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चीन से पाती


श्वेनत्सांग के चतुर्चक्रवर्ती सम्राट
-डॉ. गुणशेखर (चीन से)


बचपन से ही जब से इतिहास रटने के लायक हुआ, चक्रवर्ती राजा या सम्राट शब्द मुझे बहुत अच्छा लगता था। शब्द का अर्थ न तब जानता था और न आज से पहले जब तक श्वेन त्साँग (हवेनसाँग) की 'पश्चिम की तीर्थयात्रा' नहीं पढ़ी थी। चीन आने के पहले इस महान व्यक्ति को सामान्य यात्री मानता था। इनके कार्यों से अनभिज्ञ था। इस बात से भी अनभिज्ञ था कि ये महान बौद्ध भिक्षु और दार्शनिक थे। इसलिए इन्हें 'व्हेनसाँग' नाम का एक चीनी यात्री भर समझता था। ह्वेनसाँग भारत आया था ऐसा कहते हुए अनादर नहीं लगता था। लेकिन अब लगता है, इसलिए इन्हें बड़े सम्मान के साथ याद करते हुए हम कहना चाहेंगे कि ये एक महान इतिहासकार और बौद्धधर्म जानकार थे। बौद्ध धर्म और दर्शन के गहन अध्ययन के उद्देश्य से इन्होंने भारत की यात्रा की। इसलिए इन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में भारत भ्रमण को तीर्थ यात्रा कहा है।

ये अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखते हैं कि जिस समय इन्होंने यात्रा की उस समय चार चक्रवर्ती राजा थे। इनके साम्राज्य विधिवत बँटे हुए थे। वे कहते हैं, "चार महाद्वीप विद्यमान हैं। वे हैं पूर्व में विदेह द्वीप, दक्षिण में जंबूद्वीप, पश्चिम में गोदानीय द्वीप और उत्तर में कुरु द्वीप।" इनके अनुसार इनपर शासन करने वाले राजा चक्रवर्ती राजा कहलाते थे। ये चार प्रकार के होते थे- १.स्वर्ण चक्रवर्ती २.रजत चक्रवर्ती ३.ताम्र चक्रवर्ती ४.लौह चक्रवर्ती।

स्वर्ण चक्रवर्ती राजा चारों द्वीपों पर शासन करता था। श्वेनत्साँग संकेतों में थाँग सम्राट को स्वर्ण चक्रवर्ती सम्राट कहना चाहते थे। इनकी राजधानी कुरुद्वीप (वर्तमान चीन) में थी। इसके बाद रजत चक्रवर्ती राजा आता था, जिसके अधीन कुरु द्वीप को छोड़कर शेष तीन द्वीप होते थे। ये तीन द्वीप थे विदेह, जंबू और गोदानीय द्वीप। ताम्र के अधीन कुरु और गोदानीय को छोड़ शेष दोनों द्वीप थे। अंतिम लौह चक्रवर्ती राजा केवल जंबू द्वीप का शासक होता था।

चक्रवर्ती के संबंध में इन्होंने जो जानकारी दी है उसे आज तक मैंने कहीं नहीं पढ़ा है। वह ये है कि जब कोई चक्रवर्ती राजा राज्यारोहण करता था तो उसके भाग्य एवं सद्गुणों के अनुरूप आकाश में एक वृहदाकार चक्र दिखाई देने लगता था। यह चक्र उसके सद्गुण, भाग्य और प्रताप के अनुसार स्वर्ण, रजत, ताम्र और लौह वर्ण का होता था। इन चक्रों के रंग के अनुसार ही चक्रवर्ती सम्राट अपनी संज्ञा और द्वीपों पर शासन का अधिकार प्राप्त करते थे। यह तत्कालीन राजाओं की एक प्रकार की उपाधि थी, जिसकी व्याख्या उनकी महत्ता के अनुसार की गई है। चूँकि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था अतः चक्रवर्ती के संदर्भ को आकाश में चक्रों के दिखने की अलौकिक मान्यता से जोड़ा गया है।

जंबू द्वीप का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि जब चक्रवर्ती राजा नहीं होते थे उन दिनों जंबू द्वीप में चार राजा थे। दक्षिण में हस्ती राजा था। पश्चिम में रत्न, उत्तर में अश्व और पूर्व में मनुष्य। वे बताते हैं- "मनुष्य राजा के यहाँ मेल-मिलाप और सुख था। लोग मेधावी और कुशाग्र बुद्धि होते थे और सत्य निष्ठा तथा सदाचार पर बल देते थे। उनके वस्त्र का आगे का भाग दाईं ओर खुलता था। गाड़ियाँ, वस्त्र एवं आभूषण सबके सब श्रेणियों के अनुरूप वर्गीकृत होते थे। लोगों को अपने जन्म स्थानों पर ही रहना प्रिय था और बहुत कम लोग विस्थापित होते थे।" हस्ती राजा के देश के लोग, "स्वभाव से उग्र किन्तु अध्ययन शील थे। वे कलाओं में पारंगत थे। शरीर पर चादर ओढ़ते थे और दाएँ कंधे को अनावृत रखते थे। सिर पर चोटी बनाते थे। शेष बाल चारों ओर लटकते रहते थे।" वे गाँवों और नगरों दोनों जगहों पर बसे होते थे। जिसे इन्होंने रत्न राजा कहा है, शायद वह वैश्य या शूद्र राजा रहा हो। इसीलिए वे कहते हैं कि, "रत्न राजा की धरती पर लोग असभ्य थे और केवल धन संचित करना ही जानते थे। वे छोटे कपड़े पहनते थे, जिसका आगे का भाग बाईं ओर खुलता था। उनके केश मुंडित और दाढ़ी बढ़ी हुई होती थी। वे लोग नगरों में रहते थे और व्यापार करके लाभ कमा लेते थे।"

'मनुष्य' राजा के निवासियों को छोडकर सभी राज्यों के निवासी पूर्व दिशा को शुभ और सर्वोत्तम मानते थे। भोर में उठते ही वे पूर्व दिशा को प्रणाम करते थे। उनके द्वार भी पूर्व दिशा में ही खुलते थे। लेकिन मनुष्य राजा के राज्य के निवासी दक्षिण दिशा को शुभ मानते थे। वे भारत में सत्रह वर्षों तक रहे थे। इसलिए उन्होंने ११० देशी-विदेशी राज्यों का भ्रमण किया था जिनमें लगभग पूरे भारत का भ्रमण सम्मिलित है। इनका यात्रा-वृत्तांत फाह्यान (३३७-४२३ई.)से अधिक विस्तृत, व्यवस्थित और प्रामाणिक है। इन्होंने बौद्ध सूत्रों के १३३५ खंडों का अनुवाद चीनी भाषा में किया था। इसलिए चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में इनसे बड़ा कोई और नाम न पहले था और न बाद में सामने आया। अनुवाद के अलावा इन्होंने एक और बड़ा काम किया था, वह था फा श्याङ्ग चुंग नामक धर्म लक्षण शाखा की स्थापना।

थाँग राजवंश काल तक बौद्धधर्म को चीन में आए छह-सात सौ वर्ष हो चुके थे, लेकिन जो प्रचार-प्रसार इस वंश के शासनकाल में मिला वह पहले कभी नहीं हुआ था। श्वेन त्साँग के समय में बाँस की खपच्चियों पर लिखने की आम परंपरा थी। लेकिन इन्होंने यह लेखन कार्य बाँस की खपच्चियों के बजाय रेशमी वस्त्रों पर किया ताकि उनकी उम्र बढ़ जाए। इनका ग्रंथ बहुत प्रामाणिक और मूल्यवान है। इसका मूल नाम बहुत लंबा है 'थाँग राजवंश की पश्चिम की तीर्थ यात्रा का वृत्तान्त'।

बहुत से लोगों को यह भ्रम है की इनकी पुस्तक का नाम 'पश्चिम की यात्रा' है। ऐसा नहीं है। यह श्वेन त्सांग की यात्रा पर केन्द्रित एक उपन्यास का अनूदित (अङ्ग्रेज़ी) नाम है, श्वेन त्साङ्ग की मूल पुस्तक का नहीं। मूल पुस्तक के बारह खंड हैं। श्वेन त्साँग की प्रखर प्रतिभा से प्रभावित होकर तत्कालीन स्वर्ण चक्रवर्ती सम्राट थाए चुंग ने न केवल इन्हें राजमहल में बुलाया बल्कि शयन कक्ष में सम्मानपूर्वक आसन दिया। उन्होंने इनके ग्रंथ 'महाथाँग त्रिपिटक सद्धर्म' पर ६८० अक्षरों की प्रस्तावना भी लिखी थी। इन्होंने अपने इस यात्रा वृत्तांत में भारत के रीति-रिवाजों, परंपराओं और प्रथाओं का बहुत प्रभावशाली चित्रण किया है। इनका यह चित्रण चीन से भारत जाने वाले प्रथम बौद्ध भिक्षु फा श्यान की तुलना में अधिक व्यापक और ऐतिहासिक प्रमाणों से लैस है। फा श्यान ३९९ ई. से ४१२ ई. तक भारत में रहे थे और कुल तीस राज्यों का भ्रमण किया था। उनके यात्रा-वृत्तांत का नाम 'बुद्ध के देश का यात्रा-वृत्तान्त' है। इस ग्रंथ का भी इतिहास में कहत्त्व्पूर्ण स्थान है। सबसे पहले उसी का अङ्ग्रेज़ी रूपांतर सन् १९५७ ई. में प्रकाशित हुआ था। इससे दक्षिण एशियाई देशों के इतिहास के अध्ययन में इतिहासकारों को बड़ी मदद मिली थी। लेकिन श्वेन त्साँग के यात्रावृत्तांत ने तो इतिहास को जैसे नई आँखें ही दे दी थीं।

श्वेन त्साँग की स्वदेश वापसी पर उनके स्वर्ण चक्रवर्ती सम्राट ने उन्हें बहुत सम्मान दिया था। इससे पता चलता है कि उस समय बौद्ध धर्म थाँग वंश का राजधर्म रहा होगा। बिना राजधर्म के किसी बौद्ध भिक्षु को इतना सम्मान मिलना कि राजा बौद्ध भिक्षु की उपस्थिति में स्वयं रथ में अपने बैठने का स्थान बदल ले या फिर किसी साधु को शयन गृह तक बुलाए संभव नहीं लगता।

उन्होंने सम्मान के योग्य काम भी किया था। लगातार संघर्ष के बावजूद अपनी यात्रा जारी रखी थी। विघ्न-बाधाओं से घबराए बिना वे ज्ञानार्जन के क्षेत्र में बराबर डटे रहे थे। इन यात्राओं का जिक्र करते हुए वे स्वयं लिखते हैं कि, "अपनी लंबी यात्रा के समय मैंने दीक्षा लेने के उपरांत अवकाश के समय में स्थानीय स्थितियाँ एवं प्रथाएँ लिपिबद्ध की हैं। स्याहकोह के इस ओर हू जाति की प्रथाएँ प्रचलित हैं। वे और रुंग जाति के लोग एक ही स्थान पर बसे तो हुए थे पर उन्होंने विभिन्न जनपदों में बाँटकर अपने-अपने राज्य स्थापित किए हुए हैं। उन्होंने नगर बसाए, खेती अथवा पशुपालन आरंभ किया। वे सत्य निष्ठा की अपेक्षा धन-संपत्ति को अधिक महत्त्व देते हैं। उनमें विवाह विधि नहीं है। ऊँच-नीच का भेद नहीं है। स्त्रियों की बात मान ली जाती है और पुरुषों की स्थिति दीन है। मृतक का शोक मनाया जाता है लेकिन उसकी कोई निश्चित अवधि नहीं है। इस कालावधि में लोग अपने चेहरे पर घाव कर लेते हैं, कान काट लेते हैं और कपड़ों के चीथड़े-चीथड़े कर देते हैं। मृतक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पशुओं की बलि चढ़ाई जाती है। शुभ अवसर पर लोग श्वेत वस्त्र पहनते हैं, जबकि अशुभ घड़ी में काले वस्त्र पहनते हैं।"

हू और रुङ्ग जाति या स्याकोह जैसे नाम चीनी उच्चारण से प्रभावित लगते हैं। इनसे यह अनुमान लगाना बहुत कठिन है कि राज्य और जातियाँ वास्तव में क्या हैं । लेकिन इससे इतिहास या उसका साक्ष्य कमजोर नहीं पड़ जाता। जाति प्रथा थी। स्त्री की स्थिति अच्छी थी। पुरुष दयनीय जीवन जीते थे। इसका अर्थ है कि बाद के समय में पुरुष ने न केवल अपनी स्थिति सुधारी बल्कि स्त्रियों को अपने अधीन भी किया। तत्कालीन इतिहास से बहुत-सी जानकारियाँ ऐसी मिलती हैं कि हम वर्तमान और अतीत के बीच फैले सन्नाटे की सटीक व्याख्या कर सकते हैं, जनजीवन को समझ सकते हैं कि तत्कालीन पशु बलि और शोक आदि की प्रथाएँ जो आज भी यथावत हैं, उनका अस्तित्त्व बहुत पुराना है।
श्वेन्त्साँग ने चतुर्चक्रवर्ती सम्राट की जो चर्चा की है वह प्रायः अव्याख्यायित ही रह जाता यदि यह पुस्तक प्रकाश में न आती। भले अर्थहीन चक्रवर्ती शब्द का दरबारों में अलंकरण होता रहा हो, राजघरानों में तिलक होता रहा हो, पर वह वास्तविकता के अर्थजगत से लुप्त ही था। जिस जंबूद्वीप की बात इन्होंने की वह आज भी धर्म-शास्त्रों में जीवित है। राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों से यह गायब हो गया हो तो भले हो गया हो पर धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन और उसके अपने सोलहों संस्कारों में वह जंबूद्वीप अब भी मौजूद है। 

 

१ अगस्त २०१६

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