर प्यार किया। दिन दिन भर उल्टियाँ कीं... माँजी के सपनों को अपनी आँखों से देखा। तुम्हारे सीने पर अपना सिर रख कर ही तो उसका नाम भी रखा था। सोचो नीलेश... तुम मेरे प्रतीक को मुझे बिना दिखाए कैसे उसका अंतिम संस्कार करने की सोच सकते हो?”

अट्ठारह इंच लंबा, सात पाउण्ड का गोरा चिट्टा प्रतीक उसके सामने लाया गया। उसे देख कर वह पगला सी गई । उसके गोरे रंग पर भूरे बाल उसे अत्यंत ख़ूबसूरत बना रहे थे। भगवान इतना सुंदर पुतला बना कर उसमें जान फूँकनी कैसे भूल गया? इला के आँसू वहीं थम गये। वह एकटक प्रतीक को देखती रही। यह अन्याय नहीं तो और क्या है?

मगर पिछले चेक-अप के समय तो डॉक्टर ने बताया था कि बच्चा बिल्कुल नॉर्मल है... फिर अचानक!... यह सब कैसे हो गया? इला और नीलेश अपने जीवन में ख़ालीपन भरे वापिस घर पहुँच गये। इला की सबसे प्रिय सहेली यास्मीन ने प्रतीक के लिये एक नन्हा सा बेड भेंट किया था... उसे अपने बिस्तर के साथ लगभग सटा कर रखा था इला ने... परीक्षा में पूरी तरह से अनुत्तीर्ण होने जैसी भावनाएँ उसे परेशान कर रही थीं। वह नीलेश के कंधे पर सिर रख कर रोना चाह रही थी... नीलेश उसे हमेशां अपना ‘शीशम का पेड़ कहता है’ - ‘इंडियन रोजवुड’। नीलेश को उसके नाज़ुक क्षणों में हिम्मत देने वाली इला आज स्वयं टूट गई थी।
 
टूटी हुई इला के लिये सोने और जागने में जैसे कोई अंतर ही नहीं रह गया था। ‘मिल हिल’ में उसके घर के पीछे एक बड़ा सा पार्क है। हरियाली की कोई कमी नहीं। सुबह और शाम पंछियों के चहचहाने की आवाज़ें आती हैं। बुलबुल की मीठी आवाज इला के संगीत को नई ध्वनियाँ प्रदान करती है। ग़जलों की धुनें वह स्वयं बनाती है। मगर दो दिनों से जैसे पंछी भी चहचहाना भूल गये हैं। जैसे इला के साथ मिल कर प्रतीक का सोग मना रहे हों। नीलेश सोच रहा था कि इला को इस दुःख से बाहर लाए तो कैसे...

इला स्वयं डिप्रेशन में जाने से घबरा रही थी। प्रतीक का अट्ठारह इंच का शरीर उसकी सोच को मथे जा रहा था। आँखें, नाक, कान, मुँह सभी कुछ तो था... फिर कमी कहाँ रह गई? समझ पाना कोई आसान काम भी तो नहीं था। शीशम के पेड़ को जैसे दीमक लग गई थी। दीवार पर लगी घड़ी को देखती रहती। नीलेश की छुट्टी भी समाप्त होने वाली थी। समझ नहीं पा रहा था कि इला को इस स्थिति से उबारे तो कैसे।

वह सोच से बाहर नहीं आ पा रही थी। रह रह कर एक ही बात परेशान किये जा रही थी कि ग़लती कहाँ हो गई। उसने अपनी डिलीवरी से पहले एक महीने के अपने खान पान, व्यवहार, किये गये काम और दवाइयों का पूरा जायज़ा लिया।... शीशियाँ उलट पुलट कर देखीं। मेडिकल जर्नल पढ़ने शुरू किये। वह हैरान रह गई कि शराब पीने वाली और ड्रग लेने वाली औरतों की भी नॉर्मल डिलीवरी हो जाती है। फिर उससे क्या कसूर हो गया। इला का खाना पीना छूटता जा रहा था। बार बार एक ही सवाल उठ रहा था कि उसके साथ यह अन्याय क्यों हुआ। नीलेश के लिये जरूरी था कि इला को डाक्टर के पास ले जाया जाए।

रोजमर्रा के काम उसे याद ही नहीं रखने देते कि इला को डॉक्टर के पास ले जाना है। उधर इला बार बार भूल जाती थी कि उसे कब क्या काम करना है। ब्रिटेन में सभी काम स्वयं करने पड़ते हैं। मध्यवर्गीय घरों में नौकर रखना संभव नहीं हो पाता। नौकर जितनी पगार माँगता है उतने पैसे तो महीने के महीने मुश्किल से घर में आते हैं। पूरा घर जैसे स्टोर सा बनता जा रहा था। नीलेश की सहनशक्ति जवाब देती जा रही थी। इला की मित्र सुधा पूरा प्रयास कर रही थी कि हालात क़ाबू में आ जाएँ।

उनकी पड़ोसन क्रिस्टी का भी उनके घर आना जाना था। वह इला को देखते ही समस्या समझ गई, “नीलेश, तुम्हारी पत्नी में एँग्ज़ाइटी भरती जा रही है। वह बहुत जल्दी डिप्रेशन का शिकार हो जाएगी। इससे पहले कि हालात बिगड़ें, तुम अपनी पत्नी की काउंसलिंग करवाओ।”

“देखो क्रिस्टी, मुझे यह डिप्रेशन और एँग्ज़ाइटी जैसी सभी चीज़ें नाटक लगती हैं। यह बस अटेंशन पाने की भोण्डी कोशिश से ज़्यादा और कुछ भी नहीं। मुझे काउंसलिंग में कोई विश्वास नहीं। सब बकवास है, ढकोसला है।” नीलेश ने अपनी मन की बात क्रिस्टी तक पहुँचा दी थी।

मगर क्रिस्टी इतनी जल्दी से हार मानने वाली नहीं थी, “नीलेश, मैं इन हालात से गुजर चुकी हूँ। जब मेरे पिता की मौत हो गई थी, मुझे करीब एक साल भर लग गया था डिप्रेशन से बाहर आने में। इला के साथ तो इतनी बड़ी ट्रेजेडी हो गई है। उसके सभी सपने धराशाई हो कर जमीन पर आ गिरे हैं। आप अपनी पत्नी के साथ इतने निर्दयी नहीं हो सकते। और फिर अपने जी. पी. के पास ले जाने में क्या हर्ज है?”

इला के जी.पी. (जनरल प्रेक्टीशनर - डॉक्टर) से संपर्क किया। यह भी अच्छा था कि इला की निजि जी.पी. स्वयं एक गुजराती हैं – डॉक्टर प्रियंवदा पटेल। उसने इला से बहुत प्यार से बातें कीं, किन्तु इला बस रोये जा रही थी। थोड़ी देर में सुबकने लगी।
“नीलेश, आपको काउंसलिंग तो करवानी ही पड़ेगी।” डा. पटेल ने अपनी निर्णय सुना दिया।
“डॉक्टर भला काउंसलर कर क्या लेगा? बस बातें ही तो करेगा ना। भला मेरी बीवी को मुझ से अधिक और कौन समझ सकता है। भला काउंसलर उसे ऐसा क्या समझा सकता है जो मैं कोशिश नहीं कर सकता?”
“देखिये नीलेश, क्या आप मंदिर में पुजारी का काम कर सकते हैं? या फिर चाहें भी तो क्या गोल रोटियाँ पका सकते हैं? हर आदमी अपने काम का स्पेशलिस्ट होता है।... काउंसलर में सहनशक्ति कमाल की होती है। वह घण्टों किसी की बात सुन सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपने दिल की बात कह लेता है तो उसका दिल हल्का हो जाता है। काउंसलर का काम है कि मरीज को दिमाग़ी सुकून दे सके और भीतरी आराम। हम और आप चाहे कितने भी अक्लमन्द क्यों न हों, हम मरीज को उस तरह नहीं समझा सकते जैसे कि काउंसलर कर सकता है।”
“आप भी कमाल करती हैं डा. पटेल, भला कोई अंग्रेज काउंसलर एक हिन्दुस्तानी औरत के दिल के दर्द को कैसे समझ पाएगा?”
“वैसे तो भावनाएँ सांझी होती हैं मिस्टर नीलेश; जब चोट लगती है तो आह चाहे अंग्रेज़ी में निकले या फिर किसी और जबान में, दर्द दोनों में एक सा ही होता है।... हमारे काउंसलर पूरी तरह से ट्रेण्ड होते हैं। वैसे आप भाग्यशाली हैं कि हमारी सर्जरी के साथ एक एशियन लेडी काउंसलर जुड़ी हैं; गुजरात से ही है; मिसेज अमीन... रोहिणी अमीन...। उनसे अपाइंटमेण्ट ले लीजिये। हमारी सर्जरी मैनेजर आज ही आपके लिये अपाइंटमेण्ट पक्की करवा देंगी।”
“डॉक्टर... हमें इस काउंसलिंग के लिये... पैसे देने पड़ेंगे या फिर एन.एच.एस. इसके लिये पैसे देगी।”
“सिस्टम कुछ इस तरह से है कि एन.एच.एस. आपको काउंसलिंग के छः सेशन मुफ़्त देगा। उसके बाद भी अगर आपको ये सेशन जारी रखने की जरूरत पड़े तो आपको कुछ पैसे देने पड़ेंगे।”

नीलेश सोच में पड़ गया था। वैसे उसे अभी इला को मनाना भी था। क्या इला उसकी बात समझ पाएगी ?
“मुझे नहीं करवानी काउंसलिंग। हासिल क्या होगा उससे? क्या मेरा प्रतीक वापिस आ जाएगा?... आप समझिये नीलेश, कम से कम समझने की कोशिश करिये। ये सब बातें हैं। ये काउंसलर क्या मेरा दर्द मुझ से अधिक समझ सकती है? बच्चा मेरा मरा है या उसका?” इला भला कहाँ आसानी से तैयार होने वाली थी।

नीलेश की समस्या विकट थी। एक तो उसे वैसे ही काउंसलिंग में विश्वास नहीं था उस पर उसे ही इला को समझाना था कि काउंसलर से मिलना कितना आवश्यक है। ऐसा नहीं कि वह इला के दर्द को नहीं समझ रहा था। बस इतना ही था कि वह चाहता था कि जिस तरह नवजात की मौत के साथ उसने समझौता कर लिया है, इला भी ठीक वैसा ही करे। वह इला को यह भी नहीं समझा पा रहा था कि उसका दर्द इला से कई गुना अधिक है। बच्चा तो दोनों का मरा है... मगर नीलेश को इस दुःख के साथ साथ इला का दुःख भी बरदाश्त करना था। न केवल बरदाश्त करना था, उसे दूर करने के लिये प्रयास करना था और साथ ही साथ दुःखों को एक तरफ़ सरकाते हुए परिवार को पटरी पर भी लाना था।

यह सुन कर कि काउंसलर कोई भारतीय मूल की महिला है, इला मान गई। मिसेज अमीन एक भली महिला थी, “इला मुझे हर वो छोटी से छोटी बात बताइये जो आपने प्रेगनेन्ट होने के बाद से प्रतीक के बारे में सोची या की।... कुछ भी छूटने ना पाए। आख़िर आपका पहला बेबी होने जा रहा था। आपने बहुत से ख़ूबसूरत सपने देखे होंगे। मुझे हर बात डिटेल में बताइये।”

इला के दिल का दर्द शब्दों की लहरों पर बह निकला। उसके आँसुओं को भी बहने का बहाना मिल गया। मिसेज अमीन का प्रयास यही था कि वह किसी न किसी तरह वह इला के भीतर के दुःखों को बाहर आने में सहायता करे। मिसेज अमीन इला को जानना चाहती थी। वह उस माहौल को भी समझना चाहती थी जिसमें इला रह रही थी। उसके लिये यह कोई पहला केस नहीं था। इससे पहले भी वह ऐसे कई मरीज़ों को काउंसलिंग कर चुकी थी। वह इला की समस्या के बारे में बातचीत करने के लिये उसके घर चलने को तैयार हो गई।

एजवेयर में एजवेयरबरी रोड पर मिसेज अमीन को नीलेश और इला का घर ढूंढने में कोई मुश्किल नहीं हुई। वह चाहती थी कि एक बार जा कर स्वयं देख ले कि इला किस माहौल में रहती है। आशा के विपरीत घर की हालत उतनी खराब नहीं थी जितनी उन्होंने सोची थी। मिसेज अमीन को उम्मीद थी कि जिन हालात में इला जी रही है, उसका घर बुरी तरह से बिखरा मिलेगा। लाउंज या लिविंग रूम में काले रंग का इटैलियन सोफ़ा, बैंग अण्ड ऑलुफ़सन का म्यूज़िक सिस्टम जो कि सोनी टी.वी. के साथ मिल कर होम थियेटर बना रहे थे।

इला के बेडरूम में प्रतीक के लिये खरीदे गये सभी खिलौने, उसकी कॉट, कपड़े सब वहीं रखे थे। जो संगीत इला की डिलीवरी से पहले बजता रहता था, आज भी बज रहा था। इला जैसे हर चीज को घूरे जा रही थी। इला में पल पल में इतने बदलाव आते कि नीलेश को स्थिति समझना तक कठिन हो जाता। बहस करने पर आती तो पूरे वकील की तरह तर्क देती। फिर अचानक चुप्पी साध लेती। नीलेश की आशाएँ काउंसलर अमीन पर टिकी थीं कि शायद वे ही कोई चमत्कार कर दें।

मिसेज अमीन इला की आँखों से आँसू निकालने में तो सफल हो गईं, मगर उसके भीतर के दर्द को कम नहीं कर पाईं। इला ने साफ़ साफ़ कह दि या था, “मिसेज अमीन, दुनियाँ की हर औरत माँ बनती है। हेल्दी बच्चे पैदा करती है। मेरे भीतर ही कोई ऐसी कमी है कि मैं अपने पति को एक बेसिक सा तोहफ़ा भी नहीं दे पाई। मैं नौ महीने तक दर्द सह सकती हूँ... सबको परेशान कर सकती हूँ... अपनी सेवा करवा सकती हूँ... मगर मुझ से जिस चीज की अपेक्षा है, वो नहीं कर सकती। नीलेश ने क्या नहीं किया... मेरी सासू माँ ने क्या नहीं किया... मगर मैं?... मैं एक असफल इन्सान हूँ... एक खराब मशीन जो सही माल पैदा नहीं कर सकती।”

मिसेज अमीन ने इला के हाथों के अपने हाथों में ले लिया और सहलाने लगी। इला एक एक चीज उठा कर दिखाने लगी, “मिसेज अमीन यह बेबी बेड मेरी सहेली ने ख़ास तौर पर गिफ़्ट किया था... कैसे सोचा करती थी कि मेरा गब्दू सा प्रतीक इस पर लेटा करेगा, सोया करेगा, हंसा करेगा.... ये सब जो कभी मेरी ज़िन्दगी बन गया था, आज काटने को दौड़ता है... लगता है प्रतीक अचानक कहीं से आएगा और इन खिलौनों से खेलने लगेगा।... जानती हैं यह दूध की बोतल बड़ी ख़ास बनावट की है... जैसे ही बच्चा दूध पीना बंद करता है इसका ऑटोमैटिक सिस्टम इसे मुंह से अलग कर देता है... बच्चा ‘चोक’ नहीं होता उसकी साँस नॉर्मल चलती रहती है... !”

मिसेज अमीन ने अपने लम्बे काउंसलिंग जीवन में एक ही बात सीखी है कि मरीज को अधिक से अधिक बोलने दिया जाए। एक काउंसलर को एक अच्छा श्रोता होना चाहिये। अपनी बात कह कर मरीज का दिल हल्का हो जाता है और कभी कभी उसके मुंह से कुछ ऐसी बातें निकल आती हैं जो कि काउंसलर के काम आ जाती हैं। इला भी धाराप्रवाह अपने प्रेगनेंट होने से डिलीवरी तक की बातें बताती जा रही थी। कभी शरमाती, सकुचाती, भावनात्मक होती और फिर रोने लगती। दूसरी, तीसरी, चौथी मीटिंग में ऐसी ही बातें होती रहीं।

“मिसेज अमीन, मैं ना तो सिगरेट पीती हूँ और ना ही शराब। ड्रग्ज़ का तो कोई मतलब ही नहीं। समझ ही नहीं आ रहा कि ग़लती कहाँ हो गई।” इला को जो बात स्वयं समझ नहीं आ रही थी वो बात भला अपनी काउंसलर को कैसे समझा पाती। किन्तु काउंसलर अमीन अपने अनुभव से सब समझ रही थी। “देखो इला, सच्चाई तो यह है कि ब्रिटेन में हर साल करीब चार हज़ार मृत बच्चे पैदा होते हैं। उनमें से कम से कम पच्चीस प्रतिशत ऐसे होते हैं जिनके मृत पैदा होने का कोई कारण पता नहीं चलता। उनकी माएँ अपने आप को यूं ही गला नहीं देतीं। वे दोबारा प्रेगनेंट होती हैं और सेहतमंद बच्चों को जन्म देती हैं। तुम भूल जाओ उस हादसे को। ज़िन्दगी दोबारा जीना शुरू करो। याद रखो... तुम अब भी ख़ूबसूरत और सेहतमंद बच्चों की माँ बन सकती हो।” ... दीवार कभी जवाब देती है जो इला कुछ बोलती।
 
मिसेज अमीन ने नीलेश को समझाने का प्रयास किया, “देखिये नीलेश, मैनें बहुत बारीक़ी से इला की हालत को समझने का प्रयास किया है। समस्या यह है कि इला के दिमाग़ में यह बैठ गया है कि उसमें ही कोई खराबी है। इसके नॉर्मल होने के लिये सबसे अधिक जरूरी है कि वह एक बार फिर गर्भवती हो।... फिर से सपने देखे... इसके लिये सपने देखना बहुत जरूरी है। रंग बिरंगे सपने ही इसके जीवन को दोबारा स्पंदन दे सकते हैं।"

“मगर, यह सब कैसे संभव होगा मिसेज अमीन? इला तो मेरी बात सुनने तक को तैयार नहीं होती। वह तो बस अपने कमरे में बैठी अपनी प्रतीक की निशानियों को निहारती रहती है।
“आप लोग कुछ दिनों के लिये बाहर हो आएँ – लंदन से बाहर। हो सके तो दिल्ली का चक्कर लगा आइये। वहाँ अपनी माँ और दूसरे रिश्तेदारों से मिलेगी। इसका मन बदलेगा। यहाँ तो यह प्रतीक की याद से बाहर नहीं आ पाएगी।”
नीलेश की कम्पनी उसे दिल्ली भेजने के लिये बार बार कह रही थी। वह बस किसी तरह अपने प्रोजेक्ट से कन्नी काट रहा था। । उनके दिल्ली ऑफ़िस में एक वित्तीय घोटाला हुआ था और दफ़्तर उसे इस प्रोजेक्ट का मैनेजर बना कर दिल्ली भेजने के लिये तीन सप्ताह से दबाव बना रहा था। अब उसे बहाना मिल रहा था, “इला, कम्पनी मुझे छः सप्ताह के लिये दिल्ली, मुंबई और बंगलौर भेज रही है।... जाना तो पड़ेगा।”
“अच्छा !... आप मुझे अकेले छोड़ कर चले जाएँगे ?” सोच की काली लकीर थोड़ी और गहरी हो गई। इला सोच रही थी कि अब नीलेश भी उससे उकता चुका है। कुछ दिन ख़ुशी के बिताना चाहता है। उसने कल सुना भी था कि नीलेश किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था, ”क्या बताऊँ जी। भरी जवानी में इस तरह की ज़िन्दगी के बारे में सोचा नहीं था। ना जाने क्या ऊल जलूल सोचती रहती है। कभी कहती है मर जाएगी, तो कभी कहती है कि मैं उसे छोड़ दूंगा। लगता है मुझे पूरी तरह से पागल कर देगी।”
“अरे नहीं इला, तुम मेरे साथ चलोगी। तुम्हारे मायके चलेंगे। तुम मम्मी डैडी को भी मिल लेना।”
“एक बात बताओ, तुम मुझे मम्मी डैडी के पास छोड़ कर किसी और से शादी तो नहीं कर लोगे?”

सारा दिन एक अजीब सी चुप्पी में बीत गया। नीलेश एक बात अच्छी तरह समझ चुका था कि उसके अकेले के बस में नहीं है कि वह इला को इस ग़म से बाहर निकाल पाए। शाम होते होते इला के व्यवहार में बदलाव आने लगा। नीलेश को कुछ उम्मीद बंध चली थी कि इला उसकी बात मान लेगी और भारत की यात्रा पर चल देगी। मगर शाम के ढलते सूरज ने एक बार फिर इला के दिमाग़ में उसी वहम को जन्म दे दिया, “नीलेश, तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?... देखो सब यही कह रहे हैं कि प्रतीक की मौत में मेरा कोई कुसूर नहीं।... तुम मुझे छोड़ना मत नीलेश... प्लीज मुझे छोड़ना मत... मैं मर जाऊँगी... तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी...

नीलेश के लिये वक़्त जैसे थम गया। समझ नहीं आ रहा था कि बाहर धूप है या अंधेरा। जब धूप ही अंधेरी होने लगे तो कुछ सुझाई कहाँ देता है। इला के सूखे हुए आँसुओं को जैसे एकाएक बहने का मौक़ा मिल गया। अब थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बैठे बैठे हिचकियाँ बंधने लग जातीं। नीलेश को बस डरी डरी आँखों से देखती रहती... एक ही विचार जैसे उसे खाए जा रहा हो कि हो न हो नीलेश उसे त्याग देगा।

नीलेश ने दिल्ली इला के मायके में फ़ोन किया। फ़ोन उसके पिता ने उठाया, “नीलेश बेटा, मैं सोच रहा था कि इला की माँ को तुम्हारे पास लंदन भेज दूं।... मगर अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाया हूँ।”
“बाबूजी, प्रॉब्लम तो यह हो गई है कि वह हर वक़्त रोती रहती है। अनाप शनाप सोचती है... बस यही रट लगी रहती है कि कहीं मैं उसे छोड़ तो नहीं दूंगा।”

“बेटा उसका फ़ोन यहाँ भी आया था। माँ के साथ रो रो कर बातें कर रही थी। मगर तुम परेशान न होना।... ऐसा क्यों नहीं करते कि उसे कुछ समय के लिये यहाँ ले आओ। सबके बीच रह कर उसका मन बहल जाएगा और पॉज़िटिव बातें सोचने लगेगी।”
“यही तो सोच रहा हूँ बाबूजी। आप और अम्मां जी के साथ रह कर शायद वह कुछ संभल जाए। यहाँ तो दिक्क़त यह हो रही है कि पल भर में लगता है कि बिलकुल ठीक ठाक है और पल भर में लगता है कि कभी भी आत्महत्या कर लेगी।... मैं अपने ऑफ़िस से दिल्ली आने वाला हूँ... मुझे लगता है कि इला को भी साथ ले आऊँ तो उसे आपके साथ रहने से जरूर हालात बेहतर हो सकते हैं।”

डिप्रेशन के बारे में नीलेश ने केवल सुन रखा था। वह हमेशां उसे अमीर लोगों के चोंचले कहा करता था। यह बला उसके अपने घर पर भी धावा बोल सकती है... यह कभी नहीं सोचा था। वह इला की हालत को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास कर रहा था मगर समझ नहीं पा रहा था कि डिप्रेशन का तर्क से कुछ लेना देना नहीं है।

इला को यह डर खाये जा रहा था कि नीलेश उसे भारत में माँ बाप के पास छोड़ स्वयं अकेला वापिस आकर दूसरा विवाह कर लेगा। नीलेश का व्यवहार उसे नकली महसूस हो रहा था। भला यह कैसे हो सकता है कि नीलेश उसके साथ इतना भला व्यवहार कर रहा है। उसके दिल में जरूर कुछ और है जो वह बता नहीं रहा।

नीलेश प्रतीक्षा करता रहा कि इला शायद भारत जाने के बारे में उससे कुछ बात करे। मगर दीवार सा ठोस सन्नाटा उसे घूरता रहा। वह प्रतीक्षा करता रहा मगर कुछ भी नहीं हुआ। निर्णय उसे ही लेना होगा। फ़ैसला ले लिया... टिकट आ गये। और तब टूटी इला की चुप्पी, “तुम मुझे मम्मी डैडी के पास क्यों ले जाना चाह रहे हो? मुझे अपने दिल की बात साफ़ साफ़ बताओ।... मैनें तुम्हें कितनी बार समझाया है कि प्रतीक की मौत में मेरा कोई कुसूर नहीं। तुम मुझे अपने से दूर क्यों करना चाह रहे हो?”

“मगर मैं तो तुम्हारे साथ चल रहा हूँ। तुम्हारे साथ रहूँगा। हाँ, तुम हमेशा कहती हो ना कि तुम्हें गोआ बहुत पसन्द है, मैं तुम्हें गोआ भी ले जाऊँगा।... मेरा ऑफ़िस मेरी दिक्क़त को समझता है। तुम चिन्ता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।”

विमान उड़ चला... रास्ते भर नीलेश के दिमाग़ में मिसेज अमीन की बातें गूँज रही थीं, “देखिये नीलेश, इला को ऐसा माहौल चाहिये जहाँ छोटे बच्चे ना दिखाई दें। थोड़े बड़े बच्चे जो अपने माँ बाप का कहना मानें, उनके लिये काम करें, पढ़ाई लिखाई करते दिखाई दें, मैदान में खेलते हुए दिखें... ऐसे बच्चे जो इंडिपेंडेंट होते हुए भी माँ बाप पर आश्रित हों, उनसे जुड़े हों।”
“इला ठीक तो हो जाएगी ना?... मैनें पहली बार किसी डिप्रेशन के मरीज को देखा है। समझ में नहीं आ रहा कि यह सब हो कैसे गया।”

“मुझे लगता है नीलेश जी, इसका सबसे बढ़िया इलाज है कि जल्दी से जल्दी इला एक बार फिर गर्भवती हो जाए। हमें उसके सपने उसे वापिस दिलाने हैं।... मगर आपको ख़्याल यह रखना होगा कि इस बार खिलौने पहले ना खरीदे जाएँ... बच्चे का नाम पहले ना रखा जाए... सब कुछ बहुत ‘लो की’ रखा जाए।”
“क्या वह इसके लिये राज़ी हो जाएगी?”
“देखिये यह कोई कोर्ट केस तो है नहीं कि जज ने अपना निर्णय सुनाया और पुलिस की कार्यवाही शुरू हो गई।... यहाँ तो आपकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी सहनशीलता और परिपक्वता की परीक्षा है।... आपको ऐसा माहौल पैदा करना होगा कि इला का जी चाहे कि आपको प्यार करे।... बाक़ी सब ऊपर वाले पर छोड़ दीजिये।”

ऊपर वाला शायद पैंतीस हज़ार फ़ुट नजदीक आ गया था। क्योंकि विमान उसी ऊँचाई पर उड़ान भर रहा था। विमान में इला का व्यवहार पेण्डुलम की तरह एक छोर से दूसरे छोर की तरह बदल रहा था। आँखों में ख़ालीपन लिये विमान की उद्घोषणाओं को सुनती रही। अचानक नीलेश की बांह पकड़ कर फुसफुसाने लगी, “नीलेश, यदि विमान समुद्र में गिर गया तो...?”

“ऐसा कुछ नहीं होगा इला। तुम तो कितनी बार विमान में यात्रा कर चुकी हो। भला आजतक कभी कोई हादसा पेश आया?”
सोच में पड़ गई इला, जैसे नीलेश ने उसे अचानक बहुत सा होम-वर्क करने को कह दिया हो। सोच... आँखों में ख़ालीपन... अचानक बहते आँसू... शून्य में ताकते रहना... ये सब जैसे इला की पहचान बन गये थे। इस समय भी यही सब हो रहा था। सोच रहा था नीलेश – ‘अब भी उम्मीद की कोई किरण हो सकती है क्या?’
इला ने भोजन भी बेदिली से ही किया। उसने अपनी पसन्द की डिश वैजिटेबल ऑग्रैटिन मंगवाई थी। विमान में हिन्दी फ़िल्म थ्री ईडियट्स दिखाई जा रही थी। नीलेश ने टिकट बुक करवाने के साथ ही साथ इला और अपनी पसन्द का भोजन ऑर्डर कर दिया था। अपने लिये चिकन-इन-रेड-वाइन सॉस... उसे इला के हिस्से का भोजन भी थोड़ा थोड़ा खाना पड़ा ताकि इला उसे खाते देख कर शायद खाना शुरू कर दे।... वह एक कौर मुंह तक ले जाती और फिर हाथ में लिये कांटे की ओर ताकती रहती। बार बार नीलेश को याद दिलाना पड़ता कि भोजन की ओर ध्यान दे।

विमान के दिल्ली पहुँचने की घोषणा भी हो गई। दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। पहले से कहीं अधिक आधुनिक बन गया था। अब वहाँ कस्टम का पुराना वाला आतंक नहीं थी। ग्रीन चैनल से आसानी से निकल गये दोनों। बाहर इला के माता पिता लेने आये थे। माँ के गले से लिपट कर एअरपोर्ट पर ही रोने लगी इला।

उनके रास्ते में ही खड़े हो जाने से आने वाले अन्य यात्रियों को रुकावट होने लगी थी। नीलेश असमंजस की स्थिति में था कि कैसे अपनी बीमार पत्नी को वहाँ खड़े हो कर रोने से रोके। उसके ससुर ने स्थिति को संभाल लिया; बेटी को माँ से अलग करते हुए अपने निकट कर लिया और कार पार्क की ओर चलने लगे। नीलेश के साथ सास ससुर की बात केवल आँखों आँखों में ही हो पाई।

अगली ही सुबह इला के बड़े भाई और भाभी भी उसे मिलने आ गये। उनके बच्चे भी साथ थे। इला और उसके बड़े भाई के बीच क्ई वर्षों की दूरी थी। इसलिये उनके बच्चे भी कुछ बड़े थे। बच्चे भी बुआ से मिलने को लालायित थे। फिर कुछ अपेक्षा भी रही होगी कि बुआ कोई ना कोई उपहार तो लाई ही होगी। नीलेश चुपके से कमरे से बाहर चला गया ताकि इला को उनके साथ समय बिताने का अवसर मिले। दोपहर के भोजन पर जब डाइनिंग टेबल पर बैठे तो इला तुलनात्मक रूप से सहज लग रही थी। उसने भाई के बच्चों से बात भी की। नीलेश के नास्तिक दिमाग़ ने भी भगवान का शुक्र अदा किया।

किन्तु केवल शुक्र अदा कर देने मात्र से तो इला ठीक नहीं होने वाली थी। डिप्रेशन की गोलियाँ भी उसे माफ़िक नहीं आ रही थीं। उनींदी सी रहती... शून्य से बाहर नहीं आ पा रही थी। नीलेश तय नहीं कर पा रहा था कि गोवा पहले जाए या फिर कम्पनी के काम से बंगलौर से वापिस आने के बाद।

बाबूजी ने फिर साबित कर दिया कि अनुभव का कोई सानी नहीं हो सकता। चाहे कोई कितना भी पढ़ा लिखा क्यों न हो... कितनी भी बड़ी नौकरी पर क्यों न लगा हो... यदि उसे जीवन का अनुभव नहीं तो वह अधूरा ही कहलाएगा। “नीलेश बेटा, आप गोवा क्यों जाना चाहते हैं?”
“जी बाबूजी, जब इला प्रेगनेन्ट थी, तो कहा करती थी कि उसे गोवा जाना है। कैलेण्डरों में और फ़िल्मों में गोवा देख कर उसका जी चाहता था कि वह भी गोवा जाए। फिर वहाँ मेरे दोस्त का अपना होटल है। रहने जैसी भी कोई समस्या नहीं है। सोचा कि इला एक नई जगह देख लेगी और उसका मन भी बहल जाएगा।”
“इला की जो दिमाग़ी हालत इस समय चल रही है, ऐसे में किसी नई जगह ले जाना उसे परेशान तो कर सकता है... मुझे नहीं लगता कि उससे कोई लाभ होगा।”
“तो आप क्या सोचते हैं। हमें कहाँ जाना चाहिये।”
“मेरे ख़्याल से तुम्हें बंगलौर जाना चाहिये। इला को एक सप्ताह यहीं अपनी माँ के साथ बिताने दो। इस एक हफ़्ते में वे इसे समझा देंगी कि तुम इसे कितना प्यार करते हो। इसके दिल में जो ऊल-जलूल विचार बस गये हैं उन्हें साफ़ करेगी। ये जाले साफ़ करना बहुत जरूरी है।... उसके बाद तुम उसे वापिस शिमला ले कर जाओ। तुम दोनों हनीमून के लिये शिमला गये थे। उन यादों को दोबारा जियो।... इला के दिल में पुरानी यादें जब ज़िन्दा होंगी, तो उसे वापस मुस्कुराना आ जाएगा।”

“बाबूजी यह सब बहुत फ़िल्मी सा लगता है कि किसी की याददाश्त खो जाए तो उसे पुरानी बातें याद करवाई जाएँ ताकि उसकी याददाश्त वापिस आ जाए।”

“देखो बेटा, मैं कोई दबाव नहीं डाल रहा। तुम सोचो; तुम्हारी काउंसलर ने कहा कि इला को लंदन से बाहर ले जाओ। तुम उसे यहाँ ले आए। अब बस इतनी सी बात तय करनी है कि तुम उसे कहाँ ले जाओ। गोवा से तुम दोनों का कोई लगाव या रिश्ता नहीं है जबकि शिमला का अर्थ तुम दोनों के लिये है रोमांस। बस वही रोमांस वापिस लाना है इला के जीवन में।... वैसे तुम समझदार हो, जो ठीक समझो करो।”

नीलेश बंगलौर से एक सप्ताह में लौट आया। स्थिति का जायज़ा लेने का प्रयास किया। इला शांत दिखाई दे रही थी। नीलेश के ससुर ने उसका हौसला बढ़ाया। तय हो गया कि शिमला जाना ही है।
ठीक पहले की ही तरह कालका मेल में एअरकंडीशन कुपे बुक किया। बाबूजी फ़्लाइट पर जाने के विरुद्ध थे। इला पर शायद दवा का असर था। थोड़ी देर तक तो जागती रही। सब्ज़ी मण्डी, आज़ादपुर, बादली, नरेला और सोनीपत तक तो खिड़की के बाहर देखती रही। बाहर अंधेरा था... कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। बस जब रेलगाड़ी स्टेशन से गुजरती तो कुछ पलों के लिये प्लैटफ़ॉर्म दिखाई दे जाता। नींद ऐसी गहरी थी कि कालका तक सोती ही गई। कालका से छोटी लाईन की गाड़ी लेनी थी। आज भी डीजल इंजन से चलती छोटी सी गाड़ी। इला के चेहरे पर उस रेलगाड़ी को देखते ही पल भर के लिये मुस्कान आ गई। दोनों ने स्टेशन पर ही हल्का सा नाश्ता भी किया।

नीलेश ने मॉल रोड पर स्थित क्लार्क्स होटल में ही कमरा बुक करवाया था। विवाह के बाद हनीमून मनाने इसी होटल में आये थे। वाइसरॉय लॉज के निकट बने इस होटल की पहली मंज़िल पर उसने उसी कमरे को दोबारा बुक करवा रखा था। उसे उम्मीद थी कि शायद कमरे की भीतरी साज सज्जा भी वैसी ही होगी। मगर ऐसा नहीं था। शायद इस बीच कमरे के पर्दे और लिनन सब बदल दिये गये थे। अब कमरे के पर्दे और बेड कवर नारंगी रंग के थे। कमरा उजला उजला लग रहा था।

नीलेश ने होटल में काम करने वाले संदीप ठाकुर को खोजना शुरू किया। रिसेप्शन में काम करने वाला संदीप अब लॉबी मैनेजर बन गया था। उसकी छुट्टी थी। अगले दिन काम पर वापिस आना था। कुछ भी नहीं बदला था। भोजन भी वैसा ही स्वादिष्ट था और बाहर बादल आसमाँ में छाए हुए थे... हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी।
“इला तुम्हें याद है कि जब हम पहली बार यहाँ आए थे तो मलाई कोफ़्ता देख कर तुमने कैसे नाक भोंह सिकोड़ी थी ? और मैनें क्या कहा था... कि एक बार टेस्ट करके देखो... बंदर और अदरक वाली बात याद है?”

बस चुप्पी ! इला जैसे कुछ याद ही नहीं करना चाह रही थी। खाना जैसे तैसे करके खत्म हुआ और होटल से बाहर चहलकदमी के लिये नीलेश इला को ले चला। कुछ ही देर में महसूस हुआ कि ठंडक है।... वापिस कमरे में। बिस्तर में भी वहीं ठण्डापन। ना तो इला ने नीलेश का हाथ झटका और ना ही उसे बढ़ावा दिया। जैसे एक मृत शरीर पड़ा हो जिसे नीलेश के छूने से कोई असर ही ना हो रहा हो।
इला जैसे एक मशीन सी बन गई थी। चेहरे पर कोई भाव नहीं।

आँखें शून्य में ताकते ताकते जैसे शून्य का ही हिस्सा बन गईं थीं। नीलेश ने वापिस अपने ससुर को फ़ोन किया। उनकी बात सुनता रहा। मन में कहीं डर भी बैठता जा रहा था कि क्या बाक़ी ज़िन्दगी ऐसी औरत के साथ बितानी पड़ेगी। उसकी इला से शादी प्रेम विवाह नहीं थी। माँ बाप ने करवाई थी।... क्या उन्हें ले जाकर वापिस कर दूं कि माल ठीक नहीं है, रिपेयर करवा कर दीजिये...

अपने ससुर से बनाई योजना के अनुसार चौथे दिन नीलेश इला को उन्हीं सड़कों और दुकानों पर ले जा रहा था जहाँ वे हनीमून के समय गये थे। शाम की सर्दी के कारण दोनों लगभग चिपक चिपक कर चलते। मालरोड, लोअर बाज़ार, लक्कड़ बाज़ार, रिज सभी जगह दोनों जैसे चार साल पुराना समय एक बार फिर जी रहे थे।

घोड़े पर चढ़ी इला ने नीलेश को शर्माते हुए कहा, “आपने तो जैसे पूरा हनीमून दोबारा खड़ा कर दिया है।” नीलेश को इला की सोच में कुछ हल्का सा बदलाव महसूस हुआ।

“देखो इला, हम दोनों जब जब शिमला आएँगे, हमारा नया हनीमून ही होगा। यही होटल होगा और सबकुछ ठीक वैसे ही जैसा कि पहली बार हुआ था।” अभी नीलेश का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि इला जैसे घोड़े से गिरने को हुई। साथ में पैदल चलते हुए नीलेश ने उसे ठीक वैसे ही संभाला जैसे कि चार वर्ष पहले संभाला था। नीलेश बाबूजी के कहने पर सब कुछ किये जा रहा था मगर भीतर से उसे सब बहुत फ़िल्मी भी लग रहा था। हैरानी इस बात की थी कि इला पर सकारात्मक असर होता दिखाई दे रहा था।
“नीलेश तुम मुझे ज़िन्दगी में कभी भी चोट नहीं लगने दोगे ना ?”

“अरे तुम मुझ से अलग थोड़े ही हो, तुम्हें चोट लगेगी तो क्या मुझे दर्द नहीं होगा। ” ना चाहते हुए भी नीलेश पूरी तरह से फ़िल्मी डायलॉग बोल गया।

इला ने नीलेश की तरफ़ प्यार भरी नजरों से देखा और उसने इला की आँखों पर हलका सा चुम्बन अंकित कर दिया।
डिनर पर नीलेश ने अपने लिये वोदका और कोक मंगवाए तो इला के लिये भी वोदका और ऑरेंज जूस मँगवाया। दोनों ने आज युरोपीयन स्टाइल का चिकन खाया, साथ में उबली हुई सब्ज़ियाँ। खाने के बाद क्वांत्रो का एक पैग भी लिया। क्वांत्रो में संतरे के छिलके का स्वाद इला को बहुत पसन्द है। रात को दोनों जब गर्म बिस्तर में इकट्ठे सोये तो हनीमून स्वयंमेव ही पूरा हो गया।

उसके बाद के तीन दिनों तक इला पूरी तरह से एक उनींदे रोमाँ स की ख़ुमारी में रही। ज़ाहिर है कि बाबूजी की तरकीब काम कर रही लगती थी। इला के चेहरे के भाव बदलने लगे थे। उसे नीलेश द्वारा चाहे जाना अच्छा लग रहा था। नीलेश की बलिष्ठ बाहों में वह सुरक्षित महसूस कर रही थी। “देखो इला, दुनियाँ का कोई भी हादसा हमारे रिश्ते को ठेस नहीं पहुँचा सकता। सपने कभी नहीं मरते... हम नये सपने देखेंगे, उन्हें पूरा करेंगे। जीवन कभी रुकेगा नहीं।”

वे दोनों शिमला से कालका; कालका से दिल्ली वापिस पहुँच गये। नीलेश को वापिस लंदन जाना था। इला अपने माता पिता के पास रुक गई। महीने भर बाद ही बाबूजी का फ़ोन आया, “बधाई हो जमाई राजा, दोबारा से सपने देखने शुरू कर सकते हो। तुम एक बार फिर बाप बनने वाले हो।”
और नीलेश अपनी आँखों से इला के सपने देख रहा है।

पृष्ठ : . .

१ अक्तूबर २०१२

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।