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कमरे के सात साथियों में एक मैं ही पढ़ा लिखा था और किसी न किसी तरह जर्मन सेठ से गुज़ारे लायक टूटी फूटी अंग्रेज़ी मिली जर्मन से काम चला लेता था। इसलिये टहलसिंह मुझसे थोड़ा दबता और तमीज़ से पेश आता।

मुझे जर्मनी आए एक महीना हुआ था मगर उन सब में एक मैं ही बेरोज़गार था। इसलिये रात-रात भर बैठा सोचा करता कि मुझे किस बिच्छू ने काटा था कि अच्छी भली नौकरी छोड़ कर जर्मनी भाग आया। रात को दो या तीन बजे के बाद जब मेरी आँख लगती तो सुबह दस बजे से पहले न खुलती। हाँ बीच में कोई चार पाँच बजे के बीच कुछ शब्द मेरे कानों में ज़रूर बज उठते मगर मैं उन्हें अपने ही ख्वाबों की बड़बड़ाहट समझ कर फिर से चादर तान कर सो जाता। कभी कभी सुर में गाए जाते यह शब्द कुछ साफ भी सुनाई दे जाते- "ढाई अक्खर प्यार के "

टहलसिंह मुझसे अँग्रेज़ी सीखने के लिये सदा अँग्रेज़ी में बात करता था मगर हज़ार कोशिशों के बाद भी उसकी अँग्रेज़ी उसके अपने ढाई शब्दों तक ही सीमित रहती- "नंदा साहब! आई टैक्सी, बिग बिग साहब, नई दिल्ली फ़ादर टैक्सी दिल्ली, मेनी मनी, बुक होम...।"

मैं समझ जाता कि वह अपनी इस टूटी फूटी अंगरेजी से यूरोप से आए सैलानियों को नयी दिल्ली की सैरें कराता होगा। बाप भी उसका दिल्ली का टैक्सी ड्राइवर होगा। अच्छा पैसा और अच्छा घर होगा। फिर उसे न जाने क्या सूझी कि सब कुछ छोड़ कर जर्मनी भाग आया। उसका जवाब खुद मेरी अपनी सूरत में मेरे पास था। मगर फिर भी मैं उससे पूछ ही बैठता- "टहलसिंह व्हाइ यू केम टु जर्मनी?"

"नंदा साहब! नो जर्मनी आ़ई इंगलैंड टैक्सी, फ़ादर दिल्ली टैक्सी, म़ेनी मनी बुक होम।"
"तो क्या तुम इंगलैंड जाकर टैक्सी चलाना और अमीर होना चाहते हो?"
वह पहले अपनी छाती पर अंगुली रखता। फिर मेरी छाती पर अंगुली रखकर कहता, "यू नो हिन्दी मी इ़ंगलिश ओनली?"
मैं समझ जाता कि अँग्रेज़ी सीखने के शौक में वह मेरे साथ केवल अँग्रेज़ी में ही बात करना चाहता है। मैं अँग्रेज़ी बोलता। वह अगर कुछ भी न समझ पाता तो भी सिर हिलाता। यस, यस, यूँ किये जाता जैसे बहुत बड़ा अँग्रेज़ी दाँ हो।

बेरोज़गारी ने मुझे थोड़ा चिड़चिड़ा बना दिया था और टहलसिंह को इसका पता था, मगर वह मेरी क्या मदद कर सकता था, वह तो खुद बेरोज़गार था। एक रात सुबह चार बजे तक मुझे नींद नहीं आई और साढ़े चार बजे के करीब गाए जाते कुछ शब्द साफ साफ मेरे कानों से जा टकराए- पढ़ पढ़ के सब जग मुआ पंडित भया न कोय
ढाई अक्खर प्यार के पढ़े सो पंडित होय।
मैंने चादर से मुँह हटा कर देखा। यह टहलसिंह था, जो मुँह हाथ धोकर, कपड़े पहनता हुआ, मुँह ही मुँह में कुछ पवित्र श्लोकों का पाठ करता, कहीं जाने को तैयार हो रहा था। नींद तो मुझसे रूठ ही चुकी थी। मैंने यूँ ही पूछ लिया- "टहलसिंह, कहीं जा रहे हो?"
उसे मेरा हिंदी में पूछना बुरा लगा। मगर मुझे सीधे रस्ते पर लाने के लिये वह अंगरेज़ी में बोला- "आई वर्क "
"वेअर?  कैन यू गेट मी अ जॉब?"

वतन से लाए दिन ब दिन जेबों से निकलते डॉलर और बेरोज़गारी ने मुझे टहलसिंह के आगे झुकने और नौकरी माँगने पर मजबूर कर दिया था। उसने 'वेअर' और 'जॉब' ही के दो शब्दों से अंदाज़ा लगा लिया कि मैं उससे कोई नौकरी दिलवाने की प्रार्थना कर रहा हूँ। वह बोला, "यू बिग साहब आ़ई सब्ज़ी मंडी।"

बेरोजगारी मुझे ऊपर से नीचे ले आई थी। मैंने उसे समझाया कि काम काम होता है। काम छोटा या बड़ा नहीं होता। इसलिये वह मुझे अपने साथ सब्ज़ीमंडी ले गया। वहाँ ट्रकों से आलू के बोरे उतारने और अंदर मंडी की दुकानों पर पहुँचाने का काम करता था। उसने ट्रक ड्राइवर से अपने ढाई जर्मन अक्खरों के ज़रिये मेरी सिफारिश की।
ड्राइवर ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। मेरे कमजोर जिस्म को देखते हुए एक बार तो मुझे ऐसा लगा कि मैं उसके काम का आदमी नहीं और वह फौरन इनकार कर देगा, मगर न जाने उसे मेरे मरियल जिस्म या बिसूरती शक्ल पर तरस आ गया या टहलसिंह के ढाई अक्खरों ने कोई कमाल कर दिखाया कि उसने मुझे बोरे उतारने पर रख लिया।

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