''पर यह पुस्तिका तो एकदम नई है। क्या उसी के लिए ख़रीदी?''
''क्या करूँ मित्र है ना! और फिर क्या उसकी ख़रीदने की औकात है?''
''कितने उदार हो तुम!''
''उदार तो तुम हो नंदिता।''
नरेश की आवाज़ भाव-विभोर हो उठी।''नहीं तो मेरे जैसे को इतने स्नेह भरी मित्रता कैसे देती!''
''तुम्हारे जैसे को?'' नंदिता ने भृकुटी सिकोड़ कर पूछा।

नरेश ने उसी दिन अपने पिता को पत्र में लिखा,
''आपकी एक बात हमेशा सच होती रहती है कि मुझे परीक्षा में अच्छी डिवीजन नहीं मिलती। वैसे, यह बात सभी मानते हैं कि मेरा सामान्य ज्ञान बहुतों से अच्छा हैं। चूँकि मैं किताबी कीड़ा नहीं हूँ। शायद, इसीलिए ऐसा है। यहाँ कोई नहीं मानेगा कि मैं वास्तव में ठूँठ हूँ। इतना ठूँठ कि बंगाली सीखने बैठा पर लिपि इतनी टेढ़ी-मेढ़ी कि उसी में उलझ कर रह गया और उसे छोड़ बैठा, फिर भी मेरे मित्र मुझे बंगाली का पंडित मानते हैं। मुझे हँसी आती है उन पर। माँ कैसी हैं? दुकान कैसी चल रही है? व्यापार मंदा ही लगता है। पिछले महीने आपने मुझे २५ रुपए कम भेजे थे। गुज़ारा कर रहा हूँ। पिछले महिने से एक टयूशन भी मिल गई है। आपकी कैसी तंदुरूस्ती है, उसमें मैं आपको ज़्यादा मेहनत करने देना नहीं चाहता हूँ।

अगले वर्ष तक मैं बी.ए. कर लूँगा। बस, इतनी ही देर है। इसके बाद मैं आपका बोझ हलका करने।''
उसकी आँखें भर आई, हाथ रुक गया। उसे दो मिलों तथा चार मोटरों की याद हो आई!
पत्र डाक में डालकर नरेश ने एक अजीब-सी तसल्ली महसूस की। ऐसी ही जैसी नंदिता के सान्निध्य से होती थी। यह सान्निध्य अब और ज़्यादा मधुर हो गया था।

कभी-कभी कोई यह भी कह उठता था कि दोनों का विवाह हो जाए तो जान छूटे। पर विवाह कैसे हो सकता था। नरेश तो जैसे कुछ जानता-समझता ही नहीं था। ''सारी दुनिया समझती है तो फिर यह कैसे नहीं समझता?'' नंदिता सोचती थी।
''कैसा भोला है।''
''तुम कुछ समझते क्यों नहीं?''
''क्या नहीं समझता?''
''जो सारी दुनिया समझती है वह।''
''कि...''
''यह मुझसे नहीं कहा जाएगा।''
''तो किससे कहा जाएगा?''
''तुमसे,'' कहकर नंदिता ने अचानक उसका हाथ थाम लिया। जो कुछ नरेश को अभी तक समझमें नहीं आया था, वह अचानक ही आ गया।
''नंदी,'' वह सिर्फ़ इतना बोल सका।
''बोलते क्यों नहीं?''
''क्या बोलूँ, तू तो बहुत भोली है।''
''भोले तो खुद हो। मन की बात कहने का साहस तक नहीं करते!'' हालात ने नरेश को जैसे सावधान कर दिया हो। उसके मुख पर एक निर्णय, एक निश्चय की चमक थी, उसने कहा, कहूँगा, एक दिन ज़रूर कहूँगा।''

''कहूँ? पर क्या कहूँ? ऐसी भोली-भाली, फूल जैसी निर्दोष लड़की से, जो मुझे दो मिलों तथा चार मोटरों का मालिक और माइकेल मधुसुदन दत्त पर्यंत बंगाली साहित्य का विद्वान समझती है। ऐसी श्रद्धामयी लड़की से भला क्या कहूँ?'' एक छोटी-सी कोठरी में करवट बदलते हुए नरेश को नींद नहीं आ रही थी। अपने सहपाठियों की नज़रों में उसने इस कोठरी को अपने चाचा का 'नेपियन-सी-रोड' का महल बना रखा था। किसी-किसी को तो उसने एक अट्टालिका को दूर से दिखाया तक भी था। पर चाचा का अभिमान तथा चाची की लड़ाकू वृत्ति की किलेबंदी करके उसने वहाँ सबका प्रवेश रोक रखा था। यह 'महल' जो हमेशा उसे गहरी नींद में सुला देता था, आज नींद के बजाय आँसुओं को उपहार दे रहा था। इस उपहार के पीछे उसको मेहनत करते हुए पिता तथा काया घिसती हुई माँ दिखायी देती है। नन्हें से गाँव की गंदी गलियाँ उभरती है।

उसमें क्या नंदिता रह सकती है? नामुमकिन, बिलकुल नामुमकिन। मैं नरेश घिया चाहे जितनी गपोड़ी होऊँ, पर ऐसा अत्याचार कभी नहीं कर सकूँगा। तो कहना क्या चाहिए? नंदिता से?''
''अब तो नंदी,'' उसने कहना चाहा। नंदिता जैसे नींद से जागी हो। विस्मय उसके चेहरे पर था। वह सोच रही थी नरेश की इस आवाज़ में इतनी व्यथा क्यों हैं?
''तुमने एक दिन मुझसे कहा था कि मैं तुमसे कुछ कहूँ।''
''हाँ, हाँ,'' वह उत्साहपूर्वक बोली,
''मैं तो इसी का इंतज़ार कर रही थी, हर रोज़, हर घड़ी, हर पल।''
''मुझे तुमसे जो कहना है, वह कहूँगा, पर पहले एक सवाल पूछूँ?''
''पूछो ना, नहीं क्यों?''
''तुम मेरी कितनी घनिष्ठ मित्र हो?''
''हूँ ही।''
''पर फिर भी।'' नरेश अचकचाया, बोला,''क्या मैंने कभी कोई मर्यादा तोड़ी है? मैंने कभी भी तुम्हारा मित्र के अलावा किसी और तरीके से स्पर्श किया है? सच कहना।''
''नहीं किया। पर तुम ऐसे हो, इसी कारण तो, मैं क्या कहूँ तुमको,''
''कैसी भोली हो,'' उसने कहा --
''इतना गहरा संबंध होने पर भी मैंने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया, इसका विचार तक तुमने नहीं किया।''
''इसमें विचार क्या करना। तुम इतने अच्छे हो कि...''
''मनुष्य चाहे जितना अच्छा हो फिर भी वह ऐसा नहीं करेगा, नंदी।''
''तो फिर कौन नहीं करेगा?'' नंदी ने छेड़ा।
''शादी-शुदा'' जैसे कब्र से नरेश की आवाज़ आई।
''नरेश,'' नंदिता चीख-सी पड़ी।
''शादी-शुदा'' नरेश ने उतने ही धीमे स्वर में दोबारा कहा। इसके पहले कि नंदिता उसे रोक कर कुछ पूछ सके, वह चला गया।

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६ जनवरी २००१