बरसात शुरू हो गई है। बिजली और बादलों की गड़गड़ाहाट से सारा जंगल काँप उठा। मसाशुणी नदी और गाँव में घुटनों तक पानी। उधर जटिया पहाड़ के सिरे से धीरे आकर चारों ओर भर रही है। बाँस का बेड़ा बनाकर लोग आवाजाही कर रहे हैं। गाँव के बीच में ऊँचे टीले पर दाल, चावल, सब्ज़ी लाकर रसोई पका रहे हैं। लोगों के घरों में पानी भर गया है। हर वर्ष कुछ दिन गाँव वालों को यही सब भोगना पड़ता है। सबके घर एक-एक डोंगी बाहर वाली छान से बँधी होती है। गाँव में बाढ़ का पानी घुसने पर लगातार छ:-सात दिन इधर-उधर डोंगी से ही जा-आ पाते हैं - यहाँ तक कि निकट के अड़ोस-पड़ोस में भी। बाढ़ के साथ आती है महामारी, खाँसी-सर्दी, बुखार, हैजा - । टीले पर छोटा-सा स्वास्थ्य-केन्द्र है। कोई-कोई डोंगी में जाकर वहाँ से दवादारू से आता है। कोई मर जाए तो "जै गंगा मैया! तेरी शरण..." कह बहा देते हैं। बरसों के बाद परवल, गोभी, टमाटर, बैंगन आदि खूब होते हैं। परवल तो पच्चीस पैसे किलो हो जाती है। गाँव वाले सब्ज़ी लाकर कटक में डेढ़ रुपए किलो में बेचते हैं। फागुन-चैत में फूलों की महक, आम और बकुल की सुगन्ध से समुचा जंगल बौरा जाता है

सारा जंगल ऐसी बरसा-हवा में दुलक रहा है। रात होते ही अंधेरे में पेड़-पौधे कुछ नहीं दिखते। सब मिलकर अंधेरे का अंश बन जाते हैं। जीवन का जैसे निशान भी नहीं रह जाता। कहीं कोई संकेत नहीं रह जाता।

जंगल में भी बाढ़ का पानी भर गया है। साँप, गीदड़, सियार, हिरण वगैरह पानी की धार में आकर गाँव के किनारे लगते या उस अकूत जल में बह जाते।

बरसा कुछ थम गई थी। नट एक डोंगी में बैठा जंगल की ओर चल पड़ा। साथ लिये है छाता और लालटेन। आज उसकी चेक-गेट पर ड्यूटी है। गेट के पास की गुमटी में वह खिड़की - दरवाज़ा सब बन्द कर बैठ गया है। आँधी-बरसा का मौका देख कंट्राक्टर का ट्रक भी जंगल में घुस आया। बड़े-बड़े साल के पेड़ काटेंगे, लादकर भरा ट्रक लेकर लौटेंगे। नट पेड़ की कटाई की आवाज़ सुन रहा है। लेकिन वह कर भी क्या सकता है इस समय? क्रमश: ट्रक आकर चेक-गेट के पास रुका। ऊपर से बाँस की रुकावट उठाने के लिए हॉर्न बजाया। नट ने अनसुना कर दिया। अचानक दो-तीन कुली उतर आए ट्रक से। नट को घसीट लाए। चाबी माँगी। मगर नट ने चाबी नहीं दी। कहा, "रात में गेट खोलने की इज़ाज़त नहीं है। रेंजर बाबू ने मना कर रखा है, सवेरे आकर चक्कों की लीक देखेंगे - मेरी नौकरी गोल हो जाएगी। बिना 'पास' के मैं गेट नहीं खोल सकता।"

नट की कसकर पिटाई कर दी गयी। बेहोश कर गेट तोड़ ट्रक लेकर भाग निकले। तब रात के दो बज रहे थे। आस-पास कोई लोग-बाग नहीं। जंगल साँय-साँय कर रहा था।

सुबह डोंगी में बैठ भँवरा निकला, गाँव में डाक बाँटने के लिए। फॉरिस्ट रेंजर की डाक अधिक होती है। जाकर चेक-गेट की गुमटी की खिड़की में झाँका। देखा, नट बेहोश पड़ा है! बस, गों-गों कर रहा है! दोनों जबड़े खून में सने हैं। मुँह लाल हो गया है। मक्खियाँ भिनभिना रही हैं।

किवाड़ पर धक्का मारा। नट न हिला न डुला। कुछ उठाया, कुछ घसीटा, फिर डोंगी पर लिटाया। ले चला गाँव के स्वास्थ्य-केन्द्र की ओर - गाँव के बीच वाले टीले के पास। और फिर डॉक्टर बाबू के जिम्मे सौंपकर चल पड़ा चिठ्ठी बाँटने के लिए।

कई घण्टों बाद नट को होश आया। डॉक्टर बाबू से सारी बातें सुनकर उसे कानों पर विश्वास नहीं हुआ। भँवरा का ऋण कैसे उतारूँ? पिछली बातें - झगड़ा-फसाद सब भूल गया।

कुछ दिन बाद की बात है। मोहनी साहू ने भँवर से कहा, "कहना, नटिया आया था। वह तो बस तेरे ही गुण गा रहा था। बोला - 'भँवरा भाई ने मेरी जान बचा ली। जीवन में उसका ऋण कभी नहीं चुका सकूँगा!'

भँवरा का मन खूब नरम हो गया। फिर भी कहीं भेंट हो जाने पर नटिया से बात करने में उसे संकोच होता।

नट भी दिल खोलकर उससे बातचीत नहीं कर पाता। दोनों एक-दूसरे की ओर देखकर अपने-अपने रास्ते चले जाते।

महीने दो महीने बाद नटिया ने सुना - साइकल वाला समेसर कह रहा है, "भँवरा ने तेरे लिए क्या कुछ नहीं किया। भगवान ने इतनी बड़ी विपद से बचा लिया! जाको रखे साइयाँ, बाल न बाँका होय!"

नट सब सुनता रहता। मगर भँवरा को बुलाकर कुछ कह नहीं पाता। भँवरा भी सब सुनता रहता, मगर नट को कुछ नहीं कह पाता। बस, आमने-सामने पड़ते तो दोनों के चेहरे पर ज़रा-सी मुस्कान खिल उठती।

ऐसे ही कुछ महीने बीत गए। उस दिन नटिया ने बस्ती में सुना - सुलोचना पेट से है। दो महीने बाद वह माँ बन जाएगी!

रेंजर बाबू ने उस दिन हिरन मारा था। नटिया को बुलाकर उसे दो किलो मांस दिया। पता नहीं, उसके सिर में क्या सनक चढ़ी, जाकर भँवरा के दरवाज़े हाजिर! सुलोचना और भँवरा बरामदे में बैठे बतिया रहे थे। नटिया अनायास कह उठा - "भँवरा भैया! सुलू बहन! ये मिरग-मांस तुम रखो। तरकारी बना लेना। मुझे रेंजर बाबू ने दिया है।"

भँवरा और सुलोचना दोनों के होठों पर हल्की-सी मुस्कान बिखर गई - "सारा ही क्यों दे रहे हो?"
नटिया ने ठहाका लगाया, " मेरे क्या काम का? मैं तो मुरारी बाबा के होटल का ग्राहक हूँ। मेरे लिए भला कौन पकाएगा?

"भँवरा ने कहा, "नाटिया रे! तुम ऐसा करो आज रात हमारे घर खाना खा लेना। न्योता रहा।"
सुलोचना तो लाज में गड़ गई। एक बार नाटिया के चेहरे की ओर देखकर मुँह नीचा कर लिया।
नाटिया ने कहा, "ठीक है। बहिन के घर से न्योता मिला है, कोई कैसे मना करेगा? मगर कहाँ, बहिन तो कुछ बोलती नहीं।"
सुलोचना तो लाज में सिमिट गई। फिर थोड़ी हँसकर कह उठी - "हाँ-हाँ, तू आज हमारे घर खाना खाएगा नट भैया!"

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१५ अक्तूबर २००१